₹64.82 करोड़ के उत्तर प्रदेश फॉरेस्ट कॉरपोरेशन घोटाले में अंदरूनी खेल, दो कर्मचारी रडार पर

Team The420
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लखनऊ | उत्तर प्रदेश फॉरेस्ट कॉरपोरेशन (UPFC) से जुड़े ₹64.82 करोड़ के कथित घोटाले में जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे अंदरूनी मिलीभगत के संकेत और स्पष्ट होते जा रहे हैं। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की तफ्तीश में सामने आया है कि UPFC के एक अकाउंटेंट और एक क्लर्क इस फर्जीवाड़े के कथित मास्टरमाइंड के सीधे संपर्क में थे। जांच एजेंसी ने दोनों कर्मचारियों को मामले की अहम कड़ी मानते हुए अपनी जांच के दायरे में ले लिया है।

सूत्रों के अनुसार, संदेह के घेरे में आए दोनों कर्मचारी UPFC में महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियों से जुड़े थे। आरोप है कि इन्हीं कर्मचारियों ने कथित मास्टरमाइंड और अन्य आरोपियों को संबंधित बैंक अधिकारियों से मिलवाने में अहम भूमिका निभाई, जिससे बैंक स्तर पर भरोसा बना और बाद में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर खातों का संचालन संभव हो सका।

भरोसे की कड़ी कैसे बनी

CBI की जांच में यह भी सामने आया है कि इस धोखाधड़ी के मुख्य आरोपी कर्नाटक निवासी दीपक संजीव सुवर्णा और कानपुर निवासी मनीष उर्फ अनीस हैं, जो इस मामले में नामजद आरोपी हैं। जांच एजेंसी के मुताबिक, UPFC के जिन दो कर्मचारियों की भूमिका संदेह के घेरे में है, वे लंबे समय से मनीष के संपर्क में थे।

इन्हीं संपर्कों के जरिए दीपक और मनीष को बैंक अधिकारियों से परिचित कराया गया। बैंक सूत्रों के अनुसार, जब आरोपियों ने खुद को UPFC का अधिकृत प्रतिनिधि बताया, तो विभागीय कर्मचारियों की मौजूदगी और संदर्भ के कारण बैंक अधिकारियों को संदेह नहीं हुआ। इसके बाद फर्जी दस्तावेजों के आधार पर खाता खोला गया और बड़ी धनराशि का लेन-देन कर दिया गया।

फर्जी कागज़, असली पैसा

जांच में यह भी उजागर हुआ है कि शुरुआती स्तर पर दस्तावेजों की औपचारिक जांच तो की गई, लेकिन विभागीय सत्यापन को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया गया। इसी चूक का फायदा उठाकर आरोपियों ने करोड़ों रुपये का ट्रांसफर करवा लिया।

CBI अब यह स्पष्ट करने की कोशिश कर रही है कि UPFC के दोनों कर्मचारियों की भूमिका केवल परिचय कराने तक सीमित थी या वे जानबूझकर इस धोखाधड़ी की साजिश का हिस्सा थे। एजेंसी कॉल डिटेल रिकॉर्ड, बैंकिंग लेन-देन, ई-मेल और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की बारीकी से जांच कर रही है।

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कितनी रकम बची, कितनी गई

जांच से जुड़ी एक राहत की बात यह है कि पूरी राशि निकाले जाने से पहले ही बैंक को अनियमितता का पता चल गया था। जांच के अनुसार, कुल ₹58 करोड़ की राशि एक खाते में मौजूद थी, जिसे समय रहते फ्रीज कर दिया गया, जिससे यह रकम सुरक्षित रह गई।

इसके अलावा, ₹6.95 करोड़ की राशि छह अलग-अलग खातों में ट्रांसफर की गई थी। बैंक अधिकारियों ने त्वरित कार्रवाई करते हुए इनमें से लगभग ₹4 करोड़ की राशि भी फ्रीज कर ली है। हालांकि, अब भी करीब ₹2.95 करोड़ की रिकवरी बाकी है, जिसे लेकर बैंक और जांच एजेंसियां प्रयासरत हैं।

बैंकिंग सिस्टम पर सवाल

फर्जी दस्तावेजों के आधार पर खाता खुलना और इतनी बड़ी रकम का ट्रांसफर संभव हो जाना, बैंकिंग व्यवस्था की आंतरिक जांच प्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस मामले में केवल आरोपियों की साजिश ही नहीं, बल्कि सिस्टम की कमजोरियों की भी भूमिका रही है।

संबंधित बैंक प्रबंधन का कहना है कि पूरे मामले की आंतरिक समीक्षा की जा रही है और यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है, तो जिम्मेदारी तय कर विभागीय कार्रवाई की जाएगी। इसके बावजूद, इतने बड़े वित्तीय घोटाले में अब तक किसी ठोस कार्रवाई का न होना कई सवाल खड़े करता है।

आगे की जांच

CBI अधिकारियों के अनुसार, आने वाले दिनों में जांच का दायरा और बढ़ाया जा सकता है। एजेंसी यह भी पड़ताल कर रही है कि क्या इस फर्जीवाड़े में अन्य सरकारी या बैंकिंग कर्मचारी भी शामिल थे।

जांच एजेंसी का कहना है कि उसकी प्राथमिकता पूरी राशि की वसूली, दोषियों की पहचान और भविष्य में इस तरह के मामलों को रोकने के लिए सिस्टम की खामियों को उजागर करना है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, इस बहुचर्चित घोटाले से जुड़े और भी अहम तथ्य सामने आने की संभावना जताई जा रही है।

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