नोएडा टेक्नीशियन मौत मामला: पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन पर बिल्डरों के खिलाफ नया FIR दर्ज

Team The420
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नोएडा | सेक्टर-150 में जलभराव वाले एक गहरे गड्ढे में कार गिरने से एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की मौत के मामले में जांच का दायरा और व्यापक कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) की पड़ताल के बीच निर्माण कंपनियों के खिलाफ पर्यावरण और प्रदूषण कानूनों के उल्लंघन को लेकर एक नया प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई है। यह मामला न केवल लापरवाह निर्माण गतिविधियों बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा मानकों की अनदेखी की ओर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, यह नई FIR Lotus Greens Construction Pvt Ltd और MZ Wiztown Planners Pvt Ltd से जुड़े पांच बिल्डरों के खिलाफ दर्ज की गई है। प्राथमिकी में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता के तहत विभिन्न धाराएं लगाई गई हैं। आरोप है कि निर्माण स्थल पर लंबे समय से मौजूद जलभराव वाले गड्ढे के कारण प्रदूषण फैला और यह सीधे तौर पर मानव जीवन के लिए खतरा बन गया।

यह FIR ऐसे समय दर्ज की गई है, जब SIT लगातार तीसरे दिन मामले की जांच कर रही है। जांच दल ने Noida Authority के विभिन्न विभागों—सिविल, प्रोजेक्ट्स और ट्रैफिक सेल—से सेक्टर-150 में किए गए विकास और निर्माण कार्यों से जुड़ी विस्तृत जानकारी मांगी है, विशेष रूप से उस स्थान को लेकर जहां यह हादसा हुआ।

जलभराव और सुरक्षा मानकों की अनदेखी

FIR के अनुसार, गश्त के दौरान पुलिस को सेक्टर-150 में एक अत्यंत बड़ा और गहरा गड्ढा मिला, जो भारी मशीनरी से खोदा गया प्रतीत होता है और वर्षों से पानी से भरा हुआ था। लंबे समय तक पानी जमा रहने से वह गंदा और कीचड़युक्त हो गया, जिससे प्रदूषण फैलने की स्थिति बनी। आरोप है कि बारिश के दौरान कचरा बहकर इस गड्ढे में चला गया, जिससे वायु और जल प्रदूषण दोनों बढ़े।

पुलिस ने यह भी पाया कि गड्ढे के आसपास न तो किसी तरह की फेंसिंग थी और न ही चेतावनी संकेत लगाए गए थे। सार्वजनिक सड़क के नजदीक इतने बड़े, खुले और जलभराव वाले गड्ढे को लंबे समय तक छोड़ देना गंभीर लापरवाही माना गया है। FIR में इसे सार्वजनिक उपद्रव करार देते हुए कहा गया है कि इससे बड़े हादसों का खतरा लगातार बना हुआ था।

निर्माण नियमों के उल्लंघन के संकेत

जांच में यह भी सामने आया कि गड्ढे के आसपास सक्रिय निर्माण स्थल मौजूद थे, जो निर्माण प्रबंधन और पर्यावरणीय स्वीकृतियों के उल्लंघन की ओर इशारा करते हैं। स्थानीय निवासियों ने शिकायत की है कि गड्ढे से उठने वाली दुर्गंध के कारण हवा के रुख के साथ सांस लेना तक मुश्किल हो जाता था, लेकिन इसके बावजूद कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठाया गया।

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रिकॉर्ड के अनुसार, संबंधित प्लॉट वर्ष 2014 में नोएडा प्राधिकरण से खरीदा गया था और बाद में 2020 में स्वामित्व में बदलाव हुआ। हालांकि, पहले की निर्माण कंपनी की हिस्सेदारी अब भी बनी हुई बताई जा रही है, जिससे जिम्मेदारी तय करने का प्रश्न और जटिल हो गया है।

पहले भी दर्ज हो चुकी है FIR

इस मामले में इससे पहले भी एक प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है, जो मृतक के परिजनों की शिकायत पर आधारित थी। उस FIR में लापरवाही, जान को खतरे में डालने और गैर-इरादतन हत्या से संबंधित धाराएं लगाई गई थीं। जांच के दौरान एक निर्माण कंपनी से जुड़े एक निदेशक को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा गया है।

जांच से जुड़ी व्यापक चिंताएं

SIT को तय समयसीमा में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपनी है। माना जा रहा है कि यह मामला केवल एक दुर्घटना भर नहीं है, बल्कि शहरी विकास, निर्माण निगरानी और पर्यावरण अनुपालन की खामियों को उजागर करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते सुरक्षा मानकों का पालन कराया गया होता, तो इस तरह की त्रासदी टाली जा सकती थी।

फिलहाल, जांच जारी है और आने वाले दिनों में इस बात पर स्पष्टता आने की उम्मीद है कि जिम्मेदारी किस स्तर तक तय होती है और क्या इस मामले से शहरी निर्माण परियोजनाओं में निगरानी तंत्र को और सख्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।

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