अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ व्यवस्था के एक बड़े हिस्से को अवैध ठहराते हुए कहा कि व्यापक आयात शुल्क लगाने में कार्यपालिका ने अपने कानूनी अधिकारों की सीमा पार की। यह फैसला व्यापार नीति में राष्ट्रपति की एकतरफा शक्ति पर बड़ा संस्थागत अंकुश माना जा रहा है और टैरिफ लगाने की प्रक्रिया को फिर से कांग्रेस तथा विधिक प्रावधानों के दायरे में ले आता है।
अदालत के निर्णय से टैरिफ पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं, लेकिन वह कानूनी रास्ता अमान्य हो गया है जिसके जरिए बिना विस्तृत जांच के तेज और व्यापक शुल्क लगाए गए थे। इसी कारण प्रशासन अब वैकल्पिक रणनीति — अनौपचारिक तौर पर ‘गेम-2’ — पर काम कर रहा है, ताकि कानूनी रूप से टिकाऊ प्रावधानों के तहत व्यापारिक दबाव बनाए रखा जा सके।
नीतिगत स्तर पर तीन प्रमुख विकल्पों पर विचार हो रहा है। पहला, ट्रेड एक्ट 1974 की सेक्शन 122, जिसके तहत लगभग 10% तक अस्थायी टैरिफ अधिकतम 150 दिनों के लिए लगाया जा सकता है। यह अपेक्षाकृत तेज विकल्प है, लेकिन अवधि और दर दोनों सीमित होने से इसका प्रभाव कम व्यापक रहेगा।
दूसरा, सेक्शन 301, जिसका उपयोग अनुचित व्यापारिक प्रथाओं के खिलाफ किया जाता है। इसमें यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव द्वारा औपचारिक जांच, हितधारकों से परामर्श और साक्ष्य आधारित प्रक्रिया अनिवार्य होती है। यह कानूनी रूप से मजबूत है, लेकिन समय लेने वाला और लक्षित प्रकृति का है, इसलिए व्यापक टैरिफ जैसा असर नहीं देता।
तीसरा, ट्रेड एक्सपैंशन एक्ट की सेक्शन 232, जिसके तहत राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर शुल्क लगाए जा सकते हैं। इस मार्ग में विभागीय समीक्षा और अंतर-एजेंसी समन्वय शामिल होता है, जिससे प्रक्रिया धीमी और अधिक औपचारिक हो जाती है।
इन विकल्पों से प्रशासन संरक्षणवादी रुख जारी रख सकता है, लेकिन पहले जैसी तात्कालिक और व्यापक कार्रवाई संभव नहीं होगी। विश्लेषकों का मानना है कि इमरजेंसी शक्तियों से हटकर विधिक प्रक्रिया पर आधारित टैरिफ लागू करने से भविष्य की कार्रवाइयों की गति और दायरा दोनों घटेंगे।
सबसे बड़ा अनिश्चितता का मुद्दा अब तक वसूले गए टैरिफ राजस्व का है। बाजार और कानूनी विशेषज्ञ यह देख रहे हैं कि क्या सरकार को अवैध घोषित ढांचे के तहत वसूले गए शुल्क वापस करने होंगे। संभावित रिफंड की राशि सैकड़ों अरब डॉलर तक जा सकती है, जिससे राजकोषीय दबाव और प्रशासनिक जटिलताएं बढ़ सकती हैं। पात्रता, समयसीमा और भुगतान की प्रक्रिया अभी स्पष्ट नहीं है।
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मैक्रो स्तर पर इस फैसले का असर कई एसेट क्लास पर पड़ सकता है। इक्विटी बाजार में आयात पर निर्भर कंपनियों की लागत घटने की संभावना से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल सकती है। बॉन्ड बाजार संभावित रिफंड के राजकोषीय प्रभाव का आकलन कर रहा है, जबकि मुद्रा बाजार यह देख रहा है कि कम टैरिफ दबाव से डॉलर और पूंजी प्रवाह पर क्या असर पड़ेगा। वैश्विक सप्लाई चेन और निर्यात आधारित अर्थव्यवस्थाएं भी अमेरिकी रुख में संभावित नरमी का मूल्यांकन कर रही हैं।
रणनीतिक तौर पर माना जा रहा है कि प्रभावी टैरिफ दरें अपने उच्च स्तर के करीब पहुंच चुकी हैं, लेकिन नीति संबंधी अनिश्चितता बनी रहेगी। सेक्शन 301 या 232 के तहत सीमित टैरिफ भी क्षेत्र-विशेष में व्यवधान और प्रतिशोधी कदमों को जन्म दे सकते हैं, जिससे भू-राजनीतिक व्यापार तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं होगा।
संस्थागत दृष्टि से यह फैसला शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत को मजबूत करता है और भविष्य की सरकारों के लिए एक मिसाल बन सकता है कि आपात आर्थिक शक्तियों की व्याख्या कितनी सीमित हो सकती है।
निकट अवधि में बाजार तीन बातों पर नजर रखेगा — प्रशासन की कानूनी प्रतिक्रिया, टैरिफ रिफंड पर स्पष्टता और नए जांच-आधारित टैरिफ की संभावित सीमा। यही कारक व्यापार प्रवाह, कॉरपोरेट लागत और निवेशक भावनाओं को दिशा देंगे।
यह फैसला केवल कानूनी झटका नहीं बल्कि अमेरिकी व्यापार नीति के क्रियान्वयन में संरचनात्मक बदलाव का संकेत है। टैरिफ बने रहेंगे, लेकिन उनका उपयोग अब धीमा, सीमित और अधिक प्रक्रिया-आधारित होगा, जिससे वैश्विक व्यापार तनाव कम तो हो सकता है, समाप्त नहीं।
