18 साल बाद भारत–EU FTA पर बड़ा मोड़, 27 जनवरी को ऐलान संभव

Team The420
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नई दिल्ली | भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच लगभग 18 वर्षों से लंबित मुक्त व्यापार समझौता (FTA) अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। सरकारी और कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, 27 जनवरी को प्रस्तावित भारत–EU शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों पक्ष व्यापार वार्ता के निष्कर्ष की औपचारिक घोषणा कर सकते हैं। यदि यह घोषणा होती है, तो इसे भारत के अब तक के सबसे व्यापक और रणनीतिक व्यापार समझौतों में से एक माना जाएगा।

सूत्रों के मुताबिक, इस शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय संघ के शीर्ष नेतृत्व के बीच उच्चस्तरीय बैठक होगी, जिसमें व्यापार, निवेश और दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोग से जुड़ी संयुक्त घोषणा संभव है।

EU नेतृत्व की मौजूदगी में संभावित ऐलान

शिखर सम्मेलन में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंतोनियो कोस्टा के शामिल होने की संभावना है। अधिकारियों के अनुसार, प्रस्तावित FTA का उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार को सरल बनाना, बाजार तक पहुंच बढ़ाना और आयात शुल्क में चरणबद्ध कटौती करना है।

दो दशकों की बातचीत, अब अंतिम चरण में

भारत और EU के बीच व्यापक मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत की शुरुआत लगभग 18 साल पहले हुई थी। हालांकि, शुल्क संरचना, कृषि उत्पाद, सेवाओं के बाजार, डेटा सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों जैसे मुद्दों पर मतभेदों के चलते यह प्रक्रिया लंबे समय तक अटकी रही।

हाल के वर्षों में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बदलाव, भू-राजनीतिक तनाव और व्यापार के विविधीकरण की जरूरत के चलते इन वार्ताओं को नई गति मिली।
वित्त वर्ष 2024–25 में भारत–EU का द्विपक्षीय व्यापार करीब 136.5 अरब डॉलर रहा, जिससे यूरोपीय संघ भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में बना हुआ है।

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किन क्षेत्रों को मिल सकता है लाभ

सूत्रों के अनुसार, समझौते के तहत यूरोपीय ऑटोमोबाइल, वाइन और स्पिरिट्स पर आयात शुल्क में चरणबद्ध कटौती का प्रावधान हो सकता है। इसके बदले भारत को कपड़ा, रसायन, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और इंजीनियरिंग उत्पादों के निर्यात में बेहतर बाजार पहुंच मिलने की उम्मीद है।

हालांकि, कृषि उत्पादों और EU के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसे नियामकीय मुद्दे अब भी बातचीत के सबसे संवेदनशील पहलू बने हुए हैं। भारतीय निर्यातकों को आशंका है कि कड़े पर्यावरणीय मानक उनकी लागत बढ़ा सकते हैं।

रणनीतिक साझेदारी का व्यापक संकेत

विशेषज्ञों के अनुसार, यह समझौता केवल व्यापारिक लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत–EU संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के नए स्तर पर ले जा सकता है। वैश्विक स्तर पर किसी एक बाजार पर निर्भरता कम करने और सप्लाई चेन को मजबूत करने के प्रयासों के बीच यह डील दोनों पक्षों के लिए अहम मानी जा रही है।

शिखर सम्मेलन से पहले विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने EU राजनयिकों के साथ बातचीत में व्यापार से आगे बढ़कर आर्थिक स्थिरता, तकनीकी सहयोग और वैश्विक जोखिम कम करने पर जोर दिया था।

घोषणा के बाद भी प्रक्रिया लंबी

हालांकि 27 जनवरी को राजनीतिक स्तर पर घोषणा की संभावना जताई जा रही है, लेकिन समझौते के पूरी तरह लागू होने में समय लग सकता है। इसे यूरोपीय संसद और EU के सदस्य देशों की घरेलू कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना होगा, जिसमें लगभग एक वर्ष तक का समय लग सकता है।

इस बीच, EU द्वारा सामान्यीकृत वरीयता प्रणाली (GSP) के तहत भारत को मिलने वाले कुछ निर्यात लाभों के निलंबन से भारतीय उद्योग पहले से दबाव में है। निर्यातकों का कहना है कि यदि FTA जल्द लागू नहीं हुआ, तो प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है।

आगे की राह

27 जनवरी के शिखर सम्मेलन से पहले दोनों पक्षों के अधिकारी समझौते के मसौदे को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। उद्योग जगत और निवेशकों की नजर इस बात पर टिकी है कि यह समझौता कितनी जल्दी जमीन पर उतरता है और क्या यह भारत–यूरोप आर्थिक संबंधों में नए दौर की शुरुआत कर पाता है।

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