मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने 78 वर्षीय सेवानिवृत्त IAS अधिकारी को राहत देते हुए उनके 54 वर्षीय बेटे को पिता के फ्लैट से बेदखल करने का आदेश दिया है। बेटे ने अपने पिता को मानसिक रूप से अस्वस्थ बताते हुए उनकी मानसिक स्थिति की जांच के लिए मेडिकल बोर्ड गठित करने की मांग की थी। अदालत ने इस मांग को खारिज करते हुए कहा कि उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड से स्थायी मानसिक बीमारी का कोई आधार सामने नहीं आता। अदालत ने कानूनी प्रक्रिया के कथित दुरुपयोग के लिए बेटे पर ₹5 लाख का हर्जाना भी लगाया है।
मामला मुंबई के अंधेरी स्थित फ्लैट और पैतृक संपत्ति से जुड़े पुराने विवाद का है। 54 वर्षीय बेटे ने वर्ष 2015 में संपत्ति के बंटवारे को लेकर पिता के खिलाफ मुकदमा दायर किया था। यह मुकदमा अभी लंबित है। इसी विवाद के दौरान दिसंबर 2025 में बेटे ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर पिता की मानसिक स्थिति की जांच के लिए मेडिकल बोर्ड गठित करने की मांग की।
बेटे का दावा था कि पिता मानसिक रूप से बीमार हैं और इसलिए वह अपने कानूनी मामलों को स्वतंत्र रूप से संभालने की स्थिति में नहीं हैं। उसने पिता के फ्लैट पर भी अपना दावा जताया। दूसरी ओर, पिता ने ‘माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007’ के तहत बेटे को संपत्ति से हटाने और कथित मानसिक उत्पीड़न से राहत देने की मांग की थी।
मेडिकल रिपोर्ट में डायबिटीज का उल्लेख
बेटे ने अपनी दलील के समर्थन में जुलाई 2024 की मेडिकल रिपोर्ट अदालत के सामने पेश की। रिपोर्ट की जांच के बाद अदालत ने पाया कि इसमें पिता के डायबिटीज से पीड़ित होने का उल्लेख है, लेकिन किसी स्थायी मानसिक बीमारी का निदान नहीं किया गया था।
मेडिकल रिकॉर्ड के अनुसार, इंसुलिन लेने के बाद रक्त शर्करा का स्तर कम होने पर पिता को हाइपोग्लाइसीमिया के कारण कुछ समय के लिए भ्रम, पसीना आने और भूलने जैसी शिकायतें हो सकती थीं। हालांकि, प्रमाणपत्र में इन लक्षणों को अस्थायी बताया गया था। अदालत ने इसी आधार पर मानसिक बीमारी का दावा स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
बेटे ने यह भी आरोप लगाया कि पिता अपनी डॉक्टर सौतेली मां के साथ रहते हैं और उसे उनसे मिलने नहीं दिया जाता। उसने दावा किया कि इस वजह से पिता अपने कानूनी मामलों पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की स्थिति में नहीं हैं। अदालत ने इन आरोपों को मानसिक अक्षमता साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना।
Algoritha Security Launches ‘Make in India’ Cyber Lab for Educational Institutions
मानसिक स्वास्थ्य कानून को लेकर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
न्यायमूर्ति एस. गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कानूनी प्रावधानों के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि मानसिक बीमारी से पीड़ित लोगों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का इस्तेमाल किसी व्यक्ति पर दबाव बनाने या संपत्ति विवाद में रणनीतिक हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता।
पीठ ने मेडिकल बोर्ड गठित करने की बेटे की मांग को खारिज कर दिया। साथ ही, उसे पिता के फ्लैट से बेदखल करने का आदेश दिया। अदालत ने कानूनी प्रक्रिया का कथित दुरुपयोग करने और बुजुर्ग पिता को अनावश्यक मुकदमेबाजी में उलझाने के लिए बेटे पर ₹5 लाख का हर्जाना लगाया। यह राशि पिता को भुगतान करनी होगी।
संपत्ति विवाद में मानसिक अक्षमता के दावे पर अहम संदेश
अदालत के फैसले से यह स्पष्ट हुआ कि किसी बुजुर्ग व्यक्ति की संपत्ति या कानूनी अधिकारों को चुनौती देने के लिए केवल उम्र, अस्थायी स्वास्थ्य संबंधी लक्षण या पारिवारिक मतभेद पर्याप्त आधार नहीं हो सकते। मानसिक अक्षमता का दावा ठोस और विश्वसनीय चिकित्सकीय साक्ष्यों पर आधारित होना जरूरी है।
मामले में अदालत ने उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद बेटे की याचिका को खारिज किया। साथ ही पिता के संपत्ति और आवास संबंधी अधिकारों को संरक्षण दिया। अदालत की टिप्पणी का व्यापक संदेश यह है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कानूनों का इस्तेमाल वास्तविक सुरक्षा और सहायता के लिए होना चाहिए, न कि संपत्ति विवाद को प्रभावित करने के लिए।
