गाजियाबाद के करदाता ने स्टांप ड्यूटी मूल्य से ₹10.78 लाख कम में खरीदी थी संपत्ति; आयकर नोटिस के बाद अंतर राशि पर टैक्स जमा किया, ITAT ने माना—जानबूझकर आय छिपाने का ठोस सबूत नहीं

₹48 लाख में खरीदी संपत्ति, स्टांप वैल्यू ₹58.7 लाख; ITAT ने ₹70,700 की टैक्स पेनल्टी क्यों रद्द की?

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By Roopa
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नई दिल्ली। संपत्ति की खरीद कीमत और उसके स्टांप ड्यूटी मूल्य में बड़ा अंतर होने पर आयकर विभाग की नजर पड़ सकती है। गाजियाबाद के इंदिरापुरम में संपत्ति खरीद से जुड़े एक मामले में ऐसा ही हुआ, जहां ₹48 लाख में खरीदी गई संपत्ति का स्टांप ड्यूटी मूल्य ₹58.7 लाख था। करीब ₹10.78 लाख के इस अंतर को लेकर आयकर विभाग ने कार्रवाई की और करदाता पर ₹70,700 की पेनल्टी लगा दी। हालांकि, आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT), दिल्ली ने बाद में यह पेनल्टी रद्द कर दी।

मामला उस समय आयकर विभाग की जांच के दायरे में आया, जब करदाता ने संपत्ति खरीद के संबंध में आयकर रिटर्न दाखिल नहीं किया था। विभाग के पास उपलब्ध लेनदेन संबंधी जानकारी और संपत्ति के स्टांप ड्यूटी मूल्य के आधार पर खरीद की जांच शुरू हुई। आकलन अधिकारी ने आयकर कानून की धारा 148 के तहत नोटिस जारी कर लेनदेन के बारे में स्पष्टीकरण मांगा।

विभाग को आशंका थी कि संपत्ति की वास्तविक खरीद कीमत स्टांप ड्यूटी मूल्य से अधिक हो सकती है और अतिरिक्त राशि विक्रेता को किसी अन्य माध्यम से दी गई हो। यानी दस्तावेजों में ₹48 लाख की कीमत दर्ज होने के बावजूद ₹58.7 लाख के स्टांप मूल्य और खरीद मूल्य के बीच के अंतर को लेकर सवाल उठे।

नोटिस मिलने के बाद करदाता ने अपना आयकर रिटर्न दाखिल किया। उसने ₹10.78 लाख की अंतर राशि को घोषित किया और उस पर देय टैक्स का भुगतान करने पर सहमति जताई। हालांकि, इस खुलासे के बावजूद आकलन अधिकारी ने आय की कम रिपोर्टिंग के लिए अलग से दंडात्मक कार्रवाई शुरू कर दी।

आयकर विभाग ने धारा 270A के तहत ₹70,700 की पेनल्टी लगाई। पहली अपीलीय प्राधिकरण ने भी विभाग की कार्रवाई को बरकरार रखा। इसके बाद करदाता ने ITAT का रुख किया और पेनल्टी हटाने की मांग की।

करदाता की ओर से दलील दी गई कि वह अर्धशिक्षित है और आयकर कानूनों की बारीकियों की उसे सीमित जानकारी थी। उसका कहना था कि आयकर विभाग की ओर से नोटिस मिलने के बाद उसने संबंधित अंतर राशि को स्वयं स्वीकार किया, आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराई और देय टैक्स का भुगतान किया। इसलिए मामले में जानबूझकर आय छिपाने या गलत जानकारी देने की मंशा नहीं थी।

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ITAT दिल्ली ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि आयकर विभाग ने रिकॉर्ड पर ऐसा पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं किया, जिससे करदाता की ओर से आय छिपाने की दुर्भावनापूर्ण मंशा साबित हो। न्यायाधिकरण ने धारा 270A(6)(a) में दिए गए अपवाद पर भी गौर किया। इस प्रावधान के तहत कुछ परिस्थितियों में आय की कम रिपोर्टिंग को दंड के दायरे से बाहर रखा जा सकता है, यदि करदाता वास्तविक और सद्भावनापूर्ण स्पष्टीकरण देता है तथा उससे जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखता है।

न्यायाधिकरण ने इसी आधार पर करदाता की अपील स्वीकार करते हुए ₹70,700 की पेनल्टी रद्द कर दी। हालांकि, फैसले का अर्थ यह नहीं है कि संपत्ति की खरीद कीमत और स्टांप ड्यूटी मूल्य में अंतर होने पर हर मामले में आयकर पेनल्टी स्वतः खत्म हो जाएगी।

इस मामले से जुड़ा अहम पहलू यह है कि केवल यह कहना कि करदाता की आय छिपाने की मंशा नहीं थी, अपने आप में धारा 270A के तहत लगाई गई पेनल्टी को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है। पेनल्टी से बचने के लिए कानून में निर्धारित अपवाद की शर्तों को पूरा करना जरूरी है। यहां न्यायाधिकरण ने पाया कि करदाता ने नोटिस मिलने के बाद अंतर राशि का खुलासा किया और विभाग के सामने संबंधित तथ्य रखे थे।

संपत्ति खरीदने वालों के लिए यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आयकर विभाग के पास संपत्ति पंजीकरण और स्टांप ड्यूटी से जुड़ी जानकारी उपलब्ध होती है। यदि खरीद मूल्य और स्टांप ड्यूटी मूल्य में अंतर है, तो लेनदेन की जानकारी करदाता की ओर से दाखिल रिटर्न और घोषित आय से मिलाई जा सकती है। खासतौर पर रिटर्न दाखिल न करने या अन्य अनुपालन संबंधी कमी होने पर लेनदेन जांच के दायरे में आ सकता है।

ऐसी स्थिति में खरीदार के लिए खरीद दस्तावेज, भुगतान का रिकॉर्ड, बैंक लेनदेन और संपत्ति के मूल्य से जुड़े उपलब्ध प्रमाण सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण होता है। यदि विभाग की ओर से नोटिस मिलता है, तो समय पर तथ्यात्मक जवाब देना और आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराना मामले की आगे की कार्रवाई को प्रभावित कर सकता है।

ITAT के इस फैसले में ₹48 लाख की संपत्ति और ₹58.7 लाख के स्टांप मूल्य के बीच का ₹10.78 लाख का अंतर जांच का आधार बना था, लेकिन अंततः ₹70,700 की पेनल्टी इसलिए टिक नहीं सकी क्योंकि मामले में धारा 270A(6)(a) के तहत उपलब्ध वैधानिक अपवाद लागू पाया गया। यह फैसला संपत्ति लेनदेन में सही रिपोर्टिंग और आयकर अनुपालन के महत्व को भी रेखांकित करता है।

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