ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका के बाहर मौजूद कुछ नए H-1B कर्मचारियों के लिए $100,000 भुगतान से जुड़ी प्रवेश पाबंदी को 21 सितंबर 2027 तक बढ़ा दिया है।

ट्रंप ने H-1B वीजा पर ₹93 लाख शुल्क एक साल और बढ़ाया, भारतीय पेशेवरों पर बढ़ेगा असर

Team The420
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वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने H-1B वीजा कार्यक्रम पर लागू कड़े प्रावधानों को एक और साल के लिए बढ़ा दिया है। 18 सितंबर को जारी राष्ट्रपति की नई उद्घोषणा के तहत कुछ नए H-1B कर्मचारियों के अमेरिका में प्रवेश के लिए 1 लाख अमेरिकी डॉलर यानी करीब ₹93 लाख का भुगतान जरूरी रहेगा। यह व्यवस्था 21 सितंबर 2027 तक लागू रहेगी। नई व्यवस्था के साथ प्रशासन ने वीजा आवेदनों की जांच को भी सख्त करने के लिए अलग कार्यकारी आदेश जारी किया है।

व्हाइट हाउस के मुताबिक, 2025 में लागू किए गए 1 लाख डॉलर यानी करीब ₹93 लाख के भुगतान प्रावधान के बाद बड़े आईटी स्टाफिंग और आउटसोर्सिंग समूहों के H-1B पंजीकरण में भारी गिरावट आई। प्रशासन ने बताया कि इन कंपनियों का संयुक्त पंजीकरण 24,946 से घटकर 2,055 रह गया, यानी करीब 92 प्रतिशत की कमी आई। वहीं, अमेरिका में कर्मचारियों को लाने के लिए किए जाने वाले कांसुलर-प्रोसेसिंग अनुरोधों में वित्त वर्ष 2025 से वित्त वर्ष 2027 के बीच करीब 97 प्रतिशत गिरावट दर्ज होने का दावा किया गया है।

नई व्यवस्था के तहत ₹93 लाख का भुगतान मुख्य रूप से उन नए H-1B कर्मचारियों पर लागू है जो अमेरिका के बाहर हैं और जिन्हें वीजा स्वीकृति के बाद अमेरिका में प्रवेश करना है। राष्ट्रपति की उद्घोषणा में राष्ट्रीय हित से जुड़े मामलों में अपवाद का प्रावधान भी रखा गया है। वहीं, पहले से अमेरिका में मौजूद H-1B कर्मचारियों के सामान्य नवीनीकरण को इस प्रवेश प्रतिबंध के दायरे में नहीं रखा गया है।

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ट्रंप प्रशासन ने H-1B आवेदनों की जांच के लिए भी नया तंत्र बनाया है। विदेश विभाग, श्रम विभाग और गृह सुरक्षा विभाग को अन्य संबंधित सरकारी एजेंसियों के साथ समन्वय करने का निर्देश दिया गया है। आवेदन पर विचार करते समय यह भी देखा जाएगा कि संबंधित नियोक्ता ने पिछले एक साल में समान पदों पर काम करने वाले अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की है या भविष्य में ऐसी छंटनी की योजना बना रहा है।

प्रशासन का कहना है कि H-1B कार्यक्रम का उद्देश्य अत्यधिक कुशल और विशेष कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों को अमेरिकी अर्थव्यवस्था की जरूरतों के अनुसार अस्थायी रूप से नियुक्त करना है। व्हाइट हाउस का आरोप है कि कुछ आईटी स्टाफिंग और आउटसोर्सिंग कंपनियों ने इस व्यवस्था का इस्तेमाल कम वेतन वाले विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति और अमेरिकी कर्मचारियों के स्थान पर उन्हें रखने के लिए किया। यह प्रशासन की ओर से कार्यक्रम के दुरुपयोग को लेकर व्यक्त किया गया पक्ष है।

भारतीय पेशेवरों के लिए इस बदलाव का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि H-1B लाभार्थियों में भारत सबसे बड़ा हिस्सेदार है। अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा के वित्त वर्ष 2024 के आंकड़ों के अनुसार, स्वीकृत H-1B याचिकाओं में भारत में जन्मे लाभार्थियों की हिस्सेदारी करीब 71 प्रतिशत थी। इसलिए अमेरिका के बाहर से H-1B के जरिये आने वाले भारतीय आईटी और तकनीकी पेशेवरों के नियोक्ताओं के लिए करीब ₹93 लाख का नया भुगतान महत्वपूर्ण लागत कारक बन सकता है।

H-1B कार्यक्रम को लेकर प्रशासन ने रोजगार बाजार के आंकड़ों का भी हवाला दिया है। व्हाइट हाउस के अनुसार, 2025 के कदम से पहले कंप्यूटर विज्ञान के नए स्नातकों में बेरोजगारी दर 6.1 प्रतिशत और कंप्यूटर इंजीनियरिंग के स्नातकों में 7.5 प्रतिशत थी। प्रशासन ने यह भी कहा कि 2000 से 2019 के बीच विदेशी STEM कर्मचारियों की संख्या दोगुनी से अधिक हुई, जबकि कुल STEM रोजगार में 44.5 प्रतिशत वृद्धि हुई।

नई व्यवस्था में उच्च कौशल और अधिक वेतन वाली नौकरियों की ओर H-1B चयन को बढ़ाने की कोशिश भी की गई है। व्हाइट हाउस के अनुसार, वित्त वर्ष 2027 के लिए कम से कम अमेरिकी मास्टर डिग्री वाले लाभार्थियों का हिस्सा पंजीकरण में 45.1 प्रतिशत से बढ़कर 66.1 प्रतिशत हुआ। प्रशासन का कहना है कि नई नीतियों से कम वेतन और कम कौशल वाली भर्ती में कमी तथा अधिक कौशल वाले कर्मचारियों की हिस्सेदारी बढ़ी है।

H-1B वीजा कार्यक्रम की शुरुआत 1990 में हुई थी और यह अमेरिका में तकनीकी, इंजीनियरिंग, सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त तथा अन्य विशेष क्षेत्रों में विदेशी पेशेवरों की अस्थायी नियुक्ति का प्रमुख माध्यम है। नए शुल्क और कड़ी जांच से इस कार्यक्रम के जरिये अमेरिका आने वाले कर्मचारियों के साथ-साथ उन्हें नियुक्त करने वाली कंपनियों की भर्ती लागत और प्रक्रियाओं पर भी असर पड़ सकता है।

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