बेंगलुरु: साइबर ठगी के खिलाफ निर्णायक लड़ाई में Karnataka Police ने बड़ा वार करते हुए 869 म्यूल बैंक खातों का खुलासा किया है, जिनसे जुड़ी 8,788 शिकायतें सामने आई हैं। इन खातों के जरिए करीब ₹285.05 करोड़ की संदिग्ध राशि का लेनदेन हुआ, जिसमें से ₹13 करोड़ से अधिक की रकम अब तक फ्रीज़ कर दी गई है।
राज्य के Cyber Command द्वारा की गई यह पहली व्यापक राज्यव्यापी कार्रवाई मानी जा रही है, जिसमें 68 प्रमुख आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। कई जिलों में एक साथ चलाए गए अभियान के दौरान 80 मोबाइल फोन, 37 पासबुक, 35 एटीएम कार्ड, 28 चेकबुक और छह पैन कार्ड सहित अन्य आपत्तिजनक दस्तावेज जब्त किए गए।
केंद्रीकृत कमांड से बदला जांच का तरीका
अप्रैल 2025 में स्थापित और सितंबर 2025 से पूरी तरह सक्रिय Cyber Command का मुख्यालय Bengaluru में है। इसके तहत राज्य के करीब 45 साइबर क्राइम पुलिस थानों को एकीकृत रिपोर्टिंग ढांचे में जोड़ा गया है।
अधिकारियों का कहना है कि पहले अलग-अलग जिलों में दर्ज शिकायतों का समन्वय समय लेने वाला होता था। कई मामलों में ठगी की रकम राज्य सीमाओं से बाहर चली जाती थी और जांच लंबी खिंचती थी। अब केंद्रीकृत डैशबोर्ड के जरिए नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) पर दर्ज शिकायतों का विश्लेषण एक ही प्लेटफॉर्म से किया जा रहा है।
AI आधारित एल्गोरिदम संदिग्ध लेनदेन के पैटर्न, बार-बार इस्तेमाल हो रहे बैंक खातों और तेजी से घूम रही रकम की पहचान कर रहे हैं, जिससे शुरुआती स्तर पर ही कार्रवाई संभव हो पा रही है।
क्या होते हैं ‘म्यूल अकाउंट’?
साइबर अपराधी सीधे अपने नाम से बैंक खाते इस्तेमाल करने से बचते हैं। वे फर्जी पहचान या लालच देकर आम लोगों के नाम पर खाते खुलवाते हैं और ठगी की रकम को इन खातों में ट्रांसफर कर देते हैं। इन्हें ‘म्यूल अकाउंट’ कहा जाता है।
जांच में सामने आया कि कई खातों में अलग-अलग राज्यों से रकम आई और कुछ ही मिनटों में दूसरे खातों में ट्रांसफर कर दी गई। इस तरह की लेयरिंग से असली मास्टरमाइंड तक पहुंचना कठिन हो जाता है।
Certified Cyber Crime Investigator Course Launched by Centre for Police Technology
‘साइबर कमांडो’ और टेक्नोलॉजी की भूमिका
Cyber Command ने विशेष रूप से प्रशिक्षित ‘साइबर कमांडो’ तैनात किए हैं, जो डिजिटल फॉरेंसिक, डार्क वेब मॉनिटरिंग और क्रिप्टो ट्रांजैक्शन ट्रैकिंग में दक्ष हैं। अधिकारियों के मुताबिक साइबर अपराध अब पारंपरिक पुलिसिंग से कहीं अधिक तकनीकी चुनौती बन चुका है, इसलिए तकनीकी विशेषज्ञता अनिवार्य है।
इसके अलावा सरकारी विभागों और संवेदनशील संस्थानों में साइबर सुरक्षा ऑडिट भी तेज किए गए हैं, ताकि डेटा लीक और सिस्टम हैकिंग जैसी घटनाओं को शुरुआती चरण में ही रोका जा सके।
रिएक्टिव से प्रिवेंटिव मॉडल की ओर
अधिकारियों का मानना है कि पहले कार्रवाई शिकायत दर्ज होने के बाद शुरू होती थी। अब लक्ष्य है संभावित जोखिमों की पहले पहचान कर संदिग्ध रकम को तुरंत फ्रीज़ करना। बैंकिंग संस्थानों के साथ रियल-टाइम समन्वय से मनी ट्रेल को शुरुआती चरण में ही रोकने की कोशिश की जा रही है।
इस केंद्रीकृत और तकनीक-आधारित मॉडल ने जांच एजेंसियों को अलग-अलग जिलों में बिखरी शिकायतों को जोड़कर बड़े संगठित नेटवर्क का पर्दाफाश करने में मदद की है।
आगे की चुनौती
हालांकि ₹13 करोड़ की राशि फ्रीज़ करना और सैकड़ों खातों की पहचान बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि साइबर अपराधियों के तरीके लगातार बदल रहे हैं। निवेश घोटाले, डिजिटल अरेस्ट, फर्जी कस्टमर केयर कॉल और लोन ऐप ठगी जैसे नए मॉडल तेजी से सामने आ रहे हैं।
फिलहाल 8,788 शिकायतों को जोड़ने वाली यह कार्रवाई स्पष्ट संकेत देती है कि साइबर अपराध के खिलाफ कर्नाटक ने अब आक्रामक और तकनीक-आधारित रणनीति अपना ली है। आने वाले समय में यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है।
