नई दिल्ली | राजधानी दिल्ली में लापता बच्चों और मानव तस्करी की समस्या एक गंभीर सामाजिक और सुरक्षा संकट का रूप ले चुकी है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 2015 से 2025 के बीच दिल्ली में नवजात से 18 वर्ष तक के 5,559 बच्चे लापता हुए, जिनमें से 695 बच्चों का वर्षों बाद भी कोई पता नहीं चल पाया। यह स्थिति ऐसे समय सामने आई है, जब पुलिस और प्रशासन के पास विशेष इकाइयाँ, डिजिटल प्लेटफॉर्म और मानक प्रक्रियाएं पहले से मौजूद हैं।
Delhi Police के ZIPNET रिकॉर्ड बताते हैं कि इस 11 साल की अवधि में 4,864 लापता बच्चों को खोज लिया गया, लेकिन सैकड़ों मामले आज भी लंबित हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के दर्द और अनिश्चितता की तस्वीर है।
हर दिन औसतन 63 लोग हो रहे लापता
कुल गुमशुदा लोगों के आंकड़े स्थिति की भयावहता को और स्पष्ट करते हैं। इसी अवधि में दिल्ली से सभी आयु वर्ग के 2,55,432 लोग लापता हुए। इनमें से 2,01,455 लोगों को बरामद कर लिया गया, जबकि 53,977 लोग अब भी लापता हैं। इसका अर्थ है कि बीते एक दशक में राजधानी से हर दिन औसतन 63 लोग गायब हुए।
बाल अधिकार संगठनों के अनुसार, इतने बड़े पैमाने पर लापता मामलों का बने रहना इस ओर इशारा करता है कि समस्या की जड़ें कहीं अधिक गहरी हैं और केवल पुलिस कार्रवाई से इसका समाधान संभव नहीं है।
मानव तस्करी बना सबसे बड़ा खतरा
पुलिस अधिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि हर लापता बच्चा मानव तस्करी का शिकार नहीं होता, लेकिन दिल्ली संगठित तस्करी गिरोहों का बड़ा गंतव्य और ट्रांजिट सेंटर बनी हुई है। कई नाबालिगों को अन्य राज्यों से दिल्ली लाया जाता है और बाद में वे लापता मामलों में दर्ज हो जाते हैं, जिससे उनकी पहचान और बरामदगी और मुश्किल हो जाती है।
क्राइम ब्रांच के तहत मानव तस्करी से निपटने के लिए अलग इकाई होने के बावजूद, तस्कर गरीबी, अशिक्षा, जागरूकता की कमी और कमजोर पारिवारिक ढांचे का फायदा उठाकर बच्चों को लालच, धोखे या दबाव में फंसा लेते हैं।
तीन साल में 6,759 नाबालिगों को कराया गया मुक्त
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि 1 अप्रैल 2023 से 29 जनवरी 2026 के बीच दिल्ली में 6,759 तस्करी पीड़ित नाबालिगों को मुक्त कराया गया। इनमें 2,134 लड़कियां और 3,281 लड़के शामिल थे। इसी अवधि में राजधानी में 2,407 मानव तस्करी के मामले दर्ज किए गए।
इन बच्चों में बड़ी संख्या उन नाबालिगों की थी जिन्हें उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से नौकरी, पढ़ाई या बेहतर भविष्य के झूठे वादों पर दिल्ली लाया गया था।
राष्ट्रीय स्तर पर भी चिंताजनक हालात
दिल्ली की तस्वीर देशभर के हालात से अलग नहीं है। अप्रैल 2023 से जनवरी 2026 के बीच पूरे देश में 1.25 लाख से अधिक बच्चों को मानव तस्करी गिरोहों से मुक्त कराया गया और 56,459 मामले दर्ज हुए। इनमें से अधिकांश बच्चे न तो घर से भागे थे और न ही संयोग से बिछड़े थे, बल्कि सुनियोजित आपराधिक नेटवर्क का शिकार बने थे।
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लापता बच्चों के मामलों में SOP
दिल्ली पुलिस लापता बच्चों के मामलों में एक विस्तृत स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) का पालन करती है। इसके तहत:
नाबालिगों के मामलों में तुरंत केस दर्ज करना अनिवार्य है
पहले 48 घंटे को सबसे अहम मानते हुए बिना देरी खोज शुरू की जाती है
24 घंटे के भीतर ZIPNET पर विवरण अपलोड किया जाता है
12 घंटे में देशभर में अलर्ट जारी होता है
इसके अलावा बॉर्डर चेक पोस्ट्स को अलर्ट, महत्वपूर्ण स्थानों पर नोटिस, मुखबिरों की सक्रियता और जरूरत पड़ने पर मीडिया के जरिए जानकारी साझा की जाती है।
जवाबदेही और प्रोत्साहन
जांच अधिकारी हर मामले में किए गए प्रयासों का रिकॉर्ड रखते हैं। एसएचओ साप्ताहिक और वरिष्ठ अधिकारी पखवाड़े में समीक्षा करते हैं। लापता बच्चों को खोजने वाले पुलिसकर्मियों के लिए इनाम और आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन का भी प्रावधान है।
शिकायत कैसे करें
परिजन 112 या 1090 पर कॉल कर, नजदीकी थाने में जाकर, या पुलिस पोर्टल, मोबाइल ऐप, व्हाट्सऐप और ईमेल के माध्यम से शिकायत दर्ज करा सकते हैं। पुलिस स्पष्ट करती है कि लापता बच्चे की रिपोर्ट में कोई प्रतीक्षा अवधि नहीं है।
एक गंभीर चेतावनी
ZIPNET के ये आंकड़े एक कड़वी सच्चाई सामने रखते हैं—तकनीक, SOP और संसाधनों के बावजूद लापता बच्चों की समस्या जस की तस बनी हुई है। दिल्ली के अभिभावकों के लिए यह एक गंभीर चेतावनी है और प्रशासन के लिए संकेत कि मानव तस्करी और गुमशुदगी के खिलाफ लड़ाई में निरंतर सतर्कता, बेहतर समन्वय और व्यापक जन-जागरूकता बेहद जरूरी है।
