रांची | झारखंड के निलंबित आईएएस अधिकारी विनय कुमार चौबे के खिलाफ चल रही भ्रष्टाचार जांच लगातार नए और गंभीर मोड़ ले रही है। बहुचर्चित शराब घोटाले और आय से अधिक संपत्ति (Disproportionate Assets) मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने अब जांच का दायरा उनके परिवार और नजदीकी रिश्तेदारों तक बढ़ा दिया है। इसी कड़ी में रांची के अशोक नगर इलाके में उनकी सरहज द्वारा संचालित एक होमियोपैथिक क्लिनिक पर छापेमारी की गई, जिसने कथित काले धन की मनी-ट्रेल को लेकर अहम संकेत दिए हैं।
जांच एजेंसियों को संदेह है कि भ्रष्टाचार से अर्जित रकम को सीधे अपने नाम पर रखने के बजाय रिश्तेदारों के बैंक खातों, व्यवसायों और अचल संपत्तियों के जरिए योजनाबद्ध ढंग से निवेश कर खपाया गया। ACB के अनुसार, यह कार्रवाई अवैध धन के स्रोत, उसके प्रवाह और अंतिम उपयोग की कड़ियों को जोड़ने की रणनीति का हिस्सा है।
छापेमारी के दौरान ACB की टीमों ने बैंक पासबुक, संदिग्ध लेन-देन से जुड़े दस्तावेज, डिजिटल उपकरण और क्लिनिक की वित्तीय गतिविधियों से संबंधित कई अहम फाइलें जब्त की हैं। इन सभी को फॉरेंसिक और वित्तीय विश्लेषण के लिए भेजा गया है। एजेंसी यह भी जांच कर रही है कि यह क्लिनिक केवल चिकित्सा सेवाओं तक सीमित था या फिर इसे शेल-स्ट्रक्चर और बेनामी निवेश के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था।
सत्ता के गलियारों से कटघरे तक
1999 बैच के आईएएस अधिकारी विनय कुमार चौबे कभी झारखंड की नौकरशाही के सबसे प्रभावशाली अफसरों में गिने जाते थे। उन्होंने राज्य सरकार में कई अहम विभागों की जिम्मेदारी संभाली और लंबे समय तक मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के करीबी प्रशासनिक सहयोगी माने जाते थे। नौकरशाही और राजनीतिक हलकों में उनकी मजबूत पकड़ के कारण उन्हें अनौपचारिक रूप से ‘सुपर सीएम’ भी कहा जाने लगा।
लेकिन वर्ष 2022 में लागू की गई आबकारी नीति को लेकर उठे सवालों ने उनके करियर की दिशा बदल दी। शुरुआती जांच में नीति से जुड़ी अनियमितताओं की बात सामने आई, लेकिन धीरे-धीरे यह मामला एक आपराधिक जांच में बदल गया। इसके बाद चौबे की गिरफ्तारी हुई और उन्हें निलंबित कर दिया गया। ACB का आरोप है कि आबकारी नीति में जानबूझकर ऐसे बदलाव किए गए, जिनसे एक अंतरराज्यीय शराब सिंडिकेट को फायदा पहुंचा और राज्य के राजस्व को भारी नुकसान हुआ।
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तीन बड़े आरोपों पर टिकी जांच
जांच एजेंसियों के अनुसार, विनय कुमार चौबे के खिलाफ मामला मुख्य रूप से तीन गंभीर आरोपों पर आधारित है।
पहला, शराब घोटाला। आरोप है कि वर्ष 2022 की आबकारी नीति में किए गए संशोधनों से अंतरराज्यीय शराब नेटवर्क को अनुचित लाभ मिला, जिससे झारखंड सरकार को लगभग ₹129 करोड़ के राजस्व नुकसान का अनुमान है।
दूसरा, जमीन घोटाला। यह मामला हजारीबाग में उनकी पदस्थापना से जुड़ा है, जहां उन पर सरकारी और वन भूमि को फर्जी या हेरफेर किए गए दस्तावेजों के जरिए निजी हाथों में सौंपने में भूमिका निभाने का आरोप है।
तीसरा, आय से अधिक संपत्ति का मामला। ACB की जांच में सामने आया है कि चौबे और उनके परिजनों के पास मौजूद चल-अचल संपत्ति उनकी ज्ञात आय से करीब 53 प्रतिशत अधिक है। जहां उनकी वैध आय लगभग ₹2.20 करोड़ आंकी गई है, वहीं कुल लेन-देन और निवेश ₹3.47 करोड़ से अधिक पाए गए हैं।
रिश्तेदारों की भूमिका जांच के केंद्र में
ACB अधिकारियों का कहना है कि इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू रिश्तेदारों की भूमिका है। सास-ससुर, साले-सालियां, सरहज और अन्य नजदीकी लोगों के खातों व व्यवसायों के जरिए कथित अवैध धन को घुमाने का संदेह है। सरहज के क्लिनिक पर की गई हालिया छापेमारी को इसी संदिग्ध मनी-ट्रेल को स्थापित करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
अधिकारियों के अनुसार, यदि जब्त दस्तावेजों से धन के प्रवाह की कड़ियां स्पष्ट रूप से जुड़ती हैं, तो और लोगों से पूछताछ तथा कानूनी कार्रवाई का दायरा बढ़ सकता है।
अंतरराज्यीय कनेक्शन और आगे की कार्रवाई
यह जांच अब केवल झारखंड तक सीमित नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, राज्य की आबकारी नीति में अन्य राज्यों के मॉडलों से समानताएं सामने आई हैं। जांच के दौरान छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु से जुड़े परामर्श, सप्लाई-चेन और वित्तीय लेन-देन के लिंक भी सामने आए हैं। एजेंसियों को आशंका है कि घोटाले से जुड़ी बड़ी रकम शेल कंपनियों के जरिए अन्य राज्यों के रियल एस्टेट और व्यावसायिक प्रोजेक्ट्स में निवेश की गई।
निलंबित आईएएस अधिकारी फिलहाल रांची स्थित बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल में न्यायिक हिरासत में हैं। हालांकि एक मामले में उन्हें डिफॉल्ट जमानत मिल चुकी है, लेकिन जमीन घोटाला और आय से अधिक संपत्ति से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया जारी है। ACB और अन्य एजेंसियां अब जब्त दस्तावेजों की गहन समीक्षा कर रही हैं और आने वाले दिनों में पूछताछ व कार्रवाई की रफ्तार तेज होने की संभावना जताई जा रही है।
