लखनऊ। नैनीताल बैंक की डालीगंज शाखा में फर्जी पहचान पत्रों और कथित जाली दस्तावेजों के आधार पर होम लोन हासिल कर करीब ₹1.87 करोड़ की धोखाधड़ी का मामला सामने आया है। बैंक की आंतरिक जांच में नौ आवास ऋण खातों में गंभीर अनियमितताएं मिलने के बाद हसनगंज थाने में 18 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। आरोपियों में लोन लेने वाले लोगों के अलावा बैंक के पैनल अधिवक्ता और वैल्यूअर भी शामिल हैं।
बैंक के अनुसार, 17 मई से 27 जून 2025 के बीच डालीगंज शाखा से नौ होम लोन स्वीकृत किए गए थे। किश्तों का भुगतान नहीं होने के बाद संबंधित ऋण खाते NPA की श्रेणी में पहुंच गए। बैंक रिकॉर्ड के मुताबिक, इन नौ खातों में मौजूदा बकाया राशि करीब ₹1,87,55,682 है। इसके बाद कराए गए आंतरिक सत्यापन में ऋण प्रक्रिया और जमा दस्तावेजों को लेकर कई गंभीर अनियमितताएं सामने आईं।
जांच के दौरान बैंक को बिक्री विलेख, पहचान पत्र और संपत्ति से जुड़े दस्तावेज संदिग्ध मिले। आरोप है कि कुछ दस्तावेजों पर फर्जी मोहर और हस्ताक्षर लगाए गए थे। बैंक द्वारा संपत्तियों के वास्तविक मालिकों से संपर्क किए जाने पर कुछ लोगों ने संबंधित संपत्तियों पर ऋण लेने या उन्हें बैंक के पास गिरवी रखने की जानकारी होने से इनकार किया।
मामले में यह भी आरोप है कि वास्तविक संपत्ति मालिकों की जगह दूसरे लोगों को पेश कर संपत्तियों को बैंक के पास बंधक कराया गया। इस तरह कथित तौर पर ऋण प्रक्रिया में संपत्ति के स्वामित्व और आवेदकों की वास्तविक पहचान छिपाई गई। बैंक ने इसे ऋण स्वीकृति प्रक्रिया में गंभीर दस्तावेजी धोखाधड़ी माना है।
बैंक की शिकायत के अनुसार, पैनल अधिवक्ता आशीष सिंह और नरेंद्र सिंह मेहता पर संपत्तियों के स्वामित्व से संबंधित गलत रिपोर्ट तैयार करने का आरोप है। वहीं पैनल वैल्यूअर सत्येंद्र कुमार वर्मा पर संपत्तियों का कथित तौर पर बढ़ा-चढ़ाकर मूल्यांकन करने का आरोप लगाया गया है। बैंक का दावा है कि इन रिपोर्टों के आधार पर ऋण प्रक्रिया आगे बढ़ी और संबंधित आवेदकों को रकम जारी की गई।
बैंक के अनुसार, एक मामले में मोहम्मद उमैर ने कैश क्रेडिट और कार लोन भी लिया था। शिकायत में सभी संबंधित ऋणों की कुल स्वीकृत राशि करीब ₹1.94 करोड़ बताई गई है, जबकि नौ होम लोन खातों में मौजूदा बकाया करीब ₹1.87 करोड़ है। बैंक अब इन सभी ऋण खातों से जुड़े दस्तावेजों और लेनदेन की जांच कर रहा है।
किश्तों का भुगतान नहीं होने पर बैंक ने पहले ऋण खाताधारकों को नोटिस भेजे थे। जवाब नहीं मिलने के बाद गिरवी रखी संपत्तियों और उनके दस्तावेजों का दोबारा सत्यापन कराया गया। इसी दौरान कथित फर्जीवाड़े का पता चला। बैंक की ओर से पुलिस और वरिष्ठ अधिकारियों को शिकायत भेजे जाने के बाद भी तत्काल कार्रवाई नहीं होने पर अदालत का रुख किया गया।
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अदालत के आदेश के बाद हसनगंज पुलिस ने भारती अग्रवाल, रूचि अग्रवाल, ज्ञान सिंह, बाबू लाल, आशीष सिंह, नरेंद्र सिंह मेहता, सत्येंद्र कुमार वर्मा, भावना रस्तोगी, दिवाकर उपाध्याय, अभिषेक अस्थाना, मोहम्मद उमैर, शेख मोहम्मद सलीम, मोहम्मद रेहान, आफताब आलम, शहजाद आलम, मुकेश यादव, मार्डन फर्नीचर और मो. उमेर के खिलाफ मामला दर्ज किया है।
बैंक रिकॉर्ड में भावना रस्तोगी, दिवाकर उपाध्याय, अभिषेक अस्थाना और मोहम्मद उमैर के नाम ₹20-20 लाख के ऋण दर्ज हैं। शेख मोहम्मद सलीम के नाम ₹19 लाख, मोहम्मद रेहान और आफताब आलम के नाम ₹18-18 लाख तथा शहजाद आलम और मुकेश यादव के नाम ₹20-20 लाख के ऋण बताए गए हैं। मार्डन फर्नीचर के नाम ₹9.50 लाख और मो. उमेर के नाम ₹10 लाख का ऋण भी सामने आया है।
साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी Prof. Triveni Singh के अनुसार, फर्जी पहचान और डिजिटल दस्तावेजों का इस्तेमाल कर वित्तीय संस्थानों की सत्यापन प्रक्रिया को दरकिनार करना संगठित आर्थिक अपराध का गंभीर संकेत है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में केवल दस्तावेजों की जांच पर्याप्त नहीं है; बैंकिंग संस्थानों को पहचान, संपत्ति रिकॉर्ड, डिजिटल आवेदन प्रक्रिया और धन के अंतिम इस्तेमाल के बीच संबंधों की भी जांच करनी चाहिए।
पुलिस अब FIR में नामजद सभी लोगों की भूमिका, ऋण आवेदनों में लगाए गए दस्तावेजों, संपत्तियों के वास्तविक स्वामित्व, बैंक रिकॉर्ड और कथित फर्जी रिपोर्टों की जांच कर रही है। साथ ही यह पता लगाया जा रहा है कि ऋण की रकम कहां इस्तेमाल हुई और पूरी प्रक्रिया में किन लोगों की क्या भूमिका थी।
मामले में लगाए गए आरोपों की पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान होगी। यह प्रकरण संपत्ति आधारित ऋण में पहचान सत्यापन, स्वामित्व जांच और वैल्यूएशन प्रक्रिया को स्वतंत्र एवं बहुस्तरीय बनाए रखने की जरूरत को भी सामने लाता है।
