बलिया, 26 अगस्त। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में सरकारी स्कूल के बच्चों की जागरूकता ने मध्याह्न भोजन योजना में कथित बड़े पैमाने पर अनियमितता का खुलासा कर दिया। बांसडीह ब्लॉक स्थित ताजपुर मुड़ियारी इंटर कॉलेज के कक्षा छह से आठ तक के बच्चों ने अपनी पहचान छिपाकर जिलाधिकारी को गोपनीय चिट्ठी भेजी। बच्चों ने शिकायत की कि उन्हें मध्याह्न भोजन नहीं मिल रहा है। शिकायत मिलने के बाद कराई गई जांच में करीब दो वर्षों से योजना के क्रियान्वयन में गड़बड़ी और लगभग ₹14 लाख की अनियमितता सामने आने की बात कही गई है।
बच्चों ने अपनी शिकायत में जिलाधिकारी से मामले की गोपनीय जांच कराने का आग्रह किया था। उन्हें आशंका थी कि शिकायत सामने आने पर स्कूल प्रशासन उनके खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। इसी वजह से उन्होंने पत्र पर अपना नाम नहीं लिखा। बच्चों ने पहले Google पर जिलाधिकारी के कार्यालय का पता खोजा और फिर अपने स्वजन के माध्यम से डाक द्वारा शिकायत भेज दी।
जिलाधिकारी के पास पहुंची चिट्ठी को गंभीरता से लेते हुए मामले की गुप्त जांच कराई गई। जांच में सामने आया कि स्कूल के अभिलेखों में प्रतिदिन करीब 200 बच्चों को मध्याह्न भोजन दिए जाने का उल्लेख था, जबकि मौके पर जांच टीम को बच्चे नहीं मिले। प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया कि कक्षा छह से आठ के विद्यार्थियों को पीएम पोषण योजना के तहत भोजन उपलब्ध कराने के प्रावधान के बावजूद स्कूल में योजना का लाभ नहीं पहुंच रहा था।
जांच के दौरान पिछले करीब दो वर्षों से चल रही कथित अनियमितताओं का भी पता चला। अभिलेखों और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर के आधार पर लगभग ₹14 लाख की वित्तीय अनियमितता का अनुमान लगाया गया है। हालांकि विस्तृत जांच अभी जारी है और अंतिम राशि तथा जिम्मेदार लोगों की भूमिका जांच पूरी होने के बाद स्पष्ट होगी।
मामले ने सरकारी योजनाओं की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। स्कूलों में मध्याह्न भोजन की व्यवस्था की निगरानी के लिए खंड शिक्षा अधिकारियों के अलावा ब्लॉक स्तर पर टास्क फोर्स और जिला स्तर पर एमडीएम से जुड़े अधिकारियों की व्यवस्था है। इसके बावजूद कथित गड़बड़ी लंबे समय तक सामने नहीं आ सकी।
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नियमों के तहत स्कूलों में केवल भोजन बन रहा है या नहीं, इसकी जांच पर्याप्त नहीं मानी जाती। खाद्यान्न स्टॉक रजिस्टर, दाल, तेल और अन्य सामग्री का रिकॉर्ड, छात्र उपस्थिति रजिस्टर, रसोइयों के भुगतान और भोजन की गुणवत्ता समेत कई बिंदुओं का समय-समय पर सत्यापन किया जाना होता है। अब जांच में यह भी देखा जा रहा है कि इन अभिलेखों का नियमित सत्यापन हुआ था या नहीं।
जांच में रसोइयों के भुगतान को लेकर भी अंतर सामने आया है। विभागीय प्रावधान के अनुसार रसोइयों को ₹3,000 मासिक मानदेय दिया जाता है, जबकि प्रधानाचार्य द्वारा कथित तौर पर रसोइए को ₹200 प्रतिदिन के हिसाब से भुगतान किया जा रहा था, जो महीने में लगभग ₹6,000 बैठता है। इस भुगतान व्यवस्था की भी जांच की जा रही है।
मध्याह्न भोजन योजना में छात्रों की उपस्थिति के आधार पर खाद्यान्न का आवंटन किया जाता है। प्राथमिक स्तर पर प्रति बच्चे करीब 100 ग्राम और उच्च प्राथमिक स्तर पर 150 ग्राम खाद्यान्न प्रतिदिन निर्धारित है। इसके अलावा भोजन तैयार करने के लिए कन्वर्जन कास्ट भी निर्धारित है। कक्षा छह से आठ के विद्यार्थियों के लिए प्रति बच्चे ₹10.17 की दर तय है।
प्रारंभिक जांच के बाद प्रशासन ने प्रधानाचार्य के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी शुरू कर दी है। जांच पूरी होने के बाद प्राथमिकी दर्ज कराने की बात कही गई है। साथ ही निगरानी की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में है।
इस पूरे मामले में सबसे अहम पहलू बच्चों की सजगता रही। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने समस्या को प्रशासन तक पहुंचाने का तरीका खोजा और अपनी पहचान गोपनीय रखने का अनुरोध किया। उनकी एक चिट्ठी ने न केवल स्कूल में मध्याह्न भोजन की कथित अनियमितता सामने ला दी, बल्कि सरकारी योजनाओं की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
