चंद्रपुर। महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले से सामने आए एक चौंकाने वाले मामले ने पंचायत स्तर पर वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां 12 साल पहले मर चुके एक व्यक्ति को ग्राम पंचायत के आधिकारिक रिकॉर्ड में कर्मचारी दिखाकर उसके नाम पर भुगतान किए जाने का खुलासा हुआ है। यह मामला तब सामने आया जब सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी में कई विसंगतियां उजागर हुईं।
दस्तावेजों के अनुसार, धाबा गांव के निवासी विलास चनेकर, जिनकी मृत्यु वर्ष 2013 में हो चुकी थी, उन्हें वर्ष 2024 में पंचायत रिकॉर्ड में एक मजदूर के रूप में दर्ज किया गया। रिकॉर्ड में यह भी उल्लेख किया गया कि उन्हें गांव के पशु आश्रय में जानवरों को चारा और पानी देने के काम के लिए नियुक्त किया गया था। इस नियुक्ति के आधार पर उनके नाम पर ₹7,200 का भुगतान भी दर्शाया गया है।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि भुगतान से जुड़ी रसीद में कई गंभीर खामियां पाई गई हैं। दस्तावेज में न तो कोई वैध वाउचर नंबर दर्ज है और न ही किसी प्रकार का हस्ताक्षर या अंगूठा निशान मौजूद है। हस्ताक्षर के स्थान पर केवल “विलास” नाम लिखा हुआ पाया गया, जिससे पूरे भुगतान की प्रक्रिया की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है।
मृतक के बेटे नितिन चनेकर ने इस पूरे मामले को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि उनके परिवार को इस तरह के किसी भी भुगतान की जानकारी नहीं है और न ही उन्हें कोई राशि प्राप्त हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके पिता के नाम का इस्तेमाल कर फर्जी तरीके से सरकारी धन की निकासी की गई है।
FutureCrime Summit 2026 Calls for Speakers From Government, Industry and Academia
प्रारंभिक जांच और दस्तावेजों की समीक्षा के दौरान यह संकेत भी मिले हैं कि मामला केवल ₹7,200 के भुगतान तक सीमित नहीं है। ग्राम पंचायत पर करीब ₹80 लाख तक के फंड के दुरुपयोग और गबन के आरोप लगाए जा रहे हैं। यह राशि 15वें वित्त आयोग के तहत पंचायत को विकास कार्यों के लिए आवंटित की गई थी। आरोप है कि इस फंड का एक बड़ा हिस्सा फर्जी नामों और कागजी कर्मचारियों के जरिए निकाला गया।
स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस मामले को बेहद गंभीर बताते हुए उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि मृत व्यक्ति के नाम पर भुगतान संभव है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि पंचायत के रिकॉर्ड में बड़े पैमाने पर हेरफेर की गई है और कई अन्य फर्जी प्रविष्टियां भी हो सकती हैं। ग्रामीणों ने आशंका जताई है कि इस तरह के और भी मामले सामने आ सकते हैं, जिनमें सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया हो।
वित्तीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के घोटाले प्रशासनिक निगरानी में कमी और ऑडिट सिस्टम की कमजोरियों को उजागर करते हैं। पंचायत स्तर पर होने वाले खर्चों की नियमित जांच और पारदर्शिता सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि इस तरह की अनियमितताओं को समय रहते रोका जा सके।
मामले के उजागर होने के बाद संबंधित पंचायत की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि लंबे समय से पंचायत के कार्यों में पारदर्शिता की कमी रही है, लेकिन अब ठोस दस्तावेज सामने आने के बाद कार्रवाई की उम्मीद बढ़ गई है।
फिलहाल, इस मामले में विस्तृत जांच शुरू होने की संभावना जताई जा रही है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो इसमें शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई हो सकती है। यह घटना एक बार फिर इस बात की ओर इशारा करती है कि जमीनी स्तर पर वित्तीय प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना कितना जरूरी है, ताकि सरकारी योजनाओं का लाभ सही लाभार्थियों तक पहुंच सके और सार्वजनिक धन का दुरुपयोग रोका जा सके।
