नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के एक कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनहीनता मामले में कड़ा रुख अपनाया है। कर्मचारी को 11 दिनों की अनधिकृत अनुपस्थिति (AWOL) के कारण सेवा से हटा दिया गया था, और उच्च न्यायालय ने उसे राहत दी थी। इसके विरोध में केंद्र सरकार द्वारा दाखिल विशेष अवहेलना याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने याचिका को ₹25,000 के जुर्माने के साथ खारिज कर दिया।
न्यायमूर्ति बीवी नगरत्ना ने स्पष्ट किया कि यह मामला अनुपस्थिति और अनुशासनहीनता का है, और इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “हम लगातार कह रहे हैं—पेंडेंसी, पेंडेंसी। सबसे बड़ा मुकदमेबाज कौन है? सरकार। उच्च न्यायालय ने उसे राहत दी, बावजूद इसके केंद्र सरकार ने इसे सर्वोच्च न्यायालय में लाया। यह अनुपस्थिति और सेवा समाप्ति के मामले में अनुपातहीन कार्रवाई नहीं है।”
न्यायालय ने यह भी कहा कि यह मामला केवल कर्मचारी के खिलाफ जुर्माने और सेवा समाप्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी विभागों द्वारा न्यायालय की प्रक्रिया में लगातार भागीदारी और मामलों को लंबित करने के तरीके पर भी ध्यान आकर्षित करता है। न्यायमूर्ति नगरत्ना ने विशेष रूप से SCBA (Supreme Court Bar Association) के राष्ट्रीय सम्मेलन का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया था कि सरकारी पक्ष की लगातार मुकदमेबाजी न्यायिक पेंडेंसी को बढ़ा रही है।
उन्होंने कहा, “हम SCBA सम्मेलन को गंभीरता से लेते हैं। यह केवल किसी रिसॉर्ट में जाकर लौटने का कार्यक्रम नहीं था। हमने तैयारी की, होमवर्क किया और अपने विचार रखे। यह याद रखने योग्य है।”
सुनवाई के दौरान, असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एसडी संजय ने बताया कि कर्मचारी की अनुपस्थिति केवल 11 दिनों की थी, लेकिन न्यायालय ने इसे कड़ी अनुशासनहीनता और सेवा नियमों का उल्लंघन मानते हुए जुर्माने और सेवा समाप्ति को उचित ठहराया।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला सरकारी विभागों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि न्यायालय की राय और उच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद अनुशासन बनाए रखना अनिवार्य है। वरिष्ठ कर्मचारियों और अधिकारियों को भी यह ध्यान रखना होगा कि सैन्य और सुरक्षा बलों में अनुशासन के मानक अत्यंत कड़े होते हैं, और किसी भी तरह की अनियमितता tolerated नहीं की जाएगी।
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साथ ही, न्यायालय ने केंद्र सरकार से यह स्पष्ट किया कि मुकदमेबाजी के माध्यम से मामलों को लंबित करना और अनुशासनहीन कर्मचारियों की स्थिति को चुनौती देना केवल न्यायिक पेंडेंसी बढ़ाता है। इस निर्णय के बाद सरकारी विभागों के लिए यह एक चेतावनी है कि व्यावहारिक और समयबद्ध तरीके से प्रशासनिक कार्रवाई अपनाना ही सर्वोत्तम है।
सामाजिक और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी इस फैसले को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। विशेषज्ञों और कानून जानकारों ने इसे न्यायालय द्वारा अनुशासन और नियमों की गंभीरता को मान्यता देने वाला कदम बताया। उन्होंने कहा कि यह निर्णय उन कर्मचारियों और विभागों के लिए उदाहरण होगा, जो न्यायालय के आदेशों और सेवा नियमों को नजरअंदाज करते हैं।
इस फैसले से यह भी स्पष्ट हो गया कि सर्वोच्च न्यायालय अब सरकारी पक्ष की लगातार याचिकाओं के कारण मामलों को लंबित रखने की रणनीति को स्वीकार नहीं करेगा। जुर्माने और खारिजी आदेश ने यह संदेश दिया कि न्यायिक प्रक्रिया में सरकारी पक्ष की भूमिका जिम्मेदार और अनुशासित होनी चाहिए।
निष्कर्ष- CISF कर्मचारी की सेवा समाप्ति और जुर्माने का मामला सरकारी कर्मचारियों और विभागों दोनों के लिए अनुशासन और न्यायिक आदेशों के पालन का संदेश है। यह निर्णय यह भी रेखांकित करता है कि सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक पेंडेंसी को कम करने और अनुशासन बनाए रखने में गंभीर है।
