AI नीति का नया दौर: सोशल मीडिया उम्र सीमा+डीपफेक बैन—युवा लत, असमानता पर सरकार अलर्ट।

सोशल मीडिया पर उम्र सीमा, डीपफेक पर सख्ती—AI दौर में नई नीति की तैयारी

Team The420
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तेज़ प्रसार के बीच सरकार और नीति-निर्माताओं के सामने दोहरी चुनौती उभर रही है—एक ओर तकनीक से आर्थिक विकास और उत्पादकता बढ़ाने का लक्ष्य, दूसरी ओर इसके सामाजिक और श्रम बाज़ार पर पड़ने वाले प्रभावों को संतुलित रखना। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंता नागेश्वरन ने चेतावनी दी है कि यदि बड़े पैमाने पर और तेज़ी से स्किलिंग नहीं की गई तो एआई आय और अवसरों की असमानता को बढ़ा सकता है।

इकोनॉमिक सर्वे में कहा गया है कि एआई उत्पादकता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी कर सकता है, लेकिन इसका लाभ मुख्यतः उच्च कौशल वाले कर्मचारियों को मिलेगा। इससे वेतन अंतर बढ़ने और कम कौशल वाले श्रमिकों के पीछे छूटने का जोखिम है। ऑटोमेशन के कारण एंट्री-लेवल और रूटीन नौकरियों की प्रकृति तेजी से बदल रही है, जिससे पारंपरिक कौशल वाले युवाओं के लिए रोजगार अवसर सीमित हो सकते हैं।

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जनसांख्यिकीय लाभांश पर जोखिम

भारत की बड़ी युवा आबादी को अब तक आर्थिक ताकत माना जाता रहा है, लेकिन सर्वे ने संकेत दिया कि यदि युवाओं को एआई और डिजिटल तकनीकों के अनुरूप प्रशिक्षित नहीं किया गया तो यही जनसांख्यिकीय लाभांश बोझ में बदल सकता है। नीति का फोकस अब केवल इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच बढ़ाने से आगे बढ़कर कौशल निर्माण, डिजिटल हाइजीन और व्यवहारिक स्वास्थ्य पर जा रहा है।

सरकार उद्योग और शिक्षण संस्थानों के साथ मिलकर री-स्किलिंग, अप-स्किलिंग और भविष्य की प्रतिभा तैयार करने के कार्यक्रमों को तेज़ करने पर जोर दे रही है। उद्देश्य यह है कि तकनीकी बदलाव के साथ श्रम बाज़ार भी अनुकूलित हो सके और एआई से उत्पन्न अवसरों का व्यापक लाभ मिल सके।

डिजिटल लत और उत्पादकता पर असर

सर्वे ने “डिजिटल एडिक्शन” को गंभीर सामाजिक और आर्थिक चिंता बताया है। अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग को नींद की कमी, पढ़ाई में गिरावट और कार्यस्थल पर कम उत्पादकता से जोड़ा गया है। 15–29 आयु वर्ग में इंटरनेट की लगभग सार्वभौमिक पहुंच के बाद अब चुनौती कनेक्टिविटी नहीं बल्कि उपयोग की गुणवत्ता और मानसिक स्वास्थ्य बन गई है।

युवा उपयोगकर्ताओं को बाध्यकारी उपयोग पैटर्न और हानिकारक कंटेंट के प्रति अधिक संवेदनशील माना गया है। इसी कारण नीति-निर्माता प्लेटफॉर्म डिज़ाइन में उम्र-उपयुक्त सुरक्षा उपाय, डिफॉल्ट प्राइवेसी सेटिंग और डिजिटल वेलबीइंग टूल्स को अनिवार्य करने पर विचार कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर उम्र-आधारित नियंत्रण पर चर्चा

केंद्र सरकार सोशल मीडिया कंपनियों के साथ आयु-आधारित एक्सेस कंट्रोल पर परामर्श कर रही है। कुछ राज्यों ने अंतरराष्ट्रीय मॉडल—विशेषकर 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया प्रतिबंध—का अध्ययन शुरू किया है। एक निजी विधेयक में अनिवार्य आयु सत्यापन और नाबालिग खातों को निष्क्रिय करने का प्रस्ताव रखा गया है, हालांकि यह अभी सरकारी नीति नहीं है।

समर्थकों का तर्क है कि अनियंत्रित उपयोग से लत, डेटा शोषण और हानिकारक कंटेंट का खतरा बढ़ता है। वहीं आलोचकों का कहना है कि तकनीकी रूप से आयु सत्यापन लागू करना कठिन हो सकता है और इससे बच्चे अनियमित प्लेटफॉर्म की ओर जा सकते हैं।

डीपफेक पर सख्त नियमों की तैयारी

डीपफेक को सामाजिक विश्वास, चुनावी पारदर्शिता और बाल सुरक्षा के लिए उभरते खतरे के रूप में देखा जा रहा है। सरकार मौजूदा डेटा सुरक्षा ढांचे से आगे जाकर अतिरिक्त कानूनी और तकनीकी उपायों पर विचार कर रही है, जिनमें प्लेटफॉर्म जवाबदेही, कंटेंट ट्रेसबिलिटी और त्वरित हटाने की व्यवस्था शामिल हो सकती है।

विकास और सुरक्षा के बीच संतुलन

भारत दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट और सोशल मीडिया बाजारों में से एक है, जहां लिए गए नीति निर्णय डिजिटल अर्थव्यवस्था, शिक्षा प्रणाली और श्रम बाज़ार पर दीर्घकालिक प्रभाव डालेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा सुधार, उद्योग भागीदारी और नियामकीय ढांचे के समन्वित प्रयास के बिना एआई के लाभ असमान रूप से बंट सकते हैं, भले ही तकनीक कुल आर्थिक वृद्धि को गति दे।

सरकार का जोर इस बात पर है कि एआई से नवाचार और रोजगार के नए अवसर पैदा हों, लेकिन इसके साथ ही सामाजिक जोखिम—विशेषकर युवाओं की सुरक्षा, डिजिटल स्वास्थ्य और आय असमानता—को नियंत्रित रखा जाए। यही संतुलन आने वाले वर्षों में भारत की डिजिटल नीति की दिशा तय करेगा।

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