मेटा ने भारत में संदिग्ध बाल यौन शोषण से जुड़े मामलों की जानकारी कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ साझा करने पर सहमति जताई है।

Meta के लिए बच्चों की सोशल मीडिया सुरक्षा बनी बड़ा कानूनी संकट, ₹1.48 लाख करोड़ तक समझौता

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By Roopa
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नई दिल्ली। बच्चों और किशोरों में Facebook और Instagram के कथित रूप से लत बढ़ाने वाले इस्तेमाल को लेकर Meta Platforms पर कानूनी दबाव बढ़ गया है। कंपनी ने 29 अमेरिकी राज्यों की ओर से दायर मुकदमों को निपटाने के लिए अधिकतम ₹1.48 लाख करोड़ तक के समझौते पर सहमति जताई है। अदालत में दाखिल दस्तावेजों के मुताबिक, राज्यों ने आरोप लगाया था कि Meta ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को इस तरह डिजाइन किया कि कम उम्र के यूजर्स लगातार और बाध्यकारी तरीके से इनका इस्तेमाल करते रहें। हालांकि कंपनी ने आरोपों से इनकार किया है और समझौते के तहत किसी तरह की कानूनी जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की है।

यह समझौता कैलिफोर्निया में मामले की संघीय सुनवाई के दौरान हुआ। बच्चों और किशोरों पर सोशल मीडिया के प्रभाव को लेकर अमेरिका में चल रही प्रमुख कानूनी लड़ाइयों में इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। समझौते के तहत Meta को किशोर उपयोगकर्ताओं के लिए दैनिक इस्तेमाल की सीमा तय करने और रात के समय प्लेटफॉर्म तक पहुंच रोकने जैसे अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू करने होंगे।

कंपनी को अपनी उम्र सत्यापन व्यवस्था मजबूत करने की भी शर्त स्वीकार करनी होगी। इसका उद्देश्य बच्चों को ऐसे प्लेटफॉर्म या उम्र-सीमित सामग्री तक पहुंचने से रोकना है, जो उनकी आयु के लिए उपयुक्त नहीं है। इसके अलावा माता-पिता और अभिभावकों को बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों की निगरानी तथा उनकी सुरक्षा में मदद करने के लिए अतिरिक्त डिजिटल टूल विकसित करने होंगे।

मामले में कैलिफोर्निया, कोलोराडो, केंटकी और न्यू जर्सी समेत कई राज्यों के अटॉर्नी जनरल ने आरोप लगाया था कि Meta ने जानबूझकर ऐसी सुविधाएं और डिजाइन तैयार किए, जो कम उम्र के यूजर्स में अत्यधिक और बाध्यकारी इस्तेमाल को बढ़ावा देते थे। राज्यों ने इसे उपभोक्ता संरक्षण कानूनों के उल्लंघन से भी जोड़ा।

अमेरिकी अधिकारियों ने Meta पर बच्चों की ऑनलाइन गोपनीयता से जुड़े संघीय कानून Children’s Online Privacy Protection Act (COPPA) के उल्लंघन का आरोप भी लगाया। दावा किया गया कि कंपनी ने कुछ बच्चों की व्यक्तिगत जानकारी उनके माता-पिता को पर्याप्त सूचना दिए बिना या उनकी सहमति प्राप्त किए बिना एकत्र की। आरोप यह भी था कि ऐसी जानकारी का इस्तेमाल मशीन लर्निंग और जनरेटिव AI प्रणालियों के विकास में किया गया।

हालांकि Meta ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया। कंपनी का कहना है कि उसने कम उम्र के यूजर्स की सुरक्षा के लिए व्यापक कदम उठाए हैं। Meta ने यह तर्क भी दिया कि सोशल मीडिया की लत को औपचारिक रूप से मनोरोग संबंधी विकार के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है। इसलिए प्लेटफॉर्म को ‘व्यसनकारी’ बताना अपने आप में उपभोक्ताओं को गुमराह करने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

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यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब Meta के अलावा Snap, Alphabet और TikTok की मूल कंपनी ByteDance भी युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया के कथित प्रभाव को लेकर मुकदमों का सामना कर रही हैं। इन कंपनियों पर अलग-अलग मामलों में आरोप लगाया गया है कि उनके प्लेटफॉर्म की कुछ सुविधाएं बच्चों और किशोरों को लंबे समय तक ऑनलाइन बनाए रखने में भूमिका निभाती हैं।

Meta को हाल के महीनों में अन्य मामलों में भी कानूनी झटके लगे हैं। मार्च में न्यू मैक्सिको की एक जूरी ने प्लेटफॉर्म की सुरक्षा को लेकर उपभोक्ताओं को कथित रूप से गुमराह करने के मामले में कंपनी को ₹3,150 करोड़ का भुगतान करने का आदेश दिया था। इसी महीने एक अन्य न्यायाधीश ने Meta को ₹4,763 करोड़ का भुगतान करने और युवाओं की सुरक्षा से जुड़े उपाय लागू करने का आदेश दिया।

लॉस एंजिल्स के एक अलग मामले में Meta और Google को एक वादी को हुए नुकसान के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। अवसाद और चिंता से जुड़े दावों वाले इस मामले में वादी को करीब ₹50 करोड़ का मुआवजा दिया गया। दोनों कंपनियों ने इन फैसलों के खिलाफ अपील करने की बात कही है।

नए समझौते से Meta के सामने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा, डेटा गोपनीयता और प्लेटफॉर्म डिजाइन को लेकर जवाबदेही का दायरा और बढ़ गया है। दैनिक उपयोग सीमा, रात में पहुंच पर रोक और मजबूत उम्र सत्यापन जैसे उपाय किशोर यूजर्स के लिए Facebook और Instagram के इस्तेमाल के तरीके में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकते हैं।

साथ ही, बच्चों के डेटा के संग्रह और उसके संभावित AI उपयोग को लेकर उठे सवाल सोशल मीडिया कंपनियों के लिए नई नियामकीय चुनौती बन सकते हैं। 29 राज्यों की कानूनी कार्रवाई और प्रस्तावित सुरक्षा उपाय यह संकेत देते हैं कि अमेरिका में बच्चों को लक्षित करने वाले सोशल मीडिया डिजाइन और डेटा प्रथाओं पर कंपनियों से अधिक जवाबदेही की मांग बढ़ रही है।

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