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‘फर्जी बिलों से 15 लाख का खेल’: उरई में चिकित्सा प्रतिपूर्ति घोटाले की जांच तेज, लखनऊ टीम ने खंगाले रिकॉर्ड

Team The420
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उरई। उत्तर प्रदेश के उरई में चिकित्सा प्रतिपूर्ति के नाम पर हुए 15 लाख रुपये के घोटाले ने प्रशासनिक तंत्र में हलचल मचा दी है। भूमि संरक्षण और उप कृषि कार्यालय से जुड़े इस मामले में फर्जी बिल और वाउचर तैयार कर सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया। शिकायत सामने आने के बाद न केवल जिला स्तर पर जांच शुरू हुई, बल्कि लखनऊ से आई तीन सदस्यीय टीम ने भी मौके पर पहुंचकर अभिलेखों की गहन पड़ताल की।

प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, यह गड़बड़ी फरवरी माह में सामने आई, जब भूमि संरक्षण विभाग और उप निदेशक कृषि कार्यालय में तैनात लिपिकों ने सेवानिवृत्त कर्मचारियों के नाम पर चिकित्सा प्रतिपूर्ति के फर्जी बिल लगाकर करीब ₹15 लाख का भुगतान करा लिया। इस रकम में से लगभग ₹10 लाख रुपये कथित रूप से उनके करीबी लोगों के खातों में ट्रांसफर कर दिए गए।

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मामले का खुलासा तब हुआ, जब सेवानिवृत्त भूमि संरक्षण अधिकारी राजेंद्र प्रसाद को इस अनियमितता की भनक लगी। उन्होंने 11 फरवरी को जिलाधिकारी को लिखित शिकायत दी, जिसके बाद 16 फरवरी को जिला स्तर पर जांच समिति का गठन किया गया। इस बीच, प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए उच्च स्तर पर भी संज्ञान लिया गया।

शुक्रवार को लखनऊ से आई तीन सदस्यीय जांच टीम ने उरई पहुंचकर उप निदेशक कृषि कार्यालय में रिकॉर्ड खंगाले। टीम ने संबंधित अभिलेखों को मंगवाकर भुगतान प्रक्रिया, बिल वाउचर और खातों के विवरण की जांच की। देर शाम तक दस्तावेजों की छानबीन जारी रही, जिससे संकेत मिल रहे हैं कि मामले में कई स्तरों पर अनियमितताएं हुई हैं।

जांच में सामने आया है कि आरोपित लिपिकों ने सुनियोजित तरीके से फर्जी दस्तावेज तैयार किए। सेवानिवृत्त कर्मचारियों के नाम और विवरण का इस्तेमाल कर चिकित्सा प्रतिपूर्ति के दावे लगाए गए, जबकि वास्तविकता में ऐसे कोई खर्च या दावे मौजूद नहीं थे। इस तरह सरकारी धन को व्यवस्थित तरीके से siphon कर निजी खातों में पहुंचाया गया।

इस प्रकरण में संबंधित लिपिकों के खिलाफ प्राथमिकी पहले ही दर्ज कराई जा चुकी है। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस घोटाले में और कौन-कौन लोग शामिल हैं तथा क्या इसमें किसी बड़े नेटवर्क या अंदरूनी मिलीभगत की भूमिका है। साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि भुगतान प्रक्रिया में किन स्तरों पर लापरवाही या जानबूझकर अनदेखी की गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में आंतरिक नियंत्रण प्रणाली की कमजोरियां उजागर होती हैं। यदि बिलों और वाउचर की समय रहते कड़ी जांच की जाए, तो ऐसे घोटालों को रोका जा सकता है। सरकारी कार्यालयों में डिजिटल सत्यापन और पारदर्शिता बढ़ाने की जरूरत भी इस घटना से स्पष्ट होती है।

फिलहाल लखनऊ से आई टीम अभिलेखों के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार कर रही है, जिसे निदेशालय स्तर पर प्रस्तुत किया जाएगा। इसके बाद आगे की कार्रवाई तय होगी। माना जा रहा है कि जांच पूरी होने के बाद आरोपियों पर सख्त कार्रवाई हो सकती है और घोटाले में शामिल अन्य लोगों की भी पहचान की जा सकती है।

उधर, जिला स्तर पर भी जांच प्रक्रिया जारी है और संबंधित विभागों से अतिरिक्त जानकारी जुटाई जा रही है। इस पूरे मामले ने सरकारी तंत्र में वित्तीय अनुशासन और निगरानी व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब अब जांच रिपोर्ट के बाद ही सामने आएगा।

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