प्रतापगढ़। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना में फर्जी पंजीकरण के जरिए करीब ₹60 करोड़ की कथित हेराफेरी के मामले में पुलिस ने अंतरजनपदीय गिरोह के तीन सदस्यों को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि गिरोह ने सरकारी पोर्टल की गोपनीय लॉगिन आईडी और पासवर्ड का दुरुपयोग कर लाखों अपात्र लोगों का पंजीकरण कराया और योजना की राशि हासिल करने का रास्ता तैयार किया। पुलिस की संयुक्त तकनीकी और सर्विलांस टीम ने मंगलवार को कुंडा क्षेत्र से तीनों आरोपियों को पकड़ा। उनके कब्जे से लैपटॉप, मोबाइल फोन, सिम कार्ड और बायोमीट्रिक उपकरण समेत कई डिजिटल साक्ष्य बरामद किए गए हैं।
गिरफ्तार आरोपियों की पहचान संग्रामगढ़ निवासी शिवकुमार यादव, कुंडा निवासी अनुराग गुप्ता और सरायकीरत भदरी निवासी जितेंद्र कुमार के रूप में हुई है। पुलिस की प्रारंभिक जांच के मुताबिक, गिरोह में प्रत्येक सदस्य की अलग भूमिका थी। अनुराग गुप्ता कुंडा तहसील में संविदा पर वीआरसी ऑपरेटर के पद पर तैनात था। उस पर सरकारी पोर्टल की गोपनीय लॉगिन आईडी और पासवर्ड दूसरे सदस्यों तक पहुंचाने का आरोप है। शिवकुमार यादव कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) संचालित करता था और कथित तौर पर इन लॉगिन विवरणों के जरिए अपात्र लोगों का पंजीकरण करता था। तीसरे आरोपी जितेंद्र कुमार पर ऐसे लोगों से संपर्क करने और उनसे रकम वसूलने की जिम्मेदारी निभाने का आरोप है।
3.18 लाख से अधिक अपात्र लाभार्थियों के पंजीकरण का मामला
जांच में सामने आया कि कथित फर्जीवाड़े की शुरुआत वर्ष 2021-22 में हुई थी। उस समय योजना के तहत पंजीकरण की प्रक्रिया ओटीपी आधारित थी। आरोप है कि गिरोह ने भूमि रिकॉर्ड के बिना ही नाबालिगों और अन्य अपात्र लोगों के नाम पोर्टल पर दर्ज कराए। सीधे पोर्टल पर प्रविष्टियां करने की व्यवस्था का दुरुपयोग करते हुए एक दिन में औसतन करीब 3,000 लोगों का पंजीकरण किए जाने की बात सामने आई है।
उप कृषि निदेशक अश्वनी कुमार सिंह ने पुलिस को पेन ड्राइव में 3,18,846 अपात्र लाभार्थियों की सूची उपलब्ध कराई थी। इस सूची के आधार पर जांच आगे बढ़ाई गई। शुरुआती पड़ताल में करीब 40 प्रतिशत संदिग्ध पंजीकरण कुंडा तहसील क्षेत्र से जुड़े पाए गए, जबकि शेष 60 प्रतिशत उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों के अलावा मध्य प्रदेश और बिहार के लोगों के बताए गए हैं। इनमें कुछ ऐसे नाम भी शामिल थे, जिनका सत्यापन नहीं होने के कारण भुगतान रुका हुआ था।
जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि फर्जी पंजीकरण के जरिए वास्तव में कितनी सरकारी धनराशि जारी हुई और कितनी रकम आरोपियों या उनसे जुड़े लोगों तक पहुंची। करीब ₹60 करोड़ की हेराफेरी का आंकड़ा जांच के दायरे में है। अपात्र लाभार्थियों की सूची में शामिल सभी लोगों की पहचान और भुगतान संबंधी विवरणों का सत्यापन भी मामले की अहम कड़ी माना जा रहा है।
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शिकायत से शासन स्तर की जांच तक पहुंचा मामला
कुंडा तहसील में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं की शिकायत मिलने के बाद प्रशासनिक स्तर पर जांच शुरू हुई थी। इसके बाद विजिलेंस और शासन स्तर पर भी मामले की पड़ताल कराई गई। शासन के निर्देश पर जिलाधिकारी अभिषेक पांडेय ने पुलिस अधीक्षक को प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश दिए। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक ने अपर पुलिस अधीक्षक, पूर्वी के नेतृत्व में तकनीकी टीम गठित की।
पुलिस की साइबर टीम ने सरकारी पोर्टल पर हुए संदिग्ध लॉगिन की जांच के लिए आईपी एड्रेस और अन्य डिजिटल गतिविधियों का विश्लेषण किया। तकनीकी साक्ष्यों को जोड़ते हुए संदिग्ध व्यक्तियों की पहचान की गई। इसके बाद संयुक्त टीम ने कुंडा क्षेत्र में कार्रवाई कर तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। जांच में पोर्टल तक पहुंच, फर्जी पंजीकरण और आरोपियों के बीच संपर्क के डिजिटल रिकॉर्ड अहम माने जा रहे हैं।
लैपटॉप, मोबाइल और बायोमीट्रिक उपकरण बरामद
पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर दो लैपटॉप, पांच मोबाइल फोन, सात सिम कार्ड, फिंगर स्कैनर यानी बायोमीट्रिक डिवाइस और यूपीआई लेनदेन से जुड़े स्क्रीनशॉट बरामद किए हैं। पुलिस के अनुसार, पूछताछ में आरोपियों ने कथित तौर पर बताया कि वे आपस में समन्वय के लिए व्हाट्सएप ग्रुप का इस्तेमाल करते थे। कुछ मौकों पर रिमोट वीडियो एक्सेस की मदद लिए जाने की बात भी सामने आई है।
बरामद डिजिटल उपकरणों की जांच से यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि फर्जी पंजीकरण किस तरह किए गए, किन खातों या मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल हुआ और गिरोह के नेटवर्क में अन्य लोग भी शामिल थे या नहीं। पुलिस यह भी जांच रही है कि संदिग्ध गतिविधियों से जुड़े लॉगिन विवरण कितने समय तक इस्तेमाल किए गए और इस दौरान कुल कितने पंजीकरण कराए गए।
साइबर क्राइम थाना पुलिस ने तीनों आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक षड्यंत्र और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की संबंधित धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की है। गिरफ्तार आरोपियों को जेल भेज दिया गया है। मामले की जांच जारी है और पुलिस अब कथित नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों, धनराशि के प्रवाह तथा सरकारी पोर्टल की सुरक्षा में हुई संभावित चूक की पड़ताल कर रही है।
