उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की एक विस्तृत जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि संतकबीरनगर जिले में नियुक्त एक मदरसा शिक्षक शमशुल हुदा खां को, ब्रिटेन में निवास और वहां की नागरिकता लेने के बावजूद, दस वर्षों तक सरकार के अधीन वेतन वृद्धि और बाद में पेंशन का लाभ दिया जाता रहा।
प्रशासनिक दस्तावेज़ों से स्पष्ट हुआ है कि इस पूरी प्रक्रिया में न तो उनकी सेवा पुस्तिका का सत्यापन हुआ, न ही विदेश में उनके दीर्घकालिक निवास की जानकारी विभागीय अभिलेखों में दर्ज की गई।
1984 से सेवा में, 2007 से ब्रिटेन में स्थायी निवास
रिकॉर्ड के अनुसार, शमशुल हुदा खां को 12 जुलाई 1984 को मदरसा दारुल उलूम अहले सुन्नत अशरफिया, मुबारकपुर (आजमगढ़) में सहायक अध्यापक के रूप में नियुक्त किया गया था।
बाद में उनकी तैनाती संतकबीरनगर जिले में हुई, जहाँ वे मदरसा दारुल उलूम अहले सुन्नत में कार्यरत रहे।
वर्ष 2007 से उन्होंने स्थायी रूप से ब्रिटेन में रहना शुरू किया। रिपोर्ट के अनुसार, वे इस दौरान भारत की सरकारी सेवा में बने रहे, और हर वर्ष उनकी फाइल में वेतन वृद्धि (annual increment) दर्ज की जाती रही।
19 दिसंबर 2013 को उन्होंने ब्रिटिश नागरिकता ग्रहण की, परंतु भारतीय विभागों को इसकी जानकारी न तो उन्होंने दी, न ही किसी स्तर पर सत्यापन हुआ।
2017 में सेवानिवृत्ति और पेंशन की स्वीकृति
अल्पसंख्यक विभाग के अभिलेख बताते हैं कि वर्ष 2017 में उन्हें स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (Voluntary Retirement) दी गई और उसी के साथ पेंशन भी स्वीकृत कर दी गई।
विभागीय नियमों के अनुसार, किसी भी कर्मचारी को सेवानिवृत्ति या पेंशन की अनुमति तभी दी जा सकती है जब उसकी सेवा पुस्तिका की विस्तृत जांच और सत्यापन किया गया हो — किंतु इस मामले में यह प्रक्रिया पूरी तरह नजरअंदाज की गई।
जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि यह स्वीकृति “प्रशासनिक प्रक्रिया के गंभीर उल्लंघन” के तहत दी गई थी।
एटीएस जांच में उजागर हुए अंतरराष्ट्रीय संपर्क
मामले की गंभीरता को देखते हुए, उत्तर प्रदेश एंटी टेररिज्म स्क्वॉड (ATS) ने भी इस पूरे प्रकरण की जांच की।
एटीएस की रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि शमशुल हुदा खां ने ब्रिटेन की नागरिकता लेने के बाद लगातार पाकिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा की।
वे वहां के धार्मिक संगठनों और समुदायों के संपर्क में थे, और भारत में रहकर जम्मू-कश्मीर सहित कुछ विवादित इलाकों में सक्रिय व्यक्तियों से संवाद रखते थे।
जांच में यह भी दर्ज किया गया कि हुदा खां इस्लामिक शिक्षा और धार्मिक प्रचार से जुड़ी गतिविधियों में संलग्न थे तथा सोशल मीडिया व ऑनलाइन मंचों के माध्यम से भी इस्लामीकरण से संबंधित विचारों का प्रचार करते रहे।
कानूनी कार्रवाई और प्रशासनिक कदम
एटीएस रिपोर्ट के आधार पर संतकबीरनगर के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी ने शमशुल हुदा के खिलाफ कोतवाली खलीलाबाद में एफआईआर दर्ज कराई है।
साथ ही, जिस मदरसे में वे कार्यरत थे, उसे भी एहतियातन सील कर दिया गया है।
जिला प्रशासन के अनुसार, उनके खिलाफ पहले से ही दो मुकदमे संतकबीरनगर और आजमगढ़ में लंबित हैं, जिनमें आरोपपत्र अदालत में दाखिल किया जा चुका है।
इन मामलों में भी विदेशी संपर्कों, वित्तीय अनियमितताओं और अनुचित धार्मिक गतिविधियों के आरोप शामिल हैं।
प्रशासनिक चूक पर उठे सवाल
यह पूरा मामला राज्य के प्रशासनिक ढांचे की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, किसी विदेशी नागरिक को सरकारी सेवा में बने रहने देना, वेतन वृद्धि देना और पेंशन स्वीकृत करना न केवल सेवा नियमों का उल्लंघन है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा संवेदनशील मामला भी हो सकता है।
अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने अब उन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच शुरू की है जिन्होंने इस मामले में दस्तावेज़ी स्वीकृतियां दीं।
राज्य सरकार ने इस संबंध में एटीएस और सतर्कता विभाग से संयुक्त रिपोर्ट मांगी है।
राज्य स्तर पर निगरानी तंत्र की समीक्षा
राज्य प्रशासन अब ऐसे मामलों में निगरानी प्रणाली को सुदृढ़ करने की दिशा में कदम उठा रहा है।
स्रोतों के अनुसार, विभागों को निर्देश दिया गया है कि विदेश में रहने वाले या दोहरी नागरिकता ग्रहण करने वाले कर्मचारियों की सेवा स्थिति की वार्षिक समीक्षा की जाए।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला सरकारी निगरानी प्रणाली में मौजूद खामियों को उजागर करता है — जहाँ एक कर्मचारी वर्षों तक विदेश में रहकर भी सरकारी वेतन और पेंशन का लाभ उठाता रहा, और यह बात किसी स्तर पर दर्ज नहीं हुई।
