वेतन से कल्याण तक: लेबर कोड से प्राइवेट बैंकों और बीमा कंपनियों की लागत संरचना में बदलाव

Team The420
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नई दिल्ली | केंद्र सरकार द्वारा नवंबर 2025 में लागू किए गए नए लेबर कोड का असर अब देश के बैंकिंग और बीमा क्षेत्रों में साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। प्राइवेट सेक्टर के बैंकों और बीमा कंपनियों में कर्मचारी-संबंधी खर्च में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिसके चलते अक्टूबर–दिसंबर तिमाही (Q3FY26) में उनका ऑपरेटिंग खर्च बढ़ गया। इसके उलट, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अपेक्षाकृत अप्रभावित रहे हैं, क्योंकि उनकी वेतन और लाभ संरचना पहले से ही नए नियमों के काफी करीब थी।

प्राइवेट बैंकों में HDFC Bank ने Q3FY26 में ₹18,770 करोड़ का ऑपरेटिंग खर्च दर्ज किया, जो पिछली तिमाही Q2FY26 में ₹17,110 करोड़ था। बैंक ने बताया कि नए लेबर कोड के कारण इस तिमाही में कर्मचारी लागत पर करीब ₹800 करोड़ का अतिरिक्त असर पड़ा। बैंक का कहना है कि वह केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से जारी होने वाले स्पष्टीकरण और दिशा-निर्देशों पर नजर बनाए हुए है और जरूरत पड़ने पर अकाउंटिंग ट्रीटमेंट में बदलाव किया जा सकता है।

अन्य प्राइवेट बैंकों में भी इसी तरह का रुझान देखने को मिला। ICICI Bank ने अनुमान लगाया है कि लेबर कोड के चलते Q3FY26 में उसके मुनाफे पर ₹145 करोड़ का असर पड़ा है। वहीं Yes Bank ने ₹155 करोड़ का अतिरिक्त प्रावधान किया है। Federal Bank ने कर्मचारी लागत में ₹20.8 करोड़ के अतिरिक्त प्रभाव का अनुमान लगाया, जबकि RBL Bank ने नए नियमों से जुड़ी कर्मचारी लाभ देनदारियों के लिए ₹32 करोड़ का अतिरिक्त प्रावधान किया है।

बीमा कंपनियों पर भी दिखा असर

नए लेबर कोड का असर सिर्फ बैंकिंग तक सीमित नहीं रहा। बीमा क्षेत्र, खासकर प्राइवेट इंश्योरेंस कंपनियों में भी कर्मचारी लाभ से जुड़ा खर्च बढ़ा है। HDFC Life Insurance ने नए नियमों के लागू होने के बाद कर्मचारी लाभ के लिए ₹106.02 करोड़ का अतिरिक्त खर्च दर्ज किया है। ICICI Prudential Life Insurance ने ₹11.04 करोड़ के अतिरिक्त असर का अनुमान लगाया, जबकि ICICI Lombard General Insurance ने कर्मचारी लागत में ₹53.06 करोड़ के अतिरिक्त बोझ का आकलन किया है।

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उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि प्राइवेट सेक्टर पर ज्यादा असर पड़ने की मुख्य वजह वेतन संरचना में अंतर है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में बेसिक सैलरी और लाभ-आधारित भुगतान पहले से ही ज्यादा था, जो नए लेबर कोड की शर्तों के करीब है। इसी कारण उन्हें बड़े बदलाव या अतिरिक्त प्रावधान की जरूरत नहीं पड़ी।

क्यों बढ़ रही है कर्मचारी लागत?

नए लेबर कोड के तहत कुल वेतन संरचना में बेसिक सैलरी का अनुपात बढ़ाना अनिवार्य किया गया है। इससे नियोक्ताओं को ग्रेच्युटी, पेंशन और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में अधिक योगदान देना पड़ता है। नतीजतन, भले ही कुल वेतन में कोई सीधी बढ़ोतरी न हो, लेकिन कुल कर्मचारी लागत बढ़ जाती है।

प्राइवेट बैंकों और बीमा कंपनियों में, जहां अब तक भत्तों और परफॉर्मेंस-लिंक्ड इंसेंटिव का हिस्सा ज्यादा था, वहां वेतन ढांचे में पुनर्गठन करना पड़ा है। इसका सीधा असर तिमाही नतीजों में ऊंचे ऑपरेटिंग खर्च और एकमुश्त प्रावधान के रूप में दिखा है।

क्या हैं नए लेबर कोड?

सरकार ने 21 नवंबर 2025 को चार व्यापक लेबर कोड लागू किए हैं, जिनके जरिए 29 पुराने श्रम कानूनों को एक साथ समाहित किया गया। इनमें वेतन संहिता 2019, औद्योगिक संबंध संहिता 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य स्थितियां संहिता 2020 शामिल हैं। इनका उद्देश्य श्रम कानूनों को सरल बनाना, कर्मचारियों की सुरक्षा बढ़ाना और विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार शर्तों को एकरूप करना है।

30 दिसंबर 2025 को श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने इन कोड्स से जुड़े ड्राफ्ट नियम और FAQs जारी किए, जिसके बाद कंपनियों ने इनके वित्तीय और परिचालन असर का आकलन शुरू किया।

आगे का परिदृश्य

विश्लेषकों का मानना है कि लेबर कोड के कारण प्राइवेट बैंकों और बीमा कंपनियों पर शुरुआती लागत का दबाव जरूर बना है, लेकिन आने वाली तिमाहियों में यह असर स्थिर हो सकता है, जब संस्थान अपनी वेतन संरचना को नए ढांचे के अनुरूप ढाल लेंगे। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर इस बदलाव का प्रभाव सीमित रहने की उम्मीद है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इन सुधारों का दीर्घकालिक असर वेतन-केंद्रित व्यवस्था से हटकर कर्मचारी कल्याण-आधारित ढांचे की ओर संक्रमण के रूप में देखा जाएगा। हालांकि, प्राइवेट वित्तीय संस्थान इन बढ़ी हुई लागतों को बिना मुनाफे पर बड़ा असर डाले कैसे संभालते हैं, यह आने वाले क्वार्टरों में एक अहम मुद्दा बना रहेगा।

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