दुनिया एक बार फिर ऐसे नाज़ुक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां क्षेत्रीय तनावों की छोटी-सी चिंगारी भी वैश्विक युद्ध में तब्दील होने का खतरा पैदा कर सकती है। कमजोर पड़ती कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय नियमों के क्षरण और महाशक्तियों के बीच बढ़ते अविश्वास के बीच, तीसरे विश्वयुद्ध की संभावना को अब पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
अमेरिका के जाने-माने रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञ डॉ. रॉबर्ट फार्ले ने चेतावनी दी है कि वर्ष 2026 ऐसा समय बन सकता है, जब World War III भड़कने का वास्तविक जोखिम सामने आ जाए। रणनीतिक मामलों की वेबसाइट 19fortyfive.com पर प्रकाशित अपने लेख “5 Places World War III Could Break Out in 2026” में उन्होंने कहा है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था तेजी से कमजोर हो रही है।
डॉ. फार्ले के अनुसार, अमेरिका के नेतृत्व में विकसित वह प्रणाली, जिसने दशकों तक बड़े वैश्विक संघर्षों को रोके रखा, अब कई मोर्चों पर बिखरी और निष्क्रिय नजर आ रही है। ऐसे हालात में किसी भी संवेदनशील क्षेत्र में हुआ सीमित सैन्य टकराव व्यापक युद्ध का रूप ले सकता है।
1. ग्रीनलैंड: शांत क्षेत्र से रणनीतिक टकराव तक
लंबे समय तक ग्रीनलैंड को वैश्विक संघर्षों से दूर माना जाता रहा है, लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने इसकी रणनीतिक अहमियत को नए सिरे से उजागर किया है। अमेरिका और डेनमार्क पारंपरिक सहयोगी रहे हैं, लेकिन पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण की मांग और सैन्य विकल्पों की चर्चा ने यूरोपीय देशों को सतर्क कर दिया।
इसके जवाब में यूरोप ने वहां अपनी संयुक्त सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और यूरोप के बीच किसी भी तरह का टकराव ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
2. यूक्रेन: लंबा युद्ध, बढ़ता जोखिम
रूस-यूक्रेन युद्ध अब अपने पांचवें वर्ष की ओर बढ़ रहा है। रूस धीरे-धीरे अपनी स्थिति मजबूत करता दिख रहा है, जबकि यूक्रेन पश्चिमी समर्थन के सहारे संघर्ष जारी रखे हुए है। 2025 में शांति वार्ताओं की विफलता और रूस पर बढ़ते आर्थिक दबाव ने हालात को और जटिल बना दिया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि परिस्थितियां और बिगड़ती हैं तो यूरोपीय देशों का प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप रूस-यूरोप टकराव को जन्म दे सकता है।
3. ताइवान: एशिया-प्रशांत का सबसे संवेदनशील बिंदु
ताइवान को लेकर चीन और अमेरिका के बीच तनाव लगातार गहराता जा रहा है। चीन ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है और बल प्रयोग की संभावना से इनकार नहीं करता। वहीं, अमेरिका की रक्षा प्रतिबद्धता पहले जैसी स्पष्ट नहीं दिख रही है।
Certified Cyber Crime Investigator Course Launched by Centre for Police Technology
विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका यूरोप या आर्कटिक जैसे अन्य मोर्चों पर उलझा रहता है, तो चीन ताइवान को लेकर निर्णायक कदम उठा सकता है, जिससे एशिया-प्रशांत क्षेत्र व्यापक संघर्ष की चपेट में आ सकता है।
4. ईरान: कमजोर लेकिन अस्थिर करने की क्षमता
ईरान हालिया संघर्षों, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और आंतरिक असंतोष के कारण कमजोर जरूर हुआ है, लेकिन उसके पास अब भी जवाबी कार्रवाई की क्षमता मौजूद है। अमेरिका ने संकेत दिए हैं कि हालात बिगड़ने पर सैन्य विकल्प से इनकार नहीं किया जाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान पर किसी भी तरह का हमला पूरे मध्य-पूर्व को अस्थिर कर सकता है और इसमें रूस व चीन जैसे वैश्विक खिलाड़ी अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो सकते हैं।
5. भारत-पाकिस्तान: परमाणु जोखिम वाला मोर्चा
दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को सबसे खतरनाक फ्लैशपॉइंट्स में गिना जा रहा है। 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद दोनों देशों के रिश्तों में और तल्खी आई है। कश्मीर मुद्दा, सीमा पर झड़पें और आतंकवाद को लेकर आरोप-प्रत्यारोप हालात को अत्यंत संवेदनशील बनाए हुए हैं।
दोनों देश परमाणु हथियारों से लैस हैं और किसी भी सीमित संघर्ष के नियंत्रण से बाहर निकलने का जोखिम बना रहता है।
चेतावनी, भविष्यवाणी नहीं
डॉ. फार्ले ने स्पष्ट किया है कि यह कोई भविष्यवाणी नहीं, बल्कि मौजूदा वैश्विक हालात का यथार्थवादी आकलन है। उनके अनुसार, यदि कूटनीति कमजोर पड़ती रही और वैश्विक शक्तियों के बीच संवाद टूटता गया, तो 2026 दुनिया के लिए सबसे खतरनाक वर्षों में से एक साबित हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन पांचों फ्लैशपॉइंट्स पर संयम, संवाद और संतुलित रणनीति ही तीसरे विश्वयुद्ध को टालने का एकमात्र रास्ता है।
