विदेशी डेबिट कार्डों के जरिए भारत में ₹95 करोड़ लाने और नक्सल प्रभावित इलाकों तक फंड पहुंचाने वाले संदिग्ध नेटवर्क की जांच तेज।

देशी डेबिट कार्ड नेटवर्क से ₹95 करोड़ के संदिग्ध लेन-देन का खुलासा, नक्सल क्षेत्रों तक फैला डिजिटल फंडिंग का जाल

Team The420
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नई दिल्ली। देश के कई राज्यों में एक साथ की गई समन्वित कार्रवाई के बाद विदेशी डेबिट कार्डों के जरिए करोड़ों रुपये के संदिग्ध वित्तीय लेन-देन का बड़ा खुलासा हुआ है। प्रारंभिक जांच में यह सामने आया है कि यह पूरा नेटवर्क विदेश से भारत में आने वाले फंड को एटीएम निकासी के जरिए नकद में बदलकर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रहा था।

छह राज्यों में 18 और 19 अप्रैल को की गई कार्रवाई के दौरान 25 विदेशी डेबिट कार्ड, लगभग ₹40 लाख नकद, कई डिजिटल डिवाइस और महत्वपूर्ण दस्तावेज जब्त किए गए। जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि यह नेटवर्क किसी संगठित वित्तीय ढांचे के तहत संचालित हो रहा था, जिसमें अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम का दुरुपयोग किया गया।

सूत्रों के अनुसार, अमेरिका स्थित एक बैंक से जुड़े डेबिट कार्डों का उपयोग भारत में अलग-अलग राज्यों के एटीएम से लगातार नकद निकासी के लिए किया जा रहा था। यह पूरा धन “द टिमोथी इनिशिएटिव (TTI)” नामक गतिविधियों से जुड़ा बताया जा रहा है, जो भारत में विदेशी फंडिंग नियमों के तहत पंजीकृत नहीं है।

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जांच में यह भी सामने आया है कि नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच लगभग ₹95 करोड़ के बराबर धन विदेशी बैंकिंग चैनलों के जरिए भारत में लाया गया। इस धन का एक बड़ा हिस्सा छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों जैसे बस्तर, दंतेवाड़ा और धमतरी में नकद निकासी के रूप में उपयोग किए जाने के संकेत मिले हैं। इन क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों में लगभग ₹6.5 करोड़ की नकद निकासी के पैटर्न भी दर्ज किए गए हैं।

इस मामले में सबसे अहम सुराग तब मिला जब एक व्यक्ति मिकाह मार्क को बेंगलुरु एयरपोर्ट पर रोका गया। उसके पास से 24 विदेशी डेबिट कार्ड बरामद हुए, जिन्हें वह भारत में प्रवेश के दौरान साथ लाया था। जांच में यह भी पता चला कि इन कार्डों का उपयोग योजनाबद्ध तरीके से देश के कई हिस्सों में एटीएम से बड़ी रकम निकालने के लिए किया जा रहा था।

जांच में यह भी सामने आया है कि इस पूरे नेटवर्क को एक ऑनलाइन बिलिंग और अकाउंटिंग प्लेटफॉर्म के जरिए नियंत्रित किया जा रहा था, जिसे विदेश में स्थित संस्थाएं संचालित कर रही थीं। इस डिजिटल सिस्टम के जरिए हर लेन-देन और नकद निकासी का रिकॉर्ड रखा जा रहा था, जिससे फंड मूवमेंट को छिपाया जा सके।

इस मामले पर साइबर विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रोफेसर त्रिवेणी सिंह ने कहा,
“यह मामला दिखाता है कि किस तरह वैश्विक वित्तीय नेटवर्क और डिजिटल बैंकिंग सिस्टम का दुरुपयोग कर हाइब्रिड फंडिंग मॉडल तैयार किया जा रहा है। विदेशी डेबिट कार्ड, एटीएम कैश विड्रॉल और ऑनलाइन अकाउंटिंग प्लेटफॉर्म का संयोजन एक नए प्रकार के संगठित साइबर-फाइनेंशियल अपराध की ओर इशारा करता है। ऐसे नेटवर्क का उद्देश्य केवल धन स्थानांतरण नहीं, बल्कि संवेदनशील क्षेत्रों में आर्थिक प्रभाव स्थापित करना भी हो सकता है।”

उन्होंने आगे कहा कि इस तरह के मामलों में पारंपरिक जांच के साथ-साथ डिजिटल फॉरेंसिक और क्रॉस-बॉर्डर डेटा ट्रैकिंग बेहद जरूरी हो जाती है, क्योंकि फंड फ्लो कई देशों के बीच बिखरा हुआ होता है।

जांच एजेंसियों के अनुसार, इस पूरे नेटवर्क में कई राज्यों में फैले व्यक्तियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। डिजिटल साक्ष्यों, बैंकिंग रिकॉर्ड और उपकरणों की गहन जांच जारी है। प्रारंभिक संकेत बताते हैं कि यह केवल एक वित्तीय धोखाधड़ी नहीं, बल्कि एक संरचित फंडिंग चैनल हो सकता है।

अधिकारियों ने आशंका जताई है कि इस तरह का समानांतर कैश-आधारित वित्तीय तंत्र देश की आर्थिक और आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। खासकर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में इस प्रकार के फंड प्रवाह से अवैध गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

जांच अभी जारी है और आने वाले दिनों में इस नेटवर्क से जुड़े और नाम, साथ ही नए वित्तीय ट्रेल्स सामने आने की संभावना जताई जा रही है।

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