अहमदाबाद। टैक्स मामलों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल के बीच गुजरात हाईकोर्ट ने अधिकारियों को स्पष्ट चेतावनी दी है। अदालत ने एक राज्य कर अधिकारी द्वारा AI की मदद से तैयार किए गए ऐसे कानूनी संदर्भों पर गंभीर आपत्ति जताई, जिनमें कुछ फैसले कथित तौर पर अस्तित्व में ही नहीं थे या संबंधित विवाद से उनका कोई सीधा संबंध नहीं था। हाईकोर्ट ने कहा कि AI कानूनी शोध और आदेश का मसौदा तैयार करने में मदद कर सकता है, लेकिन किसी अधिकारी की स्वतंत्र कानूनी समझ और जिम्मेदारी का विकल्प नहीं बन सकता।
मामला Faiz Enterprises की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है। कंपनी ने GST व्यवस्था के तहत राज्य कर अधिकारियों की ओर से शुरू की गई कार्यवाही को चुनौती दी थी। 13 अगस्त को सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह बात आई कि संबंधित टैक्स आदेश में ऐसे न्यायिक फैसलों का हवाला दिया गया था, जो या तो मौजूद नहीं थे या जिनकी उद्धृत कानूनी स्थिति और सिद्धांत मामले के वास्तविक विवाद से मेल नहीं खाते थे।
AI से मिले केस लॉ पर अधिकारी ने किया भरोसा
मामले की सुनवाई कर रही हाईकोर्ट की पीठ ने प्रथम दृष्टया पाया कि राज्य कर अधिकारी ने आदेश तैयार करने के दौरान AI से प्राप्त केस लॉ पर अत्यधिक निर्भरता दिखाई। अदालत के सामने स्थिति स्पष्ट होने के बाद संबंधित अधिकारी ने बिना शर्त माफी मांगी।
अधिकारी ने अदालत को बताया कि वह प्रोबेशनरी अधिकारी हैं और अनुभव की कमी के कारण यह गलती हुई। उन्होंने AI का इस्तेमाल कर आदेश तैयार करने तथा बाद में गैर-मौजूद या अप्रासंगिक पाए गए न्यायिक फैसलों पर भरोसा करने की बात स्वीकार की। अधिकारी के अनुसार, घटना के बाद उन्हें AI के इस्तेमाल और न्यायिक आदेश तैयार करने से संबंधित प्रशिक्षण भी दिया गया।
गुजरात टैक्स विभाग ने जारी किए नए निर्देश
हाईकोर्ट की कार्रवाई के बाद गुजरात के राज्य कर विभाग ने AI के इस्तेमाल को लेकर अधिकारियों के लिए नए सुरक्षा निर्देश जारी किए हैं। अतिरिक्त राज्य कर आयुक्त की ओर से 18 अगस्त को जारी निर्देशों में कहा गया है कि AI का इस्तेमाल कानूनी सामग्री खोजने या आदेश का प्रारूप तैयार करने में सहायक उपकरण के रूप में किया जा सकता है।
हालांकि, AI से प्राप्त किसी भी न्यायिक फैसले, कानून की धारा, नियम, सर्कुलर या अधिसूचना को आदेश में शामिल करने से पहले आधिकारिक और मूल स्रोत से उसकी स्वतंत्र पुष्टि करनी होगी। यानी AI द्वारा दिया गया संदर्भ अपने आप में प्रमाणित कानूनी स्रोत नहीं माना जाएगा।
फैसले का मूल पैराग्राफ देखना होगा
विभाग ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया है कि यदि AI किसी न्यायिक फैसले में निर्धारित कानूनी सिद्धांत का सारांश या व्याख्या देता है, तो अधिकारी को मूल फैसले में संबंधित पैराग्राफ तलाशना होगा। इसके बाद ही उस कानूनी सिद्धांत को अपने आदेश में आधार बनाया जा सकेगा।
इसके अलावा यह जांचना भी जरूरी होगा कि जिस फैसले का हवाला दिया जा रहा है, वह अभी भी प्रभावी कानून है या बाद के किसी फैसले से उसकी स्थिति बदल चुकी है। यदि कोई करदाता किसी न्यायिक फैसले का हवाला देता है और अधिकारी उसे संबंधित मामले में लागू नहीं मानता, तो आदेश में इसके कारण स्पष्ट रूप से दर्ज करने होंगे।
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AI अधिकारी के विवेक का विकल्प नहीं
नए दिशा-निर्देशों का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि AI को निर्णय लेने वाला माध्यम नहीं बनाया जा सकता। अंतिम आदेश जारी करने से पहले संबंधित अधिकारी को उपलब्ध तथ्यों, कानून और न्यायिक मिसालों की खुद जांच करनी होगी।
हाईकोर्ट ने भी अधिकारियों को इन सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया है। अदालत ने चेतावनी दी है कि निर्देशों का उल्लंघन होने पर इसे अदालत की अवमानना के रूप में देखा जा सकता है।
कानूनी मामलों में AI ‘Hallucination’ बड़ी चुनौती
AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ कानूनी क्षेत्र में एक नई समस्या भी सामने आई है, जिसे आमतौर पर AI ‘Hallucination’ कहा जाता है। इसमें AI ऐसी जानकारी तैयार कर सकता है जो देखने में पूरी तरह विश्वसनीय लगे, लेकिन वास्तव में उसका कोई आधार न हो।
कानूनी मामलों में इसका जोखिम ज्यादा गंभीर है। किसी गैर-मौजूद फैसले, गलत केस नंबर या वास्तविक फैसले से अलग कानूनी सिद्धांत को आधिकारिक आदेश में शामिल करने से किसी व्यक्ति या कंपनी के अधिकार सीधे प्रभावित हो सकते हैं।
अदालतों में पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
भारत में AI से जुड़े गलत कानूनी संदर्भों के मामले पहले भी अदालतों के सामने आ चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई में NCLT और NCLAT की कार्यवाही से जुड़े एक मामले में छह ऐसे कानूनी संदर्भों पर सवाल उठाए थे, जो या तो अस्तित्व में नहीं थे या उन कानूनी दावों का समर्थन नहीं करते थे, जिनके लिए उनका इस्तेमाल किया गया था।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी AI की सहायता से तैयार किए गए GST शो-कॉज नोटिस के मामले में सक्षम अधिकारी की स्वतंत्र सोच और कानूनी जांच की आवश्यकता पर जोर दिया था।
गुजरात हाईकोर्ट के इस मामले ने एक बात साफ कर दी है—AI टैक्स अधिकारियों के लिए एक उपयोगी सहायक हो सकता है, लेकिन कानून की पुष्टि, तथ्यों का मूल्यांकन और अंतिम निर्णय की जिम्मेदारी अधिकारी की ही रहेगी।
