फ्यूजिटिव इकनॉमिक ऑफेंडर टैग को दी चुनौती; बोले—विदेशी कानूनी प्रक्रियाओं के चलते यात्रा बाधित

विजय माल्या का बॉम्बे हाई कोर्ट में दावा: अभी भारत लौटना संभव नहीं, UK की कानूनी पाबंदियों और पासपोर्ट रद्द होने का हवाला

Roopa
By Roopa
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मुंबई: संकटग्रस्त कारोबारी Vijay Mallya ने Bombay High Court को बताया है कि वह फिलहाल भारत लौटने की कोई समयसीमा नहीं दे सकते। माल्या ने हलफनामे में कहा कि United Kingdom में चल रही कानूनी कार्यवाहियां उनकी आवाजाही पर रोक लगाती हैं, वहीं भारतीय पासपोर्ट रद्द होने के कारण उनके पास वैध यात्रा दस्तावेज भी नहीं हैं।

अदालत में दाखिल शपथपत्र में माल्या ने कहा कि वह विदेश में जारी न्यायिक प्रक्रियाओं से बंधे हुए हैं, जिनके चलते वे UK से बाहर नहीं जा सकते। उन्होंने यह भी दलील दी कि पासपोर्ट रद्द हो जाने से भारत की यात्रा “कानूनी तौर पर असंभव” हो गई है, भले ही उनकी इच्छा क्यों न हो।

यह दलील फ्यूजिटिव इकनॉमिक ऑफेंडर एक्ट के तहत उन्हें भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित किए जाने के खिलाफ दाखिल याचिका का हिस्सा है। हाई कोर्ट फिलहाल इस बात की समीक्षा कर रहा है कि यह घोषणा कानूनी रूप से टिकाऊ है या नहीं, और क्या पूरी प्रक्रिया में जरूरी safeguards का पालन किया गया।

माल्या ने कोर्ट में दोहराया कि उन्होंने जानबूझकर भारतीय अदालतों से दूरी नहीं बनाई। उनका कहना है कि विदेश में बने रहना किसी टालमटोल का नतीजा नहीं, बल्कि प्रत्यर्पण से जुड़े मामलों सहित लंबित कानूनी कार्यवाहियों का प्रत्यक्ष परिणाम है। उन्होंने यह भी दावा किया कि भारतीय एजेंसियों को उनके ठिकाने की जानकारी हमेशा रही है और भारत छोड़ने का फैसला उनके खिलाफ आपराधिक मामलों के दर्ज होने से पहले लिया गया था।

अपनी याचिका में माल्या ने कानून की कुछ धाराओं की संवैधानिक वैधता पर भी सवाल उठाया है। उनका तर्क है कि यह कानून प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है और भगोड़ा घोषित किए जाने पर गंभीर नागरिक परिणाम लागू कर देता है, जबकि प्रभावित व्यक्ति के कानूनी उपाय सीमित हो जाते हैं।

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मामले की जड़ अब बंद हो चुकी Kingfisher Airlines से जुड़े कथित कर्ज़ डिफॉल्ट हैं। भारतीय जांच एजेंसियां रिकवरी की कार्रवाई और आपराधिक मुकदमे आगे बढ़ा रही हैं। फ्यूजिटिव इकनॉमिक ऑफेंडर ढांचा ऐसे मामलों में संपत्ति अटैच करने और जब्त करने का अधिकार देता है, जहां आरोपी बड़े आर्थिक अपराधों के आरोपों के बीच भारतीय अधिकार क्षेत्र से बाहर बताए जाते हैं।

कानूनी जानकारों का कहना है कि हाई कोर्ट की यह सुनवाई सिर्फ माल्या तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों की दिशा तय कर सकती है, जहां आरोपी विदेश में समानांतर कानूनी प्रक्रियाओं का हवाला देकर भारत लौटने में असमर्थता जताते हैं।

पिछली सुनवाइयों में माल्या की ओर से दलील दी गई थी कि कानून का यांत्रिक इस्तेमाल नहीं होना चाहिए और अदालतों को यह परखना चाहिए कि किसी व्यक्ति की अनुपस्थिति स्वैच्छिक है या विदेशी न्यायिक प्रक्रियाओं से मजबूरीवश हुई है। बचाव पक्ष का यह भी कहना है कि उन्हें भगोड़ा ठहराना इस तथ्य की अनदेखी है कि माल्या अपने वकीलों के जरिए कार्यवाहियों में हिस्सा लेते रहे हैं।

दूसरी ओर, जांच एजेंसियां लगातार कहती रही हैं कि माल्या पर भारतीय बैंकों का हजारों करोड़ रुपये बकाया है और विदेश में लंबा प्रवास वसूली की कोशिशों में बाधा बना हुआ है। एजेंसियों का तर्क है कि भगोड़ा घोषित करने का प्रावधान ऐसे आर्थिक अपराधियों को संपत्ति छिपाने से रोकने का अहम हथियार है।

अब हाई कोर्ट यह तय कर रहा है कि क्या माल्या को भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित करने से पहले सभी प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं का पालन हुआ और क्या पासपोर्ट रद्द होने व UK की कानूनी पाबंदियों से जुड़े उनके दावे किसी राहत के योग्य हैं।

मामले की अगली सुनवाई के लिए तारीख तय की गई है, जहां दोनों पक्षों से अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल किए जाने की उम्मीद है। यह फैसला हाई-प्रोफाइल आर्थिक अपराध मामलों में एक अहम मिसाल बन सकता है।

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