IDFC फर्स्ट बैंक घोटाले में बढ़ता दायरा; 15 आरोपी गिरफ्तार, बैंकिंग सिस्टम के भीतर मिलीभगत पर गंभीर सवाल

‘₹590 करोड़ बैंक फ्रॉड में नई परत’: AU बैंक के पूर्व रीजनल हेड पर ₹10 करोड़ लेने का आरोप, जांच में चौंकाने वाले खुलासे

Roopa
By Roopa
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चंडीगढ़। ₹590 करोड़ के बहुचर्चित बैंक धोखाधड़ी मामले में जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे नए खुलासे सामने आ रहे हैं। इस मामले में अब एक और बड़ा नाम जुड़ गया है—AU स्मॉल फाइनेंस बैंक के पूर्व रीजनल हेड अरुण शर्मा, जिन पर आरोप है कि उन्होंने मुख्य आरोपियों की मदद के बदले करीब ₹10 करोड़ की रकम हासिल की। इस खुलासे ने पूरे बैंकिंग तंत्र में आंतरिक मिलीभगत को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जांच एजेंसियों द्वारा अदालत में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, अरुण शर्मा ने कथित तौर पर इस घोटाले के मुख्य आरोपियों के साथ मिलकर कई अवैध गतिविधियों को अंजाम देने में सहयोग किया। बताया गया है कि उन्होंने बैंकिंग प्रक्रियाओं की जानकारी और अपने पद का लाभ उठाकर सिस्टम में मौजूद खामियों का फायदा दिलाया, जिससे बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं संभव हो सकीं।

इस मामले में पहले ही कुल 15 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जिनमें कई बैंक कर्मचारी और सरकारी अधिकारी भी शामिल हैं। सभी आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। जांच में यह भी सामने आया है कि यह कोई एकल व्यक्ति द्वारा किया गया अपराध नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा था, जिसमें अलग-अलग स्तरों पर लोगों की भूमिका तय थी।

सूत्रों के मुताबिक, इस घोटाले का मुख्य तरीका फर्जी दस्तावेजों और गलत जानकारी के आधार पर लोन और वित्तीय लेनदेन को मंजूरी दिलवाना था। आरोप है कि इस प्रक्रिया में बैंकिंग नियमों को दरकिनार किया गया और जानबूझकर ऐसे खातों और ट्रांजेक्शन को क्लियर किया गया, जिनमें जोखिम के स्पष्ट संकेत मौजूद थे। इस तरह धीरे-धीरे बड़ी रकम सिस्टम से बाहर निकाली गई।

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अरुण शर्मा की भूमिका को लेकर जांच एजेंसियों ने अदालत को बताया कि उन्होंने मुख्य आरोपियों—रिभव ऋषि और अभय कुमार—के साथ मिलकर इस पूरे नेटवर्क को सुचारू रूप से चलाने में अहम भूमिका निभाई। आरोप है कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए उन लेनदेन को मंजूरी दिलवाई, जो सामान्य परिस्थितियों में संदिग्ध माने जाते।

जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि इस घोटाले में कई स्तरों पर साजिश रची गई थी, जिसमें दस्तावेजों की फर्जीवाड़ा, खातों की हेराफेरी और आंतरिक नियंत्रण तंत्र को कमजोर करने जैसी गतिविधियां शामिल थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में केवल बाहरी अपराधियों को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि सिस्टम के भीतर मौजूद कमजोरियों और उनकी जिम्मेदारी तय करना भी जरूरी होता है।

अदालत में पेश की गई जानकारी के अनुसार, अरुण शर्मा को इसी साल 6 मार्च को गिरफ्तार किया गया था। उनके खिलाफ जांच एजेंसियों के पास ऐसे साक्ष्य होने का दावा किया गया है, जो यह दर्शाते हैं कि उन्होंने अवैध लेनदेन के बदले आर्थिक लाभ प्राप्त किया। हालांकि, मामले में आगे की जांच अभी जारी है और कई अन्य पहलुओं की भी पड़ताल की जा रही है।

इस पूरे प्रकरण ने बैंकिंग सेक्टर में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर नई बहस छेड़ दी है। खासतौर पर यह सवाल उठ रहा है कि इतनी बड़ी रकम का घोटाला लंबे समय तक बिना किसी ठोस निगरानी के कैसे चलता रहा। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि आंतरिक ऑडिट और जोखिम प्रबंधन तंत्र को और मजबूत करने की आवश्यकता है।

फिलहाल, जांच एजेंसियां इस नेटवर्क से जुड़े अन्य संभावित आरोपियों की पहचान करने में जुटी हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं, जिससे पूरे घोटाले की परतें और गहराई से सामने आएंगी।

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