भीड़भाड़ में पहले PIN और पासवर्ड पर नजर, फिर मोबाइल चोरी कर UPI और बैंकिंग ऐप तक पहुंचने का आरोप; तीन आरोपी गिरफ्तार, पांच फोन बरामद, 20 लाख रुपये से अधिक की ठगी

जेब से मोबाइल चोरी, फिर बैंक खाते पर वार: हैदराबाद में ‘हाइब्रिड साइबर फ्रॉड’ गिरोह का भंडाफोड़

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By Roopa
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हैदराबाद। साइबर अपराधियों ने मोबाइल चोरी और डिजिटल बैंकिंग फ्रॉड को जोड़कर ठगी का एक नया तरीका विकसित किया है। हैदराबाद पुलिस ने ऐसे ही एक अंतरराज्यीय गिरोह के तीन प्रमुख सदस्यों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, आरोपी भीड़भाड़ वाली जगहों पर लोगों के मोबाइल का स्क्रीन लॉक PIN, पैटर्न या पासवर्ड देखते थे और मौका मिलते ही फोन चोरी कर लेते थे। इसके बाद उसी डिवाइस के जरिए बैंकिंग और UPI सेवाओं तक पहुंच बनाकर रकम निकालने की कोशिश की जाती थी।

पुलिस के अनुसार, गिरोह ने इस तरीके से लोगों से 20 लाख रुपये से अधिक की ठगी की। कार्रवाई के दौरान पांच मोबाइल फोन बरामद किए गए हैं। शुरुआती जांच में सामने आया है कि गिरोह वरिष्ठ नागरिकों, रोजाना सार्वजनिक परिवहन से यात्रा करने वाले लोगों और तकनीकी रूप से कम जागरूक लोगों को विशेष रूप से निशाना बनाता था।

भीड़ में पहले देखते थे स्क्रीन लॉक

जांच के अनुसार, आरोपी RTC बसों, बस स्टैंड, रेलवे प्लेटफॉर्म और भीड़भाड़ वाले चौराहों पर ऐसे लोगों की तलाश करते थे, जो स्मार्टफोन इस्तेमाल कर रहे हों। वे फोन अनलॉक करते समय पीड़ित की स्क्रीन पर नजर रखकर PIN, पैटर्न या पासवर्ड याद कर लेते थे। साइबर अपराध की भाषा में इसे ‘शोल्डर सर्फिंग’ कहा जाता है।

इसके बाद आरोपी किसी बहाने से पीड़ित का ध्यान भटकाते और मोबाइल जेब या बैग से निकाल लेते थे। फोन हाथ लगने के बाद उनका लक्ष्य उसमें मौजूद व्यक्तिगत और वित्तीय जानकारी तक पहुंच बनाना होता था।

लॉक न खुले तो करते थे सोशल इंजीनियरिंग

यदि चोरी किए गए फोन का लॉक सीधे नहीं खुल पाता था, तो आरोपी कथित तौर पर दूसरा तरीका अपनाते थे। वे पीड़ित के मोबाइल पर आने वाली कॉल का जवाब देकर खुद को RTC बस का कंडक्टर या चालक बताते थे। इसके बाद दावा करते थे कि फोन बस में मिला है और मालिक की पहचान की पुष्टि के लिए कुछ जानकारी चाहिए।

इसी बहाने वे पीड़ित से स्क्रीन लॉक की जानकारी हासिल करने की कोशिश करते थे। लॉक मिल जाने के बाद चोरी किए गए मोबाइल का इस्तेमाल डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी के लिए किया जाता था।

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गैलरी और WhatsApp में खोजते थे बैंकिंग जानकारी

पुलिस के मुताबिक, मोबाइल का लॉक खुलने के बाद आरोपी गैलरी, WhatsApp मीडिया और दूसरे एप्लिकेशन में बैंकिंग से जुड़ी जानकारी तलाशते थे। इनमें डेबिट या क्रेडिट कार्ड, बैंक पासबुक और PIN की तस्वीरें या रिकॉर्ड मौजूद होने की स्थिति में उनका दुरुपयोग किया जाता था।

SIM कार्ड सक्रिय रहने पर आरोपी UPI और मोबाइल बैंकिंग ऐप तक पहुंच बनाने की कोशिश करते थे। जांच के अनुसार, वे OTP हासिल करने, बैंकिंग क्रेडेंशियल रीसेट करने और खातों से रकम दूसरे खातों में भेजने की प्रक्रिया अपनाते थे।

गिरोह में काम बंटा हुआ था

पुलिस की शुरुआती जांच में गिरोह के संगठित तरीके से काम करने के संकेत मिले हैं। कथित तौर पर अलग-अलग सदस्यों को लक्ष्य की पहचान, मोबाइल चोरी, पीड़ित से जानकारी हासिल करने, तकनीकी स्तर पर बैंकिंग सेवाओं के दुरुपयोग और ठगी की रकम को खपाने की जिम्मेदारी दी गई थी।

प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि इस तरह के अपराधों में भौतिक और डिजिटल सुरक्षा के बीच की कड़ी को निशाना बनाया जाता है। उनके मुताबिक, मोबाइल चोरी होने के बाद अपराधी को केवल एक डिवाइस नहीं मिलता, बल्कि यदि स्क्रीन लॉक और SIM तक पहुंच मिल जाए तो वह व्यक्ति की डिजिटल पहचान और वित्तीय सेवाओं तक पहुंच बनाने की कोशिश कर सकता है। इसलिए मोबाइल का PIN सार्वजनिक स्थान पर डालते समय सावधानी बरतना और संवेदनशील बैंकिंग जानकारी की तस्वीरें फोन में रखने से बचना जरूरी है।

मोबाइल चोरी होते ही उठाएं ये कदम

पुलिस के मुताबिक, मोबाइल चोरी या गुम होने की स्थिति में देरी किए बिना SIM बंद कराना, बैंक और UPI सेवाओं को अस्थायी रूप से ब्लॉक कराना तथा संबंधित बैंक को सूचना देना जरूरी है। इसके साथ ही डिवाइस को रिमोटली लॉक या ट्रैक करने की सुविधा सक्रिय करनी चाहिए।

‘हाइब्रिड साइबर फ्रॉड’ की यह शैली बताती है कि साइबर अपराध अब केवल फर्जी लिंक, कॉल या संदेश तक सीमित नहीं है। अपराधी पहले भौतिक रूप से मोबाइल हासिल कर रहे हैं और फिर उसी डिवाइस को डिजिटल वित्तीय अपराध का माध्यम बना रहे हैं। पुलिस अब गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ कर गिरोह के अन्य सदस्यों, बैंक खातों और इससे जुड़े अन्य मामलों की जानकारी जुटा रही है।

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