छिपी सहमति, अलर्ट की कमी और कैंसिलेशन में दिक्कतें; हर महीने करीब एक अरब ऑटो-डेबिट से बढ़ी चिंता

ऑटो-पे पर सख्ती: बिना अनुमति कटौती की शिकायतों पर RBI ने मांगी रिपोर्ट

Roopa
By Roopa
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नई दिल्ली: यूपीआई ऑटो-पे के जरिए बिना स्पष्ट अनुमति पैसे कटने की बढ़ती शिकायतों के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) को पूरे सिस्टम की व्यापक समीक्षा करने का निर्देश दिया है। ऑटो-पे लेनदेन तेजी से बढ़कर हर महीने लगभग एक अरब तक पहुंच गए हैं और कुल यूपीआई ट्रांजैक्शन में इनकी हिस्सेदारी करीब 5 प्रतिशत हो गई है, जिससे जोखिम का दायरा भी बढ़ा है।

बैंक और पेमेंट ऐप्स के उपयोगकर्ताओं ने शिकायत की है कि उनके खातों से बिना स्पष्ट मंजूरी रकम डेबिट हो गई, जबकि कई लोगों को सक्रिय मैंडेट ढूंढने या रद्द करने में कठिनाई हुई। कई मामलों में ऐप हटाने के बाद भी पैसे कटते रहे, क्योंकि मैंडेट बैंक स्तर पर सक्रिय रहता है। कुछ उपभोक्ताओं ने यह भी कहा कि ऑटो-डेबिट के समय उन्हें एसएमएस अलर्ट नहीं मिला, जिससे पारदर्शिता और सहमति प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं।

आरबीआई ने एनपीसीआई से मैंडेट के पूरे जीवनचक्र — बनाने, जानकारी देने, संशोधन, अलर्ट और रद्द करने — की जांच कर खामियां दूर करने को कहा है। समीक्षा में यह देखा जाएगा कि सहमति स्क्रीन कितनी स्पष्ट है, ऐप में मैंडेट की जानकारी कितनी प्रमुखता से दिखती है और क्या रद्द करने की प्रक्रिया सरल व समयबद्ध है।

यूपीआई ऑटो-पे सुविधा 2020 में शुरू की गई थी, ताकि ओटीटी सब्सक्रिप्शन, बिजली-पानी के बिल, बीमा प्रीमियम और ईएमआई जैसे नियमित भुगतान अपने-आप हो सकें। सुविधा बढ़ने से भुगतान विफलता कम हुई, लेकिन तेज विस्तार के साथ उपयोगिता और अनुपालन से जुड़े मुद्दे सामने आए हैं। साइबर क्राइम इकाइयों और बैंकों ने ऐसे मामलों की ओर ध्यान दिलाया है, जहां एक बार का भुगतान स्थायी मैंडेट में बदल गया या शर्तें छोटे अक्षरों में छिपी रहीं।

मुख्य शिकायतें तीन तरह की हैं — अनुमति देते समय स्पष्ट जानकारी का अभाव, ऐप में सक्रिय मैंडेट की अधूरी सूची और सब्सक्रिप्शन रद्द करने में बाधा। कुछ उपयोगकर्ताओं का कहना है कि मैंडेट सेक्शन में सभी अनुमतियां नहीं दिखतीं, जबकि कई मामलों में कैंसिल विकल्प ढूंढना मुश्किल होता है या तुरंत लागू नहीं होता।

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आरबीआई की पहल डिजिटल भुगतान में उपभोक्ता सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में मानी जा रही है। नियामक चाहता है कि मैंडेट बनाते समय व्यापारी का नाम, कटौती की आवृत्ति, अधिकतम राशि और वैधता अवधि स्पष्ट रूप से दिखाई जाए। साथ ही हर ऑटो-डेबिट पर रियल-टाइम अलर्ट और आसान रद्दीकरण की व्यवस्था हो।

उद्योग के आंकड़े इस मुद्दे की गंभीरता दिखाते हैं। पिछले एक साल में ऑटो-पे का उपयोग दोगुना हुआ है। नवंबर 2025 में शीर्ष 10 बैंकों ने 92 करोड़ से अधिक आवर्ती यूपीआई लेनदेन प्रोसेस किए। मासिक लेनदेन अब एक अरब के करीब पहुंचने से विवादित मैंडेट की छोटी संख्या भी बड़ी समस्या बन सकती है।

पेमेंट इकोसिस्टम से जुड़े पक्षों को इंटरफेस डिजाइन सुधारने, मैंडेट डैशबोर्ड मजबूत करने और अलर्ट सिस्टम मानकीकृत करने की जरूरत बताई गई है। बैंकों से यह भी अपेक्षा है कि एक ही खाते से जुड़े सभी यूपीआई ऐप्स पर मैंडेट दिखाई दें और वहीं से रद्द किए जा सकें, ताकि मूल व्यापारी ऐप पर निर्भरता कम हो।

उपभोक्ताओं के लिए यह जरूरी बताया गया है कि वे समय-समय पर अपने सक्रिय मैंडेट की समीक्षा करें और केवल ऐप हटाने पर निर्भर न रहें। उपभोक्ता संगठनों ने सभी बैंकों के लिए एकीकृत मैंडेट रजिस्ट्री की मांग भी की है, जिससे नियंत्रण और निगरानी आसान हो सके।

एनपीसीआई बैंकों, पेमेंट ऐप्स और व्यापारियों से परामर्श के बाद अपनी रिपोर्ट सौंपेगा। संभावित सुधारों में सख्त सहमति प्रक्रिया, एक समान कैंसिलेशन समयसीमा और बेहतर नोटिफिकेशन नियम शामिल हो सकते हैं, ताकि बिना जानकारी पैसे कटने की घटनाएं रोकी जा सकें।

डिजिटल भुगतान के विस्तार के साथ सुविधा और नियंत्रण के बीच संतुलन नियामकीय प्राथमिकता बनता जा रहा है। ऑटो-पे की समीक्षा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्वचालित भुगतान उपयोगकर्ता की स्पष्ट सहमति और पूर्ण पारदर्शिता के साथ ही हों।

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