साइबर थाना पुलिस ने एपीके फाइल, कॉल फॉरवर्डिंग और व्हाट्सएप क्यूआर कोड के जरिए बढ़ रही ठगी से बचने के लिए लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है।

‘डिजिटल अरेस्ट’ पर केंद्र का सख्त एक्शन: WhatsApp को संदिग्ध डिवाइस IDs ब्लॉक करने का आदेश

Roopa
By Roopa
5 Min Read

नई दिल्ली। देशभर में तेजी से बढ़ रहे “डिजिटल अरेस्ट” साइबर फ्रॉड पर केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सूत्रों के अनुसार, सरकार ने WhatsApp को ऐसे डिवाइस IDs ब्लॉक करने के निर्देश दिए हैं, जिनका इस्तेमाल इस तरह की ठगी में किया जा रहा है। यह कदम गृह मंत्रालय की साइबर सुरक्षा इकाई की रिपोर्ट के बाद उठाया गया है, जिसमें इस तरह के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी की चेतावनी दी गई थी।

बताया जा रहा है कि साइबर अपराधी बार-बार नए अकाउंट बनाकर लोगों को निशाना बना रहे हैं। ऐसे में केवल अकाउंट ब्लॉक करना पर्याप्त नहीं माना जा रहा, इसलिए अब डिवाइस स्तर पर कार्रवाई की रणनीति तैयार की गई है, ताकि एक ही डिवाइस से बार-बार ठगी की घटनाओं को अंजाम देने पर रोक लगाई जा सके।

सरकार इस मामले में तकनीकी प्लेटफॉर्म्स के साथ मिलकर अतिरिक्त सुरक्षा फीचर्स लागू करने पर भी विचार कर रही है। इनमें संदिग्ध वीडियो कॉल की पहचान, फर्जी प्रोफाइल की निगरानी और यूजर्स को रियल-टाइम अलर्ट देने जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं। अधिकारियों का मानना है कि इस तरह के कदमों से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर होने वाले दुरुपयोग को काफी हद तक रोका जा सकता है।

जांच एजेंसियों ने यह भी सुझाव दिया है कि डिलीट किए गए अकाउंट्स का डेटा कम से कम 180 दिनों तक सुरक्षित रखा जाए। इससे जांच के दौरान महत्वपूर्ण डिजिटल सबूत जुटाने में मदद मिलेगी और अपराधियों तक पहुंच आसान होगी। आईटी नियम 2021 के तहत इस प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।

“डिजिटल अरेस्ट” स्कैम हाल के महीनों में तेजी से उभरा है। इसमें ठग खुद को पुलिस, जांच एजेंसी या सरकारी अधिकारी बताकर लोगों को वीडियो कॉल पर डराते हैं। पीड़ित को यह विश्वास दिलाया जाता है कि वह किसी गंभीर अपराध, जैसे मनी लॉन्ड्रिंग या फर्जी ट्रांजैक्शन में फंसा हुआ है और उसे तत्काल जांच में सहयोग करना होगा।

इस दौरान पीड़ित को घंटों तक कॉल पर रोके रखा जाता है, जिससे वह किसी और से संपर्क न कर सके। इसके बाद “अकाउंट वेरिफिकेशन” या “जांच प्रक्रिया” के नाम पर उसे अलग-अलग बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया जाता है। ठग यह भरोसा भी दिलाते हैं कि जांच पूरी होने के बाद रकम वापस कर दी जाएगी, लेकिन ऐसा कभी नहीं होता।

FutureCrime Summit 2026 Calls for Speakers From Government, Industry and Academia

साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि यह पूरी तरह सोशल इंजीनियरिंग पर आधारित अपराध है, जिसमें तकनीक से ज्यादा मनोवैज्ञानिक दबाव का इस्तेमाल किया जाता है। प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, “अपराधी डर और तात्कालिकता पैदा कर पीड़ित को सोचने का मौका नहीं देते। ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है, लेकिन इसे असली दिखाने के लिए फर्जी पहचान और नकली दस्तावेजों का सहारा लिया जाता है।”

सरकार अब इस तरह के अपराधों पर बहु-स्तरीय रणनीति के तहत काम कर रही है। एक ओर जहां टेक कंपनियों के साथ समन्वय बढ़ाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर लोगों को जागरूक करने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाने की योजना है। खासतौर पर वरिष्ठ नागरिकों और व्यवसायियों को ऐसे स्कैम से सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है।

अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि कोई भी सरकारी एजेंसी कभी भी फोन या वीडियो कॉल के जरिए पैसे ट्रांसफर करने के लिए नहीं कहती। ऐसे में यदि किसी को इस तरह का कॉल आए तो तुरंत उसे काट देना चाहिए और आधिकारिक नंबरों के जरिए सत्यापन करना चाहिए।

इसके अलावा, संदिग्ध कॉल या मैसेज मिलने पर राष्ट्रीय साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर तुरंत सूचना देने और cybercrime.gov.in पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी गई है। शुरुआती समय में रिपोर्ट करने से ठगी की रकम को ट्रैक और फ्रीज करने की संभावना बढ़ जाती है।

स्पष्ट है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बढ़ते अपराधों के बीच अब सख्ती और सतर्कता दोनों ही जरूरी हो गए हैं। सरकार के नए कदम से इस खतरे पर कुछ हद तक लगाम लगने की उम्मीद जताई जा रही है।

हमसे जुड़ें

Share This Article