₹426.46 करोड़ की निर्माण लागत के स्रोत नहीं बता सका ट्रस्ट, सरकारी ठेकों की रकम और जमीनों के इस्तेमाल में अनियमितताओं के आरोप; 38 इमारतों समेत परिसर की अधिकांश संपत्तियां धनशोधन जांच के दायरे में

जौहर यूनिवर्सिटी की ₹1,170 करोड़ की संपत्तियां अटैच, आजम खां के ट्रस्ट पर ईडी का बड़ा एक्शन

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By Roopa
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लखनऊ/रामपुर। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहम्मद आजम खां से जुड़े मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बड़ी कार्रवाई की है। धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए), 2002 के तहत ईडी के लखनऊ जोनल कार्यालय ने रामपुर स्थित विश्वविद्यालय की अधिकांश जमीन और इमारतों को अस्थायी रूप से अटैच कर लिया है। अटैच की गई संपत्तियों की निर्माण लागत ₹426.46 करोड़ आंकी गई है, जबकि उनका मौजूदा बाजार मूल्य करीब ₹1,170 करोड़ बताया गया है। जांच एजेंसी की कार्रवाई विश्वविद्यालय के निर्माण में कथित वित्तीय अनियमितताओं, सरकारी धन के दुरुपयोग और संपत्तियों के स्रोत से जुड़े सवालों पर केंद्रित है।

38 इमारतें और जमीनें जांच के दायरे में

विश्वविद्यालय परिसर में करीब 40 प्रमुख इमारतें हैं। इनमें से दो-तीन भवनों को छोड़कर शेष लगभग 38 इमारतों और उनसे जुड़ी जमीन पर अटैचमेंट की कार्रवाई की गई है। ईडी की जांच में निर्माण लागत और ट्रस्ट की ओर से बताए गए खर्च के बीच बड़ा अंतर सामने आया है।

जौहर ट्रस्ट ने इन भवनों के निर्माण पर करीब ₹45 करोड़ खर्च होने का दावा किया था। इसके विपरीत, जिला मूल्यांकन अधिकारी और आयकर विभाग की नवंबर 2023 की रिपोर्ट में परिसर के 59 भवनों की निर्माण लागत ₹494.46 करोड़ आंकी गई थी। जांच में अटैच की गई संपत्तियों की निर्माण लागत ₹426.46 करोड़ निर्धारित की गई। ईडी के मुताबिक, ट्रस्ट के पदाधिकारी इस राशि के वैध स्रोतों का संतोषजनक हिसाब नहीं दे सके। एजेंसी ने इसे कथित अपराध से अर्जित आय यानी प्रोसीड्स ऑफ क्राइम के दायरे में मानते हुए संपत्तियों को अस्थायी रूप से अटैच किया है।

किसानों की जमीन पर कब्जे के आरोपों से शुरू हुई जांच

ईडी की कार्रवाई की पृष्ठभूमि में रामपुर के अजीमनगर थाने में दर्ज 26 प्राथमिकी हैं। इन मामलों में विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए स्थानीय किसानों की कृषि भूमि पर कथित रूप से जबरन कब्जा करने और विरोध करने वालों को धमकाने जैसे आरोप लगाए गए थे। इन्हीं मामलों से जुड़े तथ्यों और वित्तीय लेनदेन की जांच आगे बढ़ने पर विश्वविद्यालय की संपत्तियां भी एजेंसी के निशाने पर आईं।

जांच के दौरान सींगनखेड़ा गांव में स्थित करीब 34 एकड़ शत्रु संपत्ति का मामला भी सामने आया। जिला प्रशासन की रिपोर्ट के मुताबिक, इस जमीन के 45 भूखंडों पर कथित रूप से अवैध कब्जा किया गया था। पट्टा निरस्त होने के बाद भी जमीन ट्रस्ट के पास रहने का आरोप है। बाद में गृह मंत्रालय के शत्रु संपत्ति अभिरक्षक और जिला प्रशासन ने इसे वापस अपने नियंत्रण में लिया।

इसके अलावा, 13 अक्टूबर को अजीमनगर थाने में आजम खां और ट्रस्ट के खिलाफ एक और प्राथमिकी दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई। इसमें आरोप लगाया गया कि वर्ष 2016 में रामपुर में बुलडोजर चलवाकर गरीब लोगों के घर गिराए गए, उनके साथ मारपीट की गई और नकदी तथा गहने लूटे गए। यह भी आरोप है कि मकानों से निकले मलबे का इस्तेमाल विश्वविद्यालय के निर्माण में किया गया। इन आरोपों की पुष्टि न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं हुई है और संबंधित मामलों में जांच तथा कानूनी प्रक्रिया का महत्व बना हुआ है।

सरकारी ठेकों की रकम विश्वविद्यालय निर्माण में लगाने का आरोप

जांच में सरकारी निर्माण कार्यों के लिए आवंटित धन और सामग्री के कथित इस्तेमाल को भी महत्वपूर्ण माना गया है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, एक कंपनी के प्रबंध निदेशक ने पूछताछ के दौरान बताया कि लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के लगभग ₹186 करोड़ के सरकारी ठेकों से जुड़ी 30 से 40 प्रतिशत राशि का इस्तेमाल विश्वविद्यालय के निर्माण और सामग्री खरीदने में किया गया। आरोप है कि रामपुर में सरकारी विकास कार्यों के लिए खरीदी गई निर्माण सामग्री भी विश्वविद्यालय परिसर में लगाई गई।

यदि जांच में इन तथ्यों की पुष्टि होती है, तो यह सरकारी परियोजनाओं के लिए आवंटित संसाधनों के निजी संस्थान में कथित इस्तेमाल का गंभीर मामला बन सकता है। हालांकि, इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष जांच के साक्ष्यों और संबंधित कानूनी कार्यवाही पर निर्भर करेगा।

 

₹12.16 करोड़ के पंडाल का स्वामित्व बदलने पर सवाल

विश्वविद्यालय परिसर में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के छात्रावास, अस्पताल और एक विशाल पंडाल के निर्माण के लिए कुल ₹23.41 करोड़ मंजूर किए जाने का विवरण भी जांच में सामने आया है। इनमें पंडाल के निर्माण पर ₹12.16 करोड़ खर्च होने की बात कही गई है।

वर्ष 2015 के शासनादेश के अनुसार, पंडाल का स्वामित्व संस्कृति विभाग के पास रहना था और सरकारी आयोजनों के लिए उसका मुफ्त इस्तेमाल किया जाना था। आरोप है कि वर्ष 2016 में आदेश में बदलाव कर पंडाल का स्वामित्व जौहर विश्वविद्यालय को सौंप दिया गया। इसके साथ ही सरकारी आयोजनों के लिए मुफ्त उपलब्ध कराने की शर्त भी हटा दी गई। इस बदलाव को सरकारी धन से निर्मित संपत्ति के स्वामित्व और उपयोग से जुड़ा महत्वपूर्ण पहलू माना जा रहा है।

विधायक निधि, चंदे और नगर पालिका के संसाधनों की भी जांच

विश्वविद्यालय परिसर में विधायक निधि से करीब ₹6.60 करोड़ के कार्य कराए जाने का विवरण भी सामने आया है। इसके अतिरिक्त, मेरठ की दो शैक्षणिक संस्थाओं से ट्रस्ट को ₹6.24 करोड़ का चंदा दिलवाए जाने की बात कही गई है। इन संस्थाओं को तत्कालीन सपा नेता सरोजनी अग्रवाल से संबंधित बताया गया है। एक अन्य संस्थान से कथित प्रभाव के जरिए ₹40 लाख का दान लिए जाने का आरोप भी जांच के विवरण में शामिल है।

रामपुर नगर पालिका परिषद के संसाधनों के इस्तेमाल पर भी सवाल उठे हैं। आरोप है कि नगर पालिका की सफाई मशीनों और अन्य संसाधनों का उपयोग विश्वविद्यालय परिसर के निजी कार्यों के लिए किया गया। जांच एजेंसी इन सभी वित्तीय लेनदेन और संसाधनों के इस्तेमाल को व्यापक मामले के संदर्भ में देख रही है।

अब निर्णायक प्राधिकरण करेगा अटैचमेंट की समीक्षा

ईडी की कार्रवाई के बाद मामला नई दिल्ली स्थित निर्णायक प्राधिकरण के समक्ष जाएगा। प्राधिकरण कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया में अटैच की गई संपत्तियों और एजेंसी की ओर से प्रस्तुत साक्ष्यों की समीक्षा करेगा। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इस प्रक्रिया में छह महीने के भीतर अंतिम निर्णय लिया जाना है।

अस्थायी अटैचमेंट को संपत्तियों की स्थायी जब्ती के बराबर नहीं माना जा सकता। अंतिम निर्णय प्राधिकरण की समीक्षा और आगे की कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। यदि अटैचमेंट की पुष्टि होती है, तो संबंधित संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण और उनके भविष्य के इस्तेमाल को लेकर कानूनी प्रावधानों के अनुसार निर्णय लिया जा सकेगा।

फिलहाल, ₹1,170 करोड़ के बाजार मूल्य वाली संपत्तियों पर ईडी की कार्रवाई ने विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए इस्तेमाल किए गए धन, जमीनों के अधिग्रहण और सरकारी संसाधनों के कथित दुरुपयोग से जुड़े मामलों को फिर चर्चा में ला दिया है। जांच का अगला चरण यह तय करने में महत्वपूर्ण होगा कि संपत्तियों के निर्माण और अधिग्रहण में किन वित्तीय स्रोतों का इस्तेमाल हुआ तथा कथित अनियमितताओं के संबंध में कानूनी जिम्मेदारी किसकी बनती है।

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