जयपुर | राजस्थान में साइबर ठगी की रफ्तार 2025 में चिंताजनक स्तर पर पहुंच गई। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में साइबर फ्रॉड के मामलों में 27.7 प्रतिशत की तेज़ बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिसमें कुल 1,27,713 शिकायतें सामने आईं। इन मामलों में ठगों ने लोगों से करीब ₹768.7 करोड़ की रकम उड़ा ली, जबकि 73 प्रतिशत ठगी निवेश के नाम पर की गई।
पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि 2024 में जहां करीब 1 लाख शिकायतें दर्ज हुई थीं, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 1.27 लाख के पार पहुंच गई। बढ़ती शिकायतों के साथ-साथ साइबर ठगी के तरीके भी लगातार बदलते रहे — लेकिन राहत की बात यह रही कि डिजिटल ट्रैकिंग और बैंकों के साथ त्वरित समन्वय के ज़रिये बड़ी रकम समय रहते होल्ड कराई जा सकी।
₹179 करोड़ की रकम होल्ड, 71% की बढ़ोतरी
राज्य साइबर क्राइम तंत्र की बड़ी उपलब्धि यह रही कि 2025 में पीड़ितों की ₹179 करोड़ की ठगी की रकम बैंकों में होल्ड कराई गई। यह आंकड़ा 2024 में होल्ड कराई गई ₹104 करोड़ की राशि से 71 प्रतिशत अधिक है। अधिकारियों का कहना है कि शुरुआती घंटों में शिकायत दर्ज होने से फंड रिकवरी की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
1930 हेल्पलाइन बनी पहली लाइन ऑफ डिफेंस
पीड़ितों के लिए राहत की बात यह है कि 1930 साइबर क्राइम हेल्पलाइन अब 24 घंटे सक्रिय है। प्रदेश के छह संभागीय मुख्यालयों पर तीन-तीन लाइन, जयपुर पुलिस कमिश्नरेट में सात लाइन और पुलिस मुख्यालय पर पांच लाइन संचालित हैं — यानी कुल 30 कॉल लाइनें लगातार मदद के लिए उपलब्ध हैं। कॉल रिस्पॉन्स टाइम घटाने के लिए पीआरआई लाइनों की संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है।
लालच और डर—ठगी के दो बड़े हथियार
विश्लेषण में सामने आया है कि साइबर ठगी के पीछे दो मुख्य कारक सबसे ज़्यादा असर डाल रहे हैं—
- लालच: कम समय में दोगुना या तिगुना मुनाफा, शेयर मार्केट टिप्स और ‘घर बैठे लाखों कमाएं’ जैसे वादे
- डर: पुलिस, सीबीआई या एजेंसियों का नाम लेकर ‘डिजिटल अरेस्ट’, अकाउंट फ्रीज और कानूनी कार्रवाई की धमकी
इसके अलावा, AI वॉयस क्लोनिंग, डीपफेक, और डेटा लीक ने ठगों का काम आसान कर दिया है। डार्क वेब पर मोबाइल नंबर, पहचान संबंधी जानकारी और अन्य निजी डेटा आसानी से उपलब्ध होना भी बड़ी वजह बन रहा है।
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किन तरीकों से सबसे ज़्यादा ठगी
राज्य में दर्ज शिकायतों के ट्रेंड के मुताबिक—
- निवेश के नाम पर ठगी: 73%
(टेलीग्राम-व्हाट्सऐप ग्रुप, शेयर मार्केट, क्रिप्टो, हाई-रिटर्न स्कीम) - डिजिटल अरेस्ट: करीब 1%
(खुद को पुलिस/सीबीआई अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर डराना) - बिजली बिल, KYC अपडेट, बैंक अलर्ट: 14%
- गेमिंग, ऑनलाइन टास्क और मार्केटिंग स्कीम: 7%
- ई-कॉमर्स, शादी के ई-निमंत्रण, फर्जी इमरजेंसी कॉल: 5%
पुलिस की चेतावनी
अधिकारियों ने दो टूक कहा है कि कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी कोई अवधारणा नहीं है। कोई भी पुलिस या सरकारी एजेंसी फोन कॉल, वीडियो कॉल या मैसेज के ज़रिये पैसे नहीं मांगती। ऐसे किसी भी कॉल को तुरंत ठगी मानकर रिपोर्ट किया जाना चाहिए।
क्या करें, क्या न करें
पुलिस सलाह देती है कि संदिग्ध कॉल या मैसेज मिलने पर—
- घबराएं नहीं, तुरंत कॉल काटें
- किसी लिंक पर क्लिक न करें
- भुगतान से जुड़ी जानकारी साझा न करें
- 1930 पर कॉल करें या राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएं
अधिकारियों का कहना है कि साइबर अपराध अब तकनीक से ज़्यादा मानसिक दबाव और भ्रम पर आधारित हो गया है। डिजिटल लेन-देन के इस दौर में जागरूकता और समय पर शिकायत ही सबसे बड़ा बचाव है।
