रायपुर। छत्तीसगढ़ में सोशल मीडिया पर कथित तौर पर छेड़छाड़ किए गए राजनीतिक कंटेंट को लेकर पुलिस शिकायतों में तेजी आई है। AI से तैयार वीडियो, डिजिटल रूप से बदली गई फुटेज, आपत्तिजनक पोस्ट और भ्रामक वीडियो के जरिए नेताओं और जनप्रतिनिधियों को निशाना बनाए जाने के आरोप सामने आ रहे हैं। अकेले रायपुर में पिछले दो सप्ताह के दौरान आधा दर्जन से अधिक FIR दर्ज की गई हैं।
लगातार बढ़ती शिकायतों से संकेत मिल रहा है कि राज्य में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अब पारंपरिक बयानबाजी से आगे बढ़कर डिजिटल कंटेंट की लड़ाई में बदल रही है। पुलिस ऐसे मामलों की जांच कर रही है, जहां राजनीतिक आलोचना और कथित मानहानि, गाली-गलौज, धार्मिक आपत्ति या जानबूझकर भ्रामक जानकारी फैलाने के बीच की सीमा पार करने के आरोप लगाए गए हैं।
राजनीतिक शिकायतों के बाद पुलिस कार्रवाई
हालिया मामलों में एक FIR सत्तारूढ़ BJP के प्रवक्ता की शिकायत पर दर्ज की गई। रायपुर पुलिस ने छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम के अध्यक्ष अरुण पन्नालाल को भगवान शिव और सनातन धर्म के संबंध में कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों के मामले में गिरफ्तार किया।
पुलिस अब यह जांच कर रही है कि कथित आपत्तिजनक सामग्री किस परिस्थिति में तैयार और साझा की गई तथा इसके पीछे क्या उद्देश्य था। जांच में सोशल मीडिया पोस्ट के डिजिटल स्रोत, उसे प्रसारित करने वाले खातों और सामग्री की वास्तविकता की भी पड़ताल की जा रही है।
सुप्रिया श्रीनेत और नेहा राठौर पर भी मामला
एक अन्य मामले में कांग्रेस की राष्ट्रीय सोशल मीडिया प्रभारी सुप्रिया श्रीनेत और लोक गायिका नेहा राठौर पर BJP नेता अजय चंद्राकर से संबंधित कथित भ्रामक वीडियो साझा करने का मामला दर्ज किया गया है।
शिकायत में आरोप है कि वीडियो में चंद्राकर को 15 अगस्त के मौके पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे की जगह पार्टी का झंडा फहराते हुए दिखाया गया। अब पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि वीडियो को संपादित या डिजिटल रूप से इस तरह बदला गया था या नहीं, जिससे घटना की गलत तस्वीर सामने आए।
इस मामले ने सोशल मीडिया पर छोटे वीडियो की तेजी से होने वाली वायरल प्रक्रिया को लेकर भी चिंता बढ़ाई है। एडिटेड फुटेज कई बार मूल वीडियो की पुष्टि होने से पहले ही बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच जाती है।
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राष्ट्रीय ध्वज से छेड़छाड़ का AI आरोप
एक अन्य मामले में कांग्रेस नेता अरुण साहू पर कथित तौर पर AI तकनीक का इस्तेमाल कर राष्ट्रीय ध्वज को डिजिटल रूप से बदलने का आरोप लगा है।
यह मामला राजनीतिक सोशल मीडिया विवादों के बदलते स्वरूप को दिखाता है। AI आधारित तकनीक से तस्वीरों और वीडियो में ऐसी छेड़छाड़ संभव है, जिसे आम यूजर तुरंत पहचान नहीं पाता। ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों के लिए मूल सामग्री और बदली गई सामग्री के बीच अंतर स्थापित करना महत्वपूर्ण हो जाता है।
जांच में डिजिटल फाइल, मूल स्रोत, संबंधित सोशल मीडिया खाते और कंटेंट के प्रसार की प्रक्रिया को खंगाला जा सकता है।
AI कंटेंट ने पुलिस के सामने बढ़ाई चुनौती
AI से तैयार या AI की मदद से बदली गई सामग्री पुलिस और जांच एजेंसियों के लिए नई चुनौती बन रही है। ऐसी सामग्री तेजी से तैयार होने के साथ कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक साथ प्रसारित हो सकती है। इससे उसके मूल स्रोत का पता लगाना मुश्किल हो जाता है।
वहीं, जांच एजेंसियों के सामने यह भी चुनौती है कि वैध राजनीतिक आलोचना, व्यंग्य और ऐसे कंटेंट के बीच अंतर किया जाए, जो कानून की सीमा का उल्लंघन कर सकता है। किसी वीडियो या पोस्ट की जांच में उसका संदर्भ, उद्देश्य और उसे साझा करने का तरीका महत्वपूर्ण हो सकता है।
हालिया मामलों ने डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की जरूरत भी बढ़ा दी है। जांच में मेटाडेटा, मूल फाइल, संचार रिकॉर्ड और किसी सामग्री के अपलोड तथा प्रसार की पूरी प्रक्रिया महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकती है।
राजनीतिक टकराव का नया मैदान बना सोशल मीडिया
छत्तीसगढ़ में राजनीतिक दलों के बीच तीखी प्रतिस्पर्धा के बीच सोशल मीडिया राजनीतिक संदेशों और जवाबी हमलों का प्रमुख माध्यम बन गया है। पार्टियां अपने पक्ष को मजबूत करने और विरोधियों पर हमला करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रही हैं।
हालांकि, हालिया FIR यह संकेत देती हैं कि AI-जनित सामग्री और एडिटेड वीडियो राजनीतिक विवाद को सीधे पुलिस जांच तक ले जा सकते हैं। आने वाले दिनों में पुलिस ऐसे मामलों में डिजिटल साक्ष्यों और कंटेंट की वास्तविकता की जांच पर अधिक जोर दे सकती है।
