नई दिल्ली: सार्वजनिक खरीद प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए Railway Board ने सभी जोनों और उत्पादन इकाइयों की सतर्कता शाखाओं को बड़े मूल्य के टेंडरों की कड़ी जांच के निर्देश दिए हैं। बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि हाई-वैल्यू कॉन्ट्रैक्ट्स में कार्टेलाइजेशन, बोली में सांठगांठ और गुणवत्ता से समझौते की किसी भी आशंका पर तत्काल कार्रवाई की जाए।
सूत्रों के मुताबिक, ताजा निर्देश में इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल, सिग्नलिंग एवं दूरसंचार तथा मैकेनिकल विभागों के उच्च व्यय वाले अनुबंधों को विशेष निगरानी दायरे में रखा गया है। बोर्ड का जोर निवारक सतर्कता पर है, ताकि अनियमितताओं को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सके और प्रणालीगत कमियों को दूर किया जा सके।
सामान्य जांच से आगे, अब तकनीकी परख
2026 की नई सतर्कता रूपरेखा के तहत अब केवल सामान्य सुरक्षा अनुपालन की जांच पर्याप्त नहीं मानी जाएगी। सतर्कता टीमों को उच्च गुणवत्ता वाले कंक्रीट, सिग्नलिंग केबल, ओवरहेड उपकरणों की नींव और अन्य महत्वपूर्ण घटकों की तकनीकी गुणवत्ता की गहराई से जांच करने के निर्देश दिए गए हैं।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पहले प्राथमिकता प्रक्रियात्मक अनुपालन पर रहती थी, लेकिन अब ध्यान तकनीकी विफलताओं के संभावित बिंदुओं की पहचान पर है। उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी निर्माण या आपूर्ति में गुणवत्ता से समझौता न हो और भविष्य में परिचालन जोखिम न बढ़ें।
बोर्ड ने यह भी कहा है कि आपूर्ति की गई सामग्री का अनिवार्य परीक्षण किया जाए और संबंधित विभाग यह प्रमाणित करें कि संभावित बोली-कार्टेल को तोड़ने के लिए आवश्यक कदम उठाए गए हैं।
सेवा अनुबंध भी रडार पर
केवल इंफ्रास्ट्रक्चर कार्य ही नहीं, बल्कि पार्किंग, ऑन-बोर्ड हाउसकीपिंग सर्विस (OBHS) और मशीनीकृत सफाई जैसे सेवा अनुबंधों की भी निगरानी बढ़ाई जाएगी। इन क्षेत्रों में निजी भागीदारी बढ़ने के साथ पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी टेंडर प्रक्रिया सुनिश्चित करना रेलवे की प्राथमिकता बन गया है।
अधिकारियों का कहना है कि यह कदम केवल दंडात्मक कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि खरीद प्रणाली में दीर्घकालिक सुधार लाने की रणनीति का हिस्सा है। जिन अनुबंधों में दोहराव या सीमित प्रतिस्पर्धा के संकेत मिलेंगे, उनकी विशेष समीक्षा की जाएगी।
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ई-प्रोक्योरमेंट पर कड़ी नजर
पारदर्शिता बढ़ाने के लिए बोर्ड ने भारतीय रेलवे ई-प्रोक्योरमेंट सिस्टम (IREPS) के जरिए टेंडरों के अंतिम रूप देने की प्रक्रिया पर कड़ी निगरानी के निर्देश दिए हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से टेंडर प्रक्रिया संचालित होने से मानवीय हस्तक्षेप कम होगा और हेरफेर की गुंजाइश घटेगी।
IREPS में उपलब्ध डिजिटल ऑडिट ट्रेल, बिड हिस्ट्री और स्वचालित दस्तावेजीकरण को संभावित सांठगांठ या समन्वित मूल्य निर्धारण के संकेतों की पहचान के लिए महत्वपूर्ण उपकरण माना जा रहा है। सतर्कता अधिकारियों को ऐसे पैटर्न—जैसे समान दरें, बारी-बारी से सफल बोली या सीमित प्रतिस्पर्धा—पर विशेष नजर रखने को कहा गया है।
कार्टेलाइजेशन पर सख्ती की पृष्ठभूमि
सार्वजनिक खरीद में कार्टेलाइजेशन को लेकर पहले भी जांचें हो चुकी हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, Competition Commission of India (CCI) ने FY20 से FY25 के बीच 35 कार्टेलाइजेशन मामलों की जांच की। इनमें रेलवे क्षेत्र भी शामिल रहा है।
जून 2022 में रेलवे टेंडरों में सुरक्षात्मक ट्यूब की आपूर्ति से जुड़े मामले में सात कंपनियों को दोषी ठहराया गया था। इसके बाद अक्टूबर 2022 में पूर्वी रेलवे को एक्सल बेयरिंग की आपूर्ति में कथित कार्टेल बनाने के मामले में आठ कंपनियों के खिलाफ अंतिम आदेश जारी किया गया था। इन मामलों ने रेलवे खरीद प्रणाली में निगरानी मजबूत करने की आवश्यकता को रेखांकित किया।
निवारक सतर्कता पर फोकस
वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, नई रणनीति का उद्देश्य किसी घोटाले के उजागर होने का इंतजार करना नहीं, बल्कि संभावित अनियमितताओं को पहले ही रोकना है। हाई-वैल्यू कॉन्ट्रैक्ट्स की तकनीकी जांच, सामग्री परीक्षण और डिजिटल मॉनिटरिंग के जरिए सार्वजनिक धन की सुरक्षा और परिसंपत्तियों की गुणवत्ता सुनिश्चित की जाएगी।
हर साल हजारों टेंडर जारी करने वाले भारतीय रेलवे के लिए यह पहल एक व्यापक सुधार अभियान का संकेत है। बोर्ड का मानना है कि पारदर्शिता को संस्थागत रूप देने और टेंडर कार्टेल पर अंकुश लगाने से न केवल प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, बल्कि परियोजनाओं की गुणवत्ता और समयबद्धता भी बेहतर होगी।
