कोलकाता। पश्चिम बंगाल में चल रहे नगर भर्ती घोटाले के मामले में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। शहर सत्र न्यायालय ने पूर्व मंत्री और तृणमूल कांग्रेस नेता सुजीत बोस को डिवीजन-वन कैदी का दर्जा प्रदान किया है, साथ ही उनकी न्यायिक हिरासत को 14 दिन और बढ़ा दिया गया है। यह निर्णय दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद सुनाया गया।
सुजीत बोस वर्तमान में नगर भर्ती में कथित अनियमितताओं से जुड़े मामले में न्यायिक हिरासत में हैं। सुनवाई के दौरान उन्होंने विशेष अदालत में वर्चुअल माध्यम से पेशी दी। यह मामला दक्षिण दमदम नगर पालिका में भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और सिफारिशों के दुरुपयोग से जुड़ा बताया जा रहा है, जिसमें आरोप है कि कुछ अभ्यर्थियों के नाम नियमों के बाहर जाकर आगे बढ़ाए गए।
सुनवाई के दौरान बोस के वकील ने अदालत से उनके लिए डिवीजन-वन कैदी का दर्जा देने की मांग की। दलील दी गई कि उन्हें अन्य समान मामलों के आरोपियों की तरह ही सुविधा और दर्जा मिलना चाहिए। बचाव पक्ष ने यह भी उदाहरण दिए कि एक पूर्व पुलिस अधिकारी और एक कारोबारी को भी इसी तरह का दर्जा पहले दिया जा चुका है।
हालांकि, जांच एजेंसी ने इस मांग का विरोध किया। एजेंसी का कहना था कि पूछताछ और जांच की आवश्यकताओं को देखते हुए आरोपी को न्यायिक हिरासत में ही रखा जाना जरूरी है। साथ ही, एजेंसी ने 14 दिन की अतिरिक्त हिरासत की मांग भी की, यह कहते हुए कि हाल ही में कुछ नए साक्ष्य सामने आए हैं जिन पर पूछताछ आवश्यक है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रखा और बाद में आदेश सुनाया। अदालत ने सुजीत बोस को डिवीजन-वन कैदी का दर्जा देने के साथ-साथ उनकी न्यायिक हिरासत को 14 दिन बढ़ाने का आदेश दिया।
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यह मामला पश्चिम बंगाल में नगर निकाय स्तर पर भर्ती प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताओं की व्यापक जांच का हिस्सा है। आरोप है कि कई स्थानों पर चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता का पालन नहीं किया गया और सिफारिशों व प्रभाव का गलत इस्तेमाल कर उम्मीदवारों के नाम आगे बढ़ाए गए।
जांच में यह भी देखा जा रहा है कि नगर निकायों से जुड़े प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक संपर्कों के बीच किसी तरह की मिलीभगत या समन्वित अनियमितता तो नहीं हुई। दस्तावेजों, भर्ती रिकॉर्ड और संचार माध्यमों की बारीकी से जांच की जा रही है।
डिवीजन-वन कैदी का दर्जा आम तौर पर कैदियों की श्रेणी और उनके लिए उपलब्ध सुविधाओं से जुड़ा होता है। हालांकि, इसका सीधा असर कानूनी प्रक्रिया पर नहीं पड़ता, लेकिन हिरासत के दौरान कैदी के रखरखाव और वर्गीकरण में इसका महत्व होता है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार न्यायिक हिरासत बढ़ाया जाना इस बात का संकेत है कि अदालत ने जांच की जरूरतों को गंभीर माना है। जांच एजेंसियां अब दस्तावेजी साक्ष्य, बयान और वित्तीय/प्रशासनिक रिकॉर्ड का और विश्लेषण करेंगी।
इस बीच, बचाव पक्ष आगे की सुनवाई में जमानत या अन्य राहत के लिए प्रयास कर सकता है, जो जांच की प्रगति और चार्जशीट दाखिल होने पर निर्भर करेगा।
फिलहाल मामला न्यायिक और जांच दोनों स्तरों पर सक्रिय है और आने वाली सुनवाइयों में और महत्वपूर्ण खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।
