मध्य प्रदेश में पिछले छह वर्षों में लापता महिलाओं और बालिकाओं के मामलों ने गंभीर चिंता पैदा कर दी है। विधानसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार 2020 से 2026 के बीच कुल 2,69,500 महिलाएं और लड़कियां गायब हुईं, जिनमें से 50,000 से अधिक अब भी लापता हैं और उनके बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं मिल सकी है। सरकार ने इन मामलों को ‘पेंडिंग’ श्रेणी में रखा है और कहा है कि तलाश जारी है।
प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार इस अवधि में 2.06 लाख से अधिक महिलाएं और लगभग 63,500 बालिकाएं लापता दर्ज की गईं। पुलिस कार्रवाई के जरिए 1.58 लाख से ज्यादा महिलाओं और 61,000 बच्चियों को बरामद किया गया, जबकि करीब 48,000 महिलाएं और 2,200 बालिकाएं अब भी खोज से बाहर हैं। यह स्थिति ट्रैकिंग सिस्टम, अंतरराज्यीय समन्वय और पुनर्वास व्यवस्था में मौजूद चुनौतियों की ओर इशारा करती है।
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चार प्रमुख शहरों में इंदौर में लापता महिलाओं की संख्या सबसे अधिक दर्ज की गई। इसके बाद भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर का स्थान रहा। औद्योगिक और तेजी से शहरीकरण वाले जिलों में मामलों की संख्या अधिक पाई गई, जबकि आदिवासी और सीमावर्ती क्षेत्रों में भी उल्लेखनीय आंकड़े सामने आए, जिससे पलायन, मानव तस्करी और सामाजिक-आर्थिक कारणों की जटिलता उजागर होती है।
सरकार ने स्पष्ट किया कि जब तक किसी लापता महिला या बालिका के बारे में ठोस जानकारी नहीं मिलती, तब तक मामले बंद नहीं किए जाते। पुलिस थानों, विशेष इकाइयों और अंतरराज्यीय अलर्ट के माध्यम से खोज अभियान जारी है। महिला थानों और हेल्प डेस्क को ऐसे मामलों की निगरानी और त्वरित जांच की जिम्मेदारी दी गई है।
राज्य में वर्तमान में 52 महिला थाने और 987 महिला हेल्प डेस्क संचालित हो रहे हैं। लापता नाबालिगों की तलाश के लिए विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं। किशोरियों और किशोरों के लिए जागरूकता कार्यक्रम तथा सामुदायिक निगरानी की पहलें भी शुरू की गई हैं ताकि तस्करी और शोषण की घटनाओं को रोका जा सके।
पुलिस मुख्यालय स्तर पर वर्षभर चलने वाले अभियान की नियमित समीक्षा की जा रही है। महिलाओं के भरण-पोषण और संरक्षण से जुड़े अदालतों के वारंटों के निष्पादन के लिए विशेष अभियान भी चलाया जा रहा है, जिससे आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
इन प्रयासों के बावजूद बड़ी संख्या में लंबित मामलों ने रोकथाम, त्वरित रिपोर्टिंग और पुनर्वास व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता को रेखांकित किया है। सदन में दीर्घकालिक रणनीति, विभागीय समन्वय और बजट आवंटन से जुड़े प्रश्न उठाए गए।
महिला सुरक्षा के लिए वित्त वर्ष 2025–26 में ₹41,88,54,200 का प्रावधान किया गया है, जिसमें बुनियादी ढांचे, जागरूकता अभियान और सहायता सेवाओं पर खर्च शामिल है। तकनीकी आधारित ट्रैकिंग, डाटाबेस एकीकरण और अन्य राज्यों के साथ समन्वय को मजबूत करने की प्रक्रिया जारी है ताकि बरामदगी दर में सुधार हो सके।
आंकड़े यह भी संकेत देते हैं कि बार-बार लापता होने वाले मामलों, घर से भागने वाली बालिकाओं और तस्करी प्रभावित जिलों पर विशेष निगरानी की जरूरत है। पुलिस के अनुसार आर्थिक पलायन, घरेलू विवाद, बाल विवाह और संगठित तस्करी नेटवर्क कई मामलों के पीछे प्रमुख कारण हैं, जिससे जांच जटिल हो जाती है।
परिजनों से अपील की गई है कि किसी भी गुमशुदगी की तुरंत रिपोर्ट दर्ज कराएं, क्योंकि शुरुआती सूचना मिलने पर खोज की सफलता की संभावना बढ़ जाती है। स्कूलों और समुदाय स्तर पर जागरूकता कार्यक्रमों का विस्तार किया जा रहा है ताकि संवेदनशील समूहों की समय रहते पहचान की जा सके।
सरकार ने कहा कि अधिकांश लापता व्यक्तियों को बरामद कर लिया गया है, लेकिन हजारों मामलों का लंबित रहना कानून-व्यवस्था और मानवीय दृष्टि से गंभीर चुनौती है। इन मामलों की समीक्षा तेज जांच, बेहतर समन्वय और बरामद पीड़ितों के पुनर्वास पर केंद्रित होगी।
लंबित सभी मामलों की सक्रिय जांच जारी है और प्रत्येक लापता महिला व बालिका का पता लगाने तक अभियान जारी रखने की बात कही गई है।
