ओटावा/अल्बर्टा। खनन, पर्यावरण और अंतरराष्ट्रीय निवेश नियमों के टकराव का एक बड़ा मामला सामने आया है, जहां ऑस्ट्रेलिया की खनन उद्योग से जुड़ी अरबपति Gina Rinehart की कंपनी Northback Holdings ने कनाडा सरकार के खिलाफ करीब ₹16,600 करोड़ (लगभग 2 अरब डॉलर) का दावा ठोक दिया है। विवाद की जड़ ग्रैसी माउंटेन कोयला परियोजना है, जिसे पर्यावरणीय कारणों से मंजूरी नहीं दी गई थी।
यह दावा Comprehensive and Progressive Agreement for Trans-Pacific Partnership के तहत दायर किया गया है। इस समझौते में शामिल निवेशक-राज्य विवाद निपटान (ISDS) प्रावधान कंपनियों को यह अधिकार देता है कि वे सरकारों के फैसलों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का रास्ता अपना सकें।
परियोजना ठुकराने से शुरू हुआ टकराव
ग्रैसी माउंटेन परियोजना अल्बर्टा के दक्षिणी हिस्से में प्रस्तावित थी, जहां हर साल लाखों टन धातुकर्म कोयले के खनन की योजना थी। यह इलाका Oldman River के जलग्रहण क्षेत्र में आता है, जो स्थानीय समुदायों, किसानों और सिंचाई व्यवस्था के लिए बेहद अहम माना जाता है।
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साल 2021 में एक संयुक्त समीक्षा पैनल ने विस्तृत सुनवाई के बाद इस परियोजना को पर्यावरण और आर्थिक दोनों आधारों पर “सार्वजनिक हित के खिलाफ” बताया था। रिपोर्ट में विशेष रूप से जल प्रदूषण, सेलेनियम के खतरे और पारिस्थितिकी तंत्र पर संभावित असर को लेकर चिंता जताई गई थी। इसके बाद कनाडा और अल्बर्टा सरकारों ने परियोजना को मंजूरी देने से इनकार कर दिया।
कंपनी का आरोप—न्यायपूर्ण प्रक्रिया नहीं मिली
कंपनी का कहना है कि उसे परियोजना के मूल्यांकन में उचित प्रक्रिया, पारदर्शिता और निष्पक्ष सुनवाई नहीं दी गई। उसके अनुसार, इस फैसले के चलते उसके निवेश का मूल्य पूरी तरह खत्म हो गया।
शुरुआत में कंपनी ने करीब ₹58,000 करोड़ (7 अरब डॉलर) का दावा किया था, जिसे बाद में घटाकर ₹16,600 करोड़ कर दिया गया। अब यह मामला अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन की प्रक्रिया में है और इसके लिए पैनल का गठन भी शुरू हो चुका है।
घरेलू अदालतों से राहत नहीं, अब अंतरराष्ट्रीय मंच
परियोजना को मंजूरी दिलाने के लिए कंपनी ने पहले कनाडा की अदालतों का दरवाजा खटखटाया, लेकिन उसे कोई राहत नहीं मिली। अपील अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक, सभी स्तरों पर कंपनी के दावे खारिज कर दिए गए।
इसके बाद कंपनी ने अंतरराष्ट्रीय मंच का सहारा लिया। इससे पहले भी अल्बर्टा में खनन नीतियों को लेकर कई विदेशी कंपनियां सरकार के खिलाफ बड़े दावे कर चुकी हैं, जिनमें कुछ मामलों का निपटारा समझौते के जरिए हुआ।
ISDS प्रावधान पर बढ़ती बहस
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों ने ISDS व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आलोचकों के अनुसार, यह तंत्र विदेशी कंपनियों को अत्यधिक शक्तिशाली बना देता है, जिससे वे सरकारों के नीतिगत फैसलों को चुनौती दे सकती हैं।
खासतौर पर यह चिंता जताई जा रही है कि कंपनियां भविष्य में संभावित मुनाफे के आधार पर भी मुआवजे की मांग कर सकती हैं, भले ही परियोजना जमीन पर शुरू ही न हुई हो। इससे सार्वजनिक नीति और लोकतांत्रिक फैसलों पर दबाव बढ़ने का खतरा रहता है।
पर्यावरण बनाम निवेश—नीति का टकराव
यह विवाद पर्यावरण संरक्षण और निवेश सुरक्षा के बीच बढ़ते टकराव को उजागर करता है। एक ओर सरकारें जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए सख्त फैसले ले रही हैं, वहीं कंपनियां इन्हें अपने निवेश अधिकारों का उल्लंघन बता रही हैं।
स्थानीय स्तर पर किसानों, रैंचरों, आदिवासी समुदायों और पर्यावरण समूहों ने इस परियोजना का व्यापक विरोध किया था। उनका कहना था कि इससे जल स्रोतों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान हो सकता है।
सरकारों के सामने नई चुनौती
विश्लेषकों के मुताबिक, इस तरह के अंतरराष्ट्रीय मुकदमे सरकारों के लिए नई चुनौती बनते जा रहे हैं। भारी मुआवजे के डर से कई बार नीतिगत फैसलों पर दबाव बन सकता है, जिससे सार्वजनिक हित प्रभावित होने की आशंका रहती है।
ग्रैसी माउंटेन परियोजना को लेकर शुरू हुआ यह विवाद अब एक बड़े उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है, जहां पर्यावरण, निवेश और संप्रभुता के बीच संतुलन बनाना सरकारों के लिए कठिन होता जा रहा है।
