व्हाट्सऐप पर बैंक अधिकारी बनकर शुरू हुआ संपर्क; करीब एक साल तक कस्टम ड्यूटी, टैक्स, लेनदेन शुल्क और अन्य भुगतान के नाम पर रकम वसूली गई, पार्सल और promised रकम कभी नहीं पहुंची

72 वर्षीय पुणे निवासी से डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ₹27 लाख की ठगी, फर्जी आतंकी कनेक्शन दिखाकर बनाया दबाव

Roopa
By Roopa
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पुणे। महाराष्ट्र के पुणे में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर साइबर ठगी का मामला सामने आया है। सहकारनगर निवासी 72 वर्षीय सेवानिवृत्त व्यक्ति से साइबर अपराधियों ने कथित तौर पर ₹27 लाख ठग लिए। आरोपियों ने खुद को Data Protection Board of India और नासिक साइबर पुलिस का अधिकारी बताकर बुजुर्ग को गिरफ्तारी और आतंकी संगठन से जुड़े वित्तीय लेनदेन का डर दिखाया।

ठगी की घटना 13 से 20 अगस्त के बीच होने का आरोप है। पीड़ित ने 25 अगस्त को पुणे साइबर पुलिस से संपर्क कर शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद पर्वती पुलिस थाने में मामला दर्ज किया गया।

पीड़ित पहले एक इंजीनियरिंग कंपनी चलाते थे, जिसे करीब 10 साल पहले बंद कर दिया गया था। 13 अगस्त को उन्हें एक अज्ञात मोबाइल नंबर से फोन आया। कॉल करने वाले ने खुद को Data Protection Board of India का वरिष्ठ अधिकारी बताया। उसने दावा किया कि पीड़ित के आधार कार्ड से जुड़ा मोबाइल नंबर नाबालिग लड़कियों को अश्लील वीडियो कॉल करने में इस्तेमाल हुआ है।

ठग ने यह भी कहा कि पीड़ित के खिलाफ नासिक साइबर सेल में 22 शिकायतें दर्ज हैं। इसके बाद कॉल कथित तौर पर एक अन्य व्यक्ति को ट्रांसफर कर दी गई, जिसने खुद को नासिक साइबर सेल का इंस्पेक्टर बताया।

वीडियो कॉल के दौरान आरोपी पुलिस की वर्दी में दिखाई दिया। उसने बुजुर्ग से कहा कि उनके नाम पर एक बैंक खाता खोला गया है और उसमें करीब ₹1 करोड़ के लेनदेन हुए हैं। आरोप लगाया गया कि इस रकम का कुछ हिस्सा एक आतंकी संगठन को भेजा गया है।

आरोपियों ने पीड़ित को धमकी दी कि जांच के तहत उनके सभी बैंक खातों और फिक्स्ड डिपॉजिट की जांच की जाएगी। उनके घर में मौजूद सोना भी जब्त किए जाने की बात कही गई। कथित तौर पर डर को वास्तविक दिखाने के लिए आरोपियों ने भारतीय रिजर्व बैंक के नाम से तैयार दस्तावेज, आतंकी संगठन से जुड़ी तस्वीरें और गिरफ्तारी वारंट जैसे दस्तावेज भी भेजे।

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बुजुर्ग और उनकी पत्नी को धमकाया गया कि यदि उन्होंने मामले की जानकारी किसी अन्य व्यक्ति को दी तो दोनों पर ₹5 लाख का जुर्माना लगाया जाएगा और तीन साल तक की जेल हो सकती है। इसके बाद ठगों ने उन्हें कार्रवाई से बचने का कथित रास्ता बताया।

आरोपियों ने दंपती से कहा कि वे अपना सोना किसी वित्तीय कंपनी के पास गिरवी रखें और उसके बदले मिलने वाली रकम को ‘सत्यापन’ के लिए ट्रांसफर करें। आरोपियों के निर्देश पर पीड़ित ने करीब 30 तोला सोना गिरवी रखा और इसके बदले ₹27.51 लाख प्राप्त किए।

18 अगस्त को उन्होंने इनमें से ₹27 लाख RTGS के जरिए आरोपियों द्वारा दिए गए बैंक खाते में ट्रांसफर कर दिए। रकम मिलने के बाद ठगों ने उन्हें एक कथित रसीद भेजी, जिसमें दावा किया गया कि पैसा प्रवर्तन निदेशालय के पास जमा हो गया है।

आरोपियों ने भरोसा दिलाया कि दो से तीन दिन में उन्हें नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट मिल जाएगा और इसके बाद पूरी रकम वापस कर दी जाएगी। हालांकि, तय समय बीतने के बाद भी जब पैसा वापस नहीं मिला तो पीड़ित ने खुद को पुलिस अधिकारी बताने वाले व्यक्ति से संपर्क करने की कोशिश की।

कोई जवाब नहीं मिलने पर उन्होंने सीधे नासिक साइबर सेल से संपर्क किया। वहां उन्हें पता चला कि जिस नाम का इस्तेमाल फोन करने वाले ने किया था, उस नाम का कोई पुलिस अधिकारी नासिक साइबर सेल में तैनात नहीं है। इसके बाद पीड़ित को ठगी का एहसास हुआ और उन्होंने पुलिस से संपर्क किया।

पर्वती पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। जांच में आरोपियों द्वारा इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबरों, रकम प्राप्त करने वाले बैंक खाते, RTGS लेनदेन और पीड़ित को भेजे गए कथित फर्जी दस्तावेजों की जांच की जा रही है।

यह मामला डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली साइबर ठगी के उस तरीके को उजागर करता है, जिसमें अपराधी पुलिस, सरकारी विभाग या जांच एजेंसी के अधिकारी बनकर पीड़ित को गंभीर अपराध में फंसाने की धमकी देते हैं। इसके बाद वीडियो कॉल, फर्जी दस्तावेज और गिरफ्तारी का डर दिखाकर रकम ट्रांसफर कराई जाती है।

पुलिस और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि कोई वास्तविक पुलिस या सरकारी एजेंसी गिरफ्तारी से बचने अथवा जांच के नाम पर किसी व्यक्ति को निजी बैंक खाते में पैसा ट्रांसफर करने का निर्देश नहीं देती। ऐसे मामलों में कॉल काटकर संबंधित विभाग से स्वतंत्र रूप से सत्यापन करना और तत्काल साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करना महत्वपूर्ण है।

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