मध्य पूर्व एक बार फिर बढ़ते सैन्य तनाव के दौर में प्रवेश करता दिख रहा है। ईरान ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि उसके खिलाफ किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई को वह “ऑल-आउट वॉर” यानी पूर्ण युद्ध के रूप में देखेगा। यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिका ने खाड़ी क्षेत्र और उसके आसपास अपनी नौसैनिक और वायु सैन्य मौजूदगी को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा दिया है।
फारस की खाड़ी और रणनीतिक समुद्री मार्गों में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों में आई तेजी ने क्षेत्रीय अस्थिरता को और गहरा कर दिया है। ईरान का कहना है कि उसकी सशस्त्र सेनाएं हाई अलर्ट पर हैं और किसी भी संभावित खतरे से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। तेहरान ने यह भी स्पष्ट किया कि वह टकराव नहीं चाहता, लेकिन यदि उस पर हमला होता है—चाहे वह सीमित स्तर का हो या व्यापक—तो उसका जवाब निर्णायक और कठोर होगा।
ईरानी नेतृत्व इस सैन्य तैनाती को सीधे तौर पर संभावित हमले की तैयारी के रूप में देख रहा है। अधिकारियों के मुताबिक, हालिया गतिविधियां केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा हैं।
अमेरिका की ओर से पुष्टि की गई है कि उसने अपने सैन्य संसाधनों को मध्य पूर्व में पुनः तैनात किया है। एक विमानवाहक पोत समूह—जिसमें युद्धपोत और विध्वंसक शामिल हैं—को क्षेत्र की ओर भेजा गया है। यह समूह पहले से मौजूद अमेरिकी नौसैनिक बलों के साथ मिलकर काम करेगा। इस कदम से क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य कर्मियों की संख्या में हजारों की बढ़ोतरी हुई है।
नौसैनिक तैनाती के साथ-साथ लड़ाकू विमानों की संख्या भी बढ़ाई गई है, ताकि हवाई निगरानी और सुरक्षा क्षमता को मजबूत किया जा सके। अमेरिका के सहयोगी देशों ने भी एहतियातन कदम उठाते हुए खाड़ी के कुछ हिस्सों में अपने लड़ाकू विमान तैनात किए हैं। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि तैनाती की गति और पैमाना उन दौरों की याद दिलाता है, जब क्षेत्र बड़े सैन्य टकराव के बेहद करीब पहुंच गया था।
यह तनाव ऐसे समय में उभर रहा है, जब ईरान और पश्चिमी देशों के बीच संबंध पहले से ही बेहद तनावपूर्ण हैं। पूर्व में हुए हमलों का उद्देश्य ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को कमजोर करना बताया गया था, जिसे ईरान ने अपनी संप्रभुता पर सीधा हमला करार दिया था। मौजूदा सैन्य गतिविधियों ने एक बार फिर व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष की आशंकाओं को जन्म दिया है।
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अमेरिकी पक्ष का कहना है कि यह सैन्य तैनाती किसी संघर्ष को भड़काने के लिए नहीं, बल्कि हालात को नियंत्रित रखने और संभावित खतरे को रोकने के लिए की गई है। हालांकि, वाशिंगटन के बयानों में यह संकेत भी मौजूद है कि यदि अमेरिकी हितों या क्षेत्रीय सुरक्षा को खतरा महसूस हुआ, तो सैन्य विकल्प खुले रहेंगे। इस अस्पष्ट रुख ने कूटनीतिक और रक्षा हलकों में बेचैनी बढ़ा दी है।
स्थिति को और जटिल बना रहा है ईरान के भीतर जारी आंतरिक संकट। हाल के हफ्तों में आर्थिक दबाव और राजनीतिक असंतोष के चलते बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि इन प्रदर्शनों के दौरान हजारों लोगों की जान गई है और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां हुई हैं, हालांकि आधिकारिक आंकड़े इससे कम बताए जा रहे हैं।
ईरानी नेतृत्व ने इन विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी हस्तक्षेप का आरोप लगाया है। सैन्य कमांडरों ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान पर हमला हुआ, तो क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकाने और हित सीधे जवाबी कार्रवाई के दायरे में होंगे।
विशेषज्ञों के अनुसार, बाहरी सैन्य दबाव और आंतरिक अस्थिरता का यह मेल स्थिति को बेहद संवेदनशील बना रहा है। किसी भी तरह की गलत गणना पूरे मध्य पूर्व को बड़े संघर्ष की ओर धकेल सकती है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ेगा।
फिलहाल तनाव कम करने के कूटनीतिक प्रयास सीमित नजर आ रहे हैं। सार्वजनिक बयानबाजी सख्त बनी हुई है और किसी ठोस समाधान के संकेत नहीं मिल रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिन यह तय करेंगे कि क्षेत्र संवाद की ओर बढ़ता है या एक और बड़े सैन्य टकराव के करीब पहुंच जाता है।
