सिंधु जल पर पाकिस्तान की ‘कोर्ट रणनीति’ फेल: भारत का सख्त संदेश, अंतरराष्ट्रीय आदेश ठुकराया

Team The420
5 Min Read

नई दिल्ली | सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तेज होती गतिविधियों के बीच भारत ने स्पष्ट और सख्त रुख अपनाते हुए एक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत के आदेश को मानने से इनकार कर दिया है। भारत ने दो-टूक कहा है कि जिस कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने यह निर्देश जारी किया है, उसकी वैधता और अधिकार-क्षेत्र को वह स्वीकार नहीं करता। सरकार का कहना है कि आतंकवाद की पृष्ठभूमि में संधि को अस्थायी रूप से निलंबित किया गया है, ऐसे में उसके तहत कोई बाध्यकारी दायित्व भारत पर लागू नहीं होता।

अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत ने भारत से अपने हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स—विशेष रूप से बगलिहार जलविद्युत परियोजना और किशनगंगा जलविद्युत परियोजना—से जुड़े ऑपरेशन रिकॉर्ड, लॉगबुक और अन्य तकनीकी दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा था। आदेश में 9 फरवरी 2026 तक अनुपालन या दस्तावेज न देने की स्थिति में औपचारिक स्पष्टीकरण देने का निर्देश भी शामिल था। भारत ने इस आदेश को असंवैधानिक और अवैध बताते हुए पूरी प्रक्रिया में भाग लेने से इंकार कर दिया है।

प्रक्रिया को बताया अवैध

सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत का रुख स्पष्ट है कि यह कथित अदालत वैधानिक रूप से गठित नहीं है और उसे सिंधु जल संधि के तहत कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। भारत का कहना है कि जब संधि की वैधता ही अस्थायी रूप से लंबित है, तब उसके आधार पर किसी भी प्रकार का निर्देश, दायित्व या अनुपालन स्वीकार नहीं किया जा सकता। नई दिल्ली ने यह भी रेखांकित किया है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया की वैधता उसके गठन और अधिकार-क्षेत्र से तय होती है, न कि एकतरफा दबाव से।

आतंकवाद बना निर्णायक आधार

भारत ने 23 अप्रैल 2025 को सिंधु जल संधि को अस्थायी रूप से निलंबित करने की घोषणा की थी। इसके पीछे तर्क दिया गया था कि पाकिस्तान की ओर से लगातार सीमा-पार आतंकवादी गतिविधियां संधि के मूल उद्देश्यों—भरोसा, सहयोग और शांति—को कमजोर कर रही हैं। सरकार का कहना है कि कोई भी दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय समझौता तभी टिकाऊ हो सकता है, जब दोनों पक्षों के बीच न्यूनतम भरोसा और स्थिरता मौजूद हो।

Certified Cyber Crime Investigator Course Launched by Centre for Police Technology

तकनीकी विवाद से आगे बढ़ा मामला

विश्लेषकों के मुताबिक, मौजूदा टकराव अब केवल जल-साझाकरण या हाइड्रोपावर परियोजनाओं के तकनीकी पहलुओं तक सीमित नहीं रहा है। यह विवाद भारत-पाकिस्तान संबंधों में सुरक्षा चिंताओं, कूटनीतिक तनाव और आपसी विश्वास के संकट का प्रतीक बन गया है। पाकिस्तान जहां इसे अंतरराष्ट्रीय कानून और संधि उल्लंघन के रूप में पेश कर रहा है, वहीं भारत का कहना है कि आतंकवाद के माहौल में किसी समझौते को एकतरफा ढंग से लागू नहीं किया जा सकता।

भारत का दो-टूक संदेश

भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसके हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स संधि के प्रावधानों के भीतर विकसित किए गए हैं और इनसे नदी के जल प्रवाह को स्थायी रूप से बाधित नहीं किया गया है। इसके बावजूद पाकिस्तान बार-बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाकर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। भारत का जवाब साफ है—अवैध प्रक्रिया और अधिकार-विहीन अदालत के सामने पेश होने का सवाल ही नहीं उठता।

वैश्विक प्रतिक्रिया पर नजर

पाकिस्तान ने इस विवाद को वैश्विक समुदाय के सामने उठाते हुए भारत से संधि के तहत दायित्व निभाने की मांग की है। भारत का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय साझेदारों को यह समझना चाहिए कि आतंकवाद और समझौतों का पालन साथ-साथ नहीं चल सकता। नई दिल्ली का संदेश स्पष्ट है कि शांति और भरोसा बहाल हुए बिना किसी भी संधि की पूर्ण बहाली संभव नहीं है।

कुल मिलाकर, सिंधु जल संधि को लेकर मौजूदा टकराव यह संकेत देता है कि भारत-पाकिस्तान संबंधों में पानी का मुद्दा अब कूटनीतिक और सुरक्षा विमर्श के केंद्र में आ चुका है। भारत ने साफ कर दिया है कि वह दबाव की राजनीति या अवैध अंतरराष्ट्रीय आदेशों के आगे झुकने वाला नहीं है, और किसी भी समाधान की बुनियाद शांति तथा आतंक-मुक्त माहौल ही होगी।

हमसे जुड़ें

Share This Article