लखनऊ। महानगर इलाके में साइबर जालसाजों ने एक बुजुर्ग महिला को केंद्रीय जांच एजेंसी का अधिकारी बनकर डिजिटल अरेस्ट करने का दावा करते हुए नौ दिन तक डराए रखा और उनसे ₹9 लाख की कथित ठगी कर ली। जालसाजों ने महिला को बताया कि उनके नाम से गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ है और वह एक गंभीर मामले में जांच के घेरे में हैं। लगातार वीडियो कॉल के जरिए उन्हें घर से बाहर नहीं निकलने और किसी से संपर्क नहीं करने के लिए कहा गया। करीब नौ दिन तक चले इस दबाव के बाद महिला ने बताए गए बैंक खाते में ₹9 लाख ट्रांसफर कर दिए। इसके बाद जालसाजों ने उनसे ₹15 लाख और मांगे, तब उन्हें पूरे मामले पर संदेह हुआ।
महानगर के सेक्टर-ए निवासी महिला पूर्व में सामाजिक कार्य से जुड़ी रही हैं। उनके पति एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से सेवानिवृत्त हैं। महिला के मुताबिक, 1 सितंबर की शाम करीब पांच बजे उनके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से फोन आया। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को केंद्रीय जांच एजेंसी का अधिकारी बताया और दावा किया कि उनके नाम से गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है। बातचीत को बाद में व्हाट्सऐप पर ले जाया गया। इसके बाद महिला को लगातार सामान्य कॉल और वीडियो कॉल किए जाने लगे।
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जालसाजों ने महिला को विश्वास दिलाने के लिए वीडियो कॉल के दौरान पुलिस और जांच एजेंसी की वर्दी पहने लोगों को दिखाया। वीडियो के पीछे जांच एजेंसी का लोगो भी नजर आता था। इससे महिला को लगा कि वह वास्तव में किसी सरकारी जांच का सामना कर रही हैं। कथित आरोपियों ने उन्हें बार-बार चेतावनी दी कि अगर उन्होंने कॉल काटी, घर से बाहर निकलीं या किसी अन्य व्यक्ति से इस बारे में बात की तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
पुलिस के मुताबिक, 1 सितंबर से 9 सितंबर तक महिला को इसी तरह वीडियो कॉल पर बनाए रखा गया। इस दौरान उन्हें घर में रहने और किसी से संपर्क नहीं करने के लिए कहा जाता रहा। लगातार निगरानी और गिरफ्तारी के डर के कारण महिला मानसिक दबाव में रहीं। इसके बाद 10 सितंबर को जालसाजों के निर्देश पर उन्होंने ₹9 लाख एक बैंक खाते में भेज दिए। रकम मिलने के बाद भी जालसाजों की मांग खत्म नहीं हुई और उन्होंने महिला से ₹15 लाख और जमा करने को कहा।
अतिरिक्त रकम की मांग होने पर महिला ने अमेरिका में रह रहे अपने बेटे से संपर्क किया और उसे पूरी घटना बताई। बेटे ने बातचीत का तरीका सुनने के बाद इसे साइबर ठगी बताया और महिला को तत्काल जालसाजों से संपर्क बंद करने की सलाह दी। इसके बाद महिला को समझ आया कि जिन लोगों से वह कई दिनों से वीडियो कॉल पर बात कर रही थीं, वे संभवतः सरकारी अधिकारी नहीं बल्कि साइबर ठग थे।
महिला ने मामले की शिकायत राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर की। इसके बाद 16 सितंबर को साइबर सेल थाने में लिखित शिकायत दी गई। पुलिस की शुरुआती जांच में सामने आया कि महिला से ठगी गई ₹9 लाख की रकम मणिपुर स्थित एक बैंक खाते में पहुंची है। पुलिस अब संबंधित खाते पर रकम रोकने या फ्रीज कराने की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है। साथ ही रकम के आगे के लेनदेन और खाते से जुड़े लोगों की जानकारी जुटाई जा रही है।
जांच एजेंसियां साइबर ठगी में इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबर, व्हाट्सऐप संपर्क, बैंक खातों और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की पड़ताल कर रही हैं। तकनीकी जांच के जरिए आरोपियों के डिजिटल संपर्क और संभावित ठिकानों का पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है। पुलिस की एक टीम को आगे की कार्रवाई के लिए मणिपुर भेजे जाने की तैयारी है।
लखनऊ में डिजिटल अरेस्ट के ऐसे मामलों में हाल के महीनों में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है। 16 से 22 जुलाई के बीच एक सेवानिवृत्त एयरपोर्ट निदेशक और उनकी पत्नी को कथित तौर पर डिजिटल अरेस्ट कर करीब ₹70 लाख की ठगी की गई थी। इसके अलावा 23 जुलाई से 10 अगस्त के बीच एक सेवानिवृत्त भारतीय खाद्य निगम अधिकारी और उनकी पत्नी को 18 दिन तक डिजिटल अरेस्ट रखने का आरोप लगा था। इस मामले में करीब ₹42.09 लाख की रकम ठगे जाने की शिकायत सामने आई थी।
साइबर विशेषज्ञों के अनुसार, डिजिटल अरेस्ट में ठग पहले सरकारी अधिकारी या जांच एजेंसी का नाम लेकर डर पैदा करते हैं। इसके बाद वीडियो कॉल, फर्जी दस्तावेज, वर्दी और सरकारी प्रतीकों का इस्तेमाल कर पीड़ित को भरोसे में लेते हैं। लगातार कॉल पर बनाए रखने और परिवार या परिचितों से संपर्क रोकने की रणनीति का मकसद पीड़ित को बाहरी सलाह से दूर रखना होता है। ऐसे मामलों में किसी भी जांच एजेंसी द्वारा वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी या घर में बैठे-बैठे पूछताछ के नाम पर रकम जमा कराने की मांग को गंभीर संकेत मानना चाहिए।
