नई दिल्ली: ग्रेटर नोएडा के चर्चित ‘ग्रैंड वेनिस’ प्रोजेक्ट से जुड़े बहुचर्चित धोखाधड़ी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए कारोबारी सतिंदर सिंह भसीन की जमानत रद्द कर दी है। अदालत ने साफ निर्देश दिया है कि भसीन एक सप्ताह के भीतर जेल प्रशासन के समक्ष आत्मसमर्पण करें।
अदालत का यह फैसला तब आया जब यह पाया गया कि भसीन ने वर्ष 2019 में दी गई जमानत की शर्तों का पालन नहीं किया, खासतौर पर प्रभावित निवेशकों के साथ विवाद सुलझाने के प्रयासों में विफल रहे। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जमानत की शर्तों की अनदेखी के कारण दी गई राहत अब जारी नहीं रखी जा सकती।
मामले में सबसे अहम पहलू यह रहा कि भसीन द्वारा जमानत के दौरान जमा कराई गई ₹50 करोड़ की राशि भी जब्त कर ली गई है। अदालत ने निर्देश दिया कि इस राशि में से ₹5 करोड़ नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA) को दिए जाएं, जबकि शेष ₹45 करोड़ उस रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल को सौंपे जाएं जो भसीन की कंपनी के खिलाफ चल रही दिवाला प्रक्रिया देख रहा है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भसीन का पासपोर्ट बिना शीर्ष अदालत की अनुमति के जारी नहीं किया जाएगा। साथ ही, उन्हें 12 महीने बाद नियमित जमानत के लिए दोबारा आवेदन करने की छूट दी गई है, लेकिन यह तभी संभव होगा जब वे दिवाला प्रक्रिया से जुड़े सभी आदेशों का पालन करें।
यह मामला उन कई आपराधिक मामलों से जुड़ा है, जो दिल्ली और नोएडा में दर्ज किए गए हैं। आरोप है कि भसीन ने ‘ग्रैंड वेनिस’ नामक रियल एस्टेट परियोजना के जरिए निवेशकों से करोड़ों रुपये जुटाए और बाद में धन का दुरुपयोग किया। इस परियोजना में आवासीय कॉम्प्लेक्स, मॉल और होटल विकसित करने का दावा किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व आदेशों में भी भसीन के आचरण पर नाराजगी जताई थी। नवंबर 2025 में अदालत ने टिप्पणी की थी कि उनका व्यवहार “अवांछनीय, यदि अवरोधक नहीं तो” प्रतीत होता है। अदालत ने यह भी कहा था कि छह वर्षों में निवेशकों के दावों के निपटारे के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए।
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इतना ही नहीं, अदालत ने उन आरोपों को भी गंभीरता से लिया था जिनमें कहा गया कि जमानत के लिए जमा कराए गए ₹50 करोड़ की व्यवस्था भी कंपनी के धन से की गई थी। इसके अलावा, कुछ मामलों में निवेशकों के साथ समझौता दिखाने के दावे भी संदिग्ध पाए गए।
इस पूरे प्रकरण में लगभग 190 एफआईआर दर्ज हैं, जो विभिन्न आपराधिक धाराओं के तहत जांच का विषय हैं। अदालत ने संकेत दिया है कि इस मामले में लंबित ट्रायल को तेज किया जाना चाहिए ताकि वर्षों से चल रही अनिश्चितता का अंत हो सके।
गौरतलब है कि वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने भसीन को जमानत देते समय स्पष्ट शर्त रखी थी कि वे सभी प्रभावित निवेशकों के साथ समझौते की दिशा में हर संभव प्रयास करेंगे। लेकिन समय के साथ कई निवेशकों ने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए आरोप लगाया कि भसीन न तो समझौते के लिए गंभीर हैं और न ही उनकी शिकायतों का समाधान कर रहे हैं।
इसी आधार पर अदालत ने भसीन को कारण बताओ नोटिस जारी किया था कि उनकी जमानत क्यों न रद्द कर दी जाए। अंततः, मौजूदा आदेश में अदालत ने यह कदम उठाते हुए जमानत निरस्त कर दी।
अब इस मामले की अगली अहम सुनवाई 7 अप्रैल को इलाहाबाद हाई कोर्ट में होनी है, जहां भसीन ने अपने खिलाफ दर्ज सभी एफआईआर रद्द करने की मांग की है। इस सुनवाई पर भी पूरे मामले की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।
