नई दिल्ली | राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा (स्नातकोत्तर) यानी NEET PG में शामिल हुए 800 से अधिक अभ्यर्थियों ने 2025–26 के दाख़िला सत्र में अपना दर्जा भारतीय से गैर-आवासीय भारतीय (NRI) में बदल लिया है। इस बड़े पैमाने पर हुए बदलाव ने एक बार फिर भारत की मेडिकल शिक्षा प्रणाली में निष्पक्षता, मेरिट और वहन-क्षमता को लेकर बहस तेज़ कर दी है।
काउंसलिंग से जुड़ा डेटा Medical Counselling Committee (MCC) द्वारा जारी किया गया है। इसके अनुसार, कुल 811 उम्मीदवारों ने तीसरे राउंड की पीजी काउंसलिंग में भाग लेने के लिए NRI श्रेणी में रूपांतरण का विकल्प चुना। इस कदम से अभ्यर्थियों को NRI कोटा की सीटों तक पहुँच मिलती है, जहाँ आम तौर पर कट-ऑफ कम रहता है, लेकिन फीस बेहद ज़्यादा होती है।
NRI कोटा की सीटें मेडिकल शिक्षा में सबसे महँगी मानी जाती हैं। इसके बावजूद, यहाँ प्रतिस्पर्धा प्रबंधन कोटा से भी कम रहती है। नतीजतन, कम रैंक वाले लेकिन आर्थिक रूप से सक्षम उम्मीदवारों के लिए उच्च माँग वाली क्लिनिकल स्पेशियलिटीज़ में दाख़िला पाने का रास्ता खुल जाता है।
NRI पात्रता के दो रास्ते
MCC की सूची के मुताबिक, रूपांतरण के लिए पात्र पाए गए उम्मीदवार दो श्रेणियों में बँटे हैं। पहली श्रेणी में वे अभ्यर्थी शामिल हैं जो स्वयं NRI हैं या NRI माता-पिता की संतान हैं — ऐसे 113 उम्मीदवार हैं। दूसरी और कहीं बड़ी श्रेणी में 698 उम्मीदवार आते हैं, जिन्होंने स्वयं को पहली या दूसरी डिग्री के NRI रिश्तेदारों का आश्रित (ward) बताकर पात्रता हासिल की।
यही दूसरी श्रेणी सबसे ज़्यादा विवादों के घेरे में है। विस्तारित नियमों के तहत अब उम्मीदवार चाचा, चाची, मामा, मौसी या दादा-दादी जैसे विदेश में रहने वाले रिश्तेदारों के प्रायोजन के आधार पर भी NRI दर्जा दावा कर सकते हैं, भले ही उनके माता-पिता या भाई-बहन NRI न हों।
स्कोर का वितरण इस रास्ते से मिलने वाले फ़ायदे को उजागर करता है। पहली श्रेणी में NRI उम्मीदवारों का सबसे कम स्कोर 800 में से 82 रहा, यानी लगभग 10%। वहीं दूसरी श्रेणी में यह न्यूनतम स्कोर 28 तक गिर गया, जो सिर्फ़ 3.5% के आसपास है।
कम रैंक, भारी खर्च
MCC के आँकड़े बताते हैं कि पहली श्रेणी के 66% उम्मीदवारों के अंक 215 से कम थे, जिससे उनकी रैंक 1.5 लाख से नीचे जाती है। दूसरी श्रेणी में यह अनुपात और भी ज़्यादा रहा, जहाँ 60% से अधिक उम्मीदवार 1.5 लाख रैंक से नीचे थे।
इसके बावजूद, NRI कोटा के ज़रिये इन उम्मीदवारों को लोकप्रिय क्लिनिकल शाखाओं में दाख़िला मिल सकता है — बशर्ते वे भारी फीस चुकाने में सक्षम हों। विभिन्न राज्यों, स्पेशियलिटी और संस्थान (ख़ासकर डीम्ड यूनिवर्सिटी) के आधार पर NRI कोटा की वार्षिक फीस ₹45 लाख से ₹95 लाख तक पहुँच सकती है।
मेडिकल शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इससे दाख़िले का एक समानांतर ढाँचा बन जाता है, जहाँ अकादमिक प्रदर्शन से ज़्यादा आर्थिक क्षमता निर्णायक बनती है।
व्यवस्था रूपांतरण की इजाज़त क्यों देती है
नीति के समर्थकों का तर्क है कि यदि ऐसे रूपांतरण की अनुमति न दी जाए, तो कई NRI कोटा सीटें खाली रह जाएँगी। बीते वर्षों में, खाली NRI सीटों को अक्सर प्रबंधन कोटा में बदला गया, जहाँ फीस अपेक्षाकृत कम होती है — एक स्थिति जिसका निजी मेडिकल कॉलेजों ने विरोध किया है।
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अदालतों ने भी कई मामलों में यह दलील स्वीकार की है कि निजी मेडिकल संस्थानों को महँगी सीटें खाली रहने से होने वाले वित्तीय नुकसान को वहन करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इसी न्यायिक दृष्टिकोण के चलते, समय के साथ NRI वार्ड की परिभाषा का दायरा बढ़ता गया।
मेरिट बनाम पहुँच की बहस
आलोचकों का कहना है कि यह प्रथा पहले से दबाव में चल रही मेरिट-आधारित प्रवेश प्रणाली को कमजोर करती है। बेहद कम अंकों वाले उम्मीदवारों का केवल भुगतान के आधार पर क्लिनिकल शाखाओं में पहुँचना असमानता को गहरा करता है और लंबे समय में चिकित्सा मानकों पर असर डाल सकता है।
छात्र संगठनों और नीति विशेषज्ञों ने पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए हैं — खासकर इस बात पर कि पहली और दूसरी डिग्री के रिश्तों की जाँच कैसे होती है और क्या यह प्रक्रिया दुरुपयोग के लिए खुली है।
बार-बार उभरता नीतिगत मुद्दा
ताज़ा आँकड़ों ने NRI कोटा पर बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है, ऐसे समय में जब पीजी मेडिकल सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा बेहद तीखी है और फीस लगातार बढ़ रही है। हर काउंसलिंग सत्र के साथ रूपांतरण कराने वाले उम्मीदवारों की संख्या बढ़ना बताता है कि यह अब अपवाद नहीं, बल्कि एक स्थापित रणनीति बनती जा रही है।
2025–26 के दाख़िले अपने अंतिम चरण में हैं और अब निगाहें नियामकों व नीति-निर्माताओं पर हैं — क्या संस्थानों की आर्थिक व्यवहार्यता और मेरिटोक्रेसी के बीच संतुलन बहुत ज़्यादा एक तरफ़ झुक गया है, और क्या भरोसा बहाल करने के लिए नियमों में सख़्ती या अतिरिक्त सुरक्षा उपाय ज़रूरी हैं।
