राजगढ़। निवेश की रकम दोगुनी करने का झांसा देकर करीब ₹2 करोड़ की ठगी करने वाले अंतरराज्यीय गिरोह का राजगढ़ पुलिस ने पर्दाफाश किया है। ‘ऑपरेशन मनी ट्रैप’ के तहत पुलिस ने करीब 35 दिनों तक 10 राज्यों में 30 हजार किलोमीटर तक आरोपियों का पीछा किया और 14 लोगों को गिरफ्तार किया। कार्रवाई के दौरान ₹1.73 करोड़ नकद, चार लग्जरी वाहन और 19 एंड्रॉयड मोबाइल समेत कुल ₹2.92 करोड़ से अधिक की संपत्ति जब्त की गई है।
मामला ब्यावरा निवासी 46 वर्षीय देवेंद्र पालीवाल की शिकायत से सामने आया। शिकायत के अनुसार, प्रफुल्ल गजभिये ने खुद को बड़ी कंपनी से जुड़े लोगों का परिचित बताते हुए निवेश की रकम दोगुनी करने का भरोसा दिलाया। इसके बाद गिरोह के सदस्यों ने कंपनी से संबंध होने का दावा करते हुए फर्जी ई-मेल, दस्तावेज और स्वीकृति-पत्र दिखाकर पीड़ित का विश्वास जीता।
₹2 करोड़ नकद लेकर दिखाया ₹4 करोड़ का फर्जी RTGS
पुलिस के अनुसार, निवेश के नाम पर पीड़ित से 22 जुलाई को भोपाल के जहांगीराबाद स्थित एक कूरियर कार्यालय में ₹2 करोड़ नकद लिए गए। आरोपियों ने दावा किया कि रकम हवाला और आंगड़िया नेटवर्क के जरिए भेजी जाएगी। भरोसा बनाए रखने के लिए आरोपियों ने ₹4 करोड़ के RTGS ट्रांसफर का फर्जी स्क्रीनशॉट भी दिखाया और इसके बाद मौके से फरार हो गए।
रकम वापस नहीं मिलने पर पीड़ित को ठगी का पता चला और उसने पुलिस से शिकायत की। इसके बाद पुलिस ने आरोपियों की पहचान और उनके बीच संपर्क की कड़ियां जोड़ने के लिए व्यापक जांच शुरू की।
50 पुलिसकर्मी, 3 हजार से ज्यादा CCTV फुटेज खंगाले
आरोपियों तक पहुंचने और रकम बरामद करने के लिए पुलिस ने 10 विशेष टीमें गठित कीं। करीब 50 पुलिस अधिकारी और कर्मचारी जांच में लगाए गए। आरोपियों की आवाजाही और आपसी संपर्क का पता लगाने के लिए अलग-अलग राज्यों के 3,000 से अधिक CCTV फुटेज खंगाले गए।
करीब 35 दिनों तक चली कार्रवाई में महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, केरल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा समेत 10 राज्यों में दबिश दी गई। इसी दौरान अलग-अलग स्थानों से 14 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।
छह स्तरों पर चल रहा था पूरा नेटवर्क
जांच में गिरोह के काम करने का एक सुनियोजित तरीका सामने आया। पहले संभावित निवेशकों की पहचान की जाती थी। इसके बाद महंगी कारों, होटलों में बैठकों और बड़ी कंपनियों के नाम का इस्तेमाल कर भरोसा बनाया जाता था। तीसरे चरण में फर्जी ई-मेल, स्वीकृति-पत्र और भुगतान संदेश दिखाकर निवेश को वास्तविक साबित किया जाता था।
इसके बाद बड़ी रकम नकद में ली जाती थी, ताकि सामान्य बैंकिंग रिकॉर्ड से बचा जा सके। रकम को हवाला या आंगड़िया नेटवर्क के जरिए अलग-अलग शहरों तक पहुंचाया जाता था और अंत में सदस्यों के बीच बांटकर आरोपी अपने ठिकाने और मोबाइल नंबर बदल देते थे।
पुलिस के मुताबिक, गिरोह का प्रत्येक सदस्य ट्रेड नाम या फर्जी पहचान का इस्तेमाल करता था। साथ ही किसी सदस्य को नेटवर्क की केवल सीमित कड़ियों की जानकारी होती थी, जिससे पूरी श्रृंखला का पता लगाना मुश्किल हो जाता था।
Algoritha Security Launches ‘Make in India’ Cyber Lab for Educational Institutions
कोई कंपनी एजेंट तो कोई CA और डायरेक्टर बना
जांच के अनुसार, माधव असोरे, सुजीत टेंबेकर और साहिल नीसवाडे संभावित निवेशकों की तलाश कर उन्हें गिरोह तक पहुंचाते थे। प्रफुल्ल गजभिये और सचित कामले खुद को कंपनी एजेंट बताते थे, जबकि दिनेश वीरानी ने कथित तौर पर चार्टर्ड अकाउंटेंट और वासुदेव गाडेकर ने कंपनी डायरेक्टर के रूप में पहचान बनाई।
निवेश के सिलसिले में भोपाल और ब्यावरा के होटलों में बैठकें आयोजित की गईं। पुलिस के अनुसार, बाद में आंगड़िया नेटवर्क से जुड़े आरिफ हुसैन के निर्देश पर सन्नी उर्फ शमीम मंडल और मुस्कीम मंडल ने भोपाल में नकदी ली और फर्जी RTGS स्क्रीनशॉट दिखाया।
₹1.73 करोड़ नकद और चार वाहन बरामद
पुलिस ने गिरफ्तार आरोपियों के कब्जे से कुल ₹1,73,16,000 नकद, चार वाहन और 19 मोबाइल बरामद किए। जब्त संपत्ति की कुल कीमत ₹2,92,91,000 बताई गई है। आरिफ हुसैन से ₹46 लाख नकद, दो कार और तीन मोबाइल, अशोक चौधरी से ₹42 लाख और एक कार तथा नवीन जैन से ₹30 लाख बरामद होने की जानकारी दी गई है। सन्नी उर्फ शमीम मंडल से ₹25 लाख और एक कार भी जब्त की गई।
इंदौर में भी ठगी की तैयारी का खुलासा
पूछताछ में पुलिस को पता चला कि गिरोह ने इंदौर में भी इसी तरह की ठगी की योजना बनाई थी, लेकिन राजगढ़ पुलिस की कार्रवाई के कारण इसे अंजाम नहीं दिया जा सका। पुलिस के अनुसार, गिरोह पश्चिम बंगाल में ₹50 लाख और दिल्ली में एक पुलिस अधिकारी से भी ₹50 लाख की ठगी कर चुका है।
जांच में उदयपुर, पश्चिम बंगाल, इंदौर, भोपाल, दिल्ली और मुंबई में गिरोह के कथित कार्यालय होने की जानकारी भी सामने आई है। बरामद मोबाइल की तकनीकी जांच के जरिए अन्य सदस्यों और संभावित पीड़ितों का पता लगाया जा रहा है।
विशेषज्ञ बोले- भरोसा जीतना इस तरह की ठगी का सबसे बड़ा हथियार
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के मुताबिक, निवेश आधारित ठगी में अपराधी अक्सर तकनीकी साधनों के साथ मनोवैज्ञानिक दबाव का इस्तेमाल करते हैं। फर्जी दस्तावेज, बड़े कारोबारी नाम, महंगी गाड़ियां और नकली बैंकिंग स्क्रीनशॉट पीड़ित को यह विश्वास दिलाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं कि सामने वाला व्यक्ति या संस्था वास्तविक है।
उन्होंने कहा कि किसी भी बड़े निवेश प्रस्ताव में कंपनी की स्वतंत्र रूप से पुष्टि, आधिकारिक दस्तावेजों की जांच और बैंकिंग माध्यम से लेनदेन जरूरी है। असामान्य रूप से अधिक या निश्चित रिटर्न का दावा निवेशक के लिए सबसे बड़ा चेतावनी संकेत होना चाहिए।
पुलिस अब बरामद मोबाइल और वित्तीय रिकॉर्ड की जांच कर रही है। इससे गिरोह के अन्य सदस्यों, कथित कार्यालयों और इससे जुड़ी अन्य ठगी की घटनाओं का पता चलने की उम्मीद है। मामले में आगे की कार्रवाई जांच से सामने आने वाले साक्ष्यों के आधार पर की जाएगी।
