फर्जी साइबर क्राइम अधिकारी बनकर वसूली करने वाला गिरफ्तार, 44 मामलों से जुड़ा नेटवर्क उजागर

Team The420
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हैदराबाद | साइबर क्राइम पुलिस अधिकारी बनकर लोगों को डराने-धमकाने और डिजिटल भुगतान के ज़रिये पैसे वसूलने वाले एक संगठित साइबर उगाही गिरोह का भंडाफोड़ करते हुए पुलिस ने 27 वर्षीय बाइक-टैक्सी चालक जे साई राम रेड्डी को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार आरोपी का संबंध तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में दर्ज कम से कम 44 साइबर ठगी मामलों से पाया गया है।

यह गिरफ्तारी एस.आर. नगर पुलिस स्टेशन की टीम ने राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर दर्ज एक शिकायत के आधार पर की। जांच अधिकारियों का कहना है कि यह मामला उस बढ़ते चलन को उजागर करता है, जिसमें तकनीकी हैकिंग के बजाय फर्जी पहचान, डर और मानसिक दबाव के ज़रिये लोगों को ठगा जा रहा है।

पुलिस के मुताबिक, करिमनगर का रहने वाला जे साई राम रेड्डी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर महिलाओं के फर्जी प्रोफाइल बनाकर लोगों से दोस्ती करता था। बातचीत के दौरान वह धीरे-धीरे विश्वास जीत लेता और फिर पीड़ितों से उनका मोबाइल नंबर हासिल कर लेता था। इसके बाद वह फोन कॉल कर खुद को साइबर क्राइम पुलिस अधिकारी बताता था।

इन कॉल्स के दौरान आरोपी पीड़ितों पर अश्लील ऑनलाइन गतिविधियों या अवैध डिजिटल कृत्यों में शामिल होने का आरोप लगाता और गिरफ्तारी, केस दर्ज होने या बैंक अकाउंट फ्रीज करने की धमकी देता था। डर और सामाजिक बदनामी के भय में आकर कई पीड़ितों ने इसे “सरकारी जुर्माना” समझते हुए UPI और अन्य डिजिटल पेमेंट माध्यमों से पैसे ट्रांसफर कर दिए।

जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी भुगतान के बाद पीड़ितों को अपने मोबाइल फोन रीसेट करने के लिए कहता था। वह दावा करता था कि ऐसा करने से “केस बंद” हो जाएगा या साइबर वेरिफिकेशन पूरा हो जाएगा। पुलिस का मानना है कि यह कदम डिजिटल सबूत मिटाने और चैट व कॉल रिकॉर्ड नष्ट करने के उद्देश्य से उठाया जाता था।

छात्र से करीब ₹97,000 की ठगी से खुला मामला

गिरफ्तारी तक पहुंचाने वाले प्रमुख मामलों में से एक में, एक छात्र से करीब ₹97,000 की ठगी की गई थी। पीड़ित ने बाद में राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई और लेन-देन से जुड़े विवरण साझा किए। डिजिटल ट्रेल और तकनीकी विश्लेषण के आधार पर पुलिस आरोपी तक पहुंचने में सफल रही।

पूछताछ के दौरान जे साई राम रेड्डी ने कथित तौर पर कबूल किया कि वह कई मोबाइल फोन, सिम कार्ड और बैंक खातों का इस्तेमाल कर इसी तरह की ठगी करता रहा है। जांच में यह भी पता चला कि वह अनजान दुकानदारों के बैंक खातों का दुरुपयोग कर ठगी की रकम घुमाता था, ताकि मनी ट्रेल को जटिल बनाया जा सके और पहचान में देरी हो।

पुलिस के अनुसार आरोपी आदतन अपराधी है, जो बार-बार मोबाइल नंबर और भुगतान हैंडल बदलकर निगरानी से बचने की कोशिश करता था। अत्याधुनिक तकनीकी कौशल न होने के बावजूद वह फर्जी पहचान और भय की रणनीति से लोगों की साइबर कानूनों के बारे में सीमित जानकारी का फायदा उठाता था।

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बढ़ रही है फर्जी अधिकारी बनकर ठगी की घटनाएं

जांच अधिकारियों ने कहा कि यह मामला इम्पर्सोनेशन-आधारित साइबर फ्रॉड में तेजी से हो रही बढ़ोतरी को दर्शाता है, जिसमें अपराधी खुद को पुलिस, बैंक अधिकारी या सरकारी प्रतिनिधि बताकर पैसे ऐंठते हैं। ऐसे मामलों में पीड़ित घबराकर बिना सत्यापन के जल्दबाज़ी में कदम उठा लेते हैं।

पुलिस ने दोहराया कि कोई भी कानून प्रवर्तन एजेंसी फोन कॉल, मैसेजिंग ऐप या डिजिटल प्लेटफॉर्म के ज़रिये पैसे की मांग नहीं करती, और कानून में “डिजिटल गिरफ्तारी” जैसी कोई अवधारणा नहीं है। इस तरह की किसी भी मांग को साफ़ तौर पर धोखाधड़ी माना जाना चाहिए।

नागरिकों को सलाह दी गई है कि संदिग्ध कॉल आने पर तुरंत कॉल काटें, कॉल लॉग और भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड सुरक्षित रखें और नज़दीकी पुलिस स्टेशन या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएं। अधिकारियों का कहना है कि समय पर रिपोर्टिंग से आरोपियों तक पहुंचने और रकम फ्रीज कराने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

पुलिस अब अन्य पीड़ितों की पहचान और ठगी की रकम की बरामदगी की दिशा में जांच आगे बढ़ा रही है। यह भी पता लगाया जा रहा है कि क्या किसी अन्य व्यक्ति ने आरोपी को सिम कार्ड या बैंक खातों की सुविधा देकर मदद की।

अधिकारियों ने कहा कि यह गिरफ्तारी एक अहम चेतावनी है कि आज के दौर में साइबर ठगी अक्सर तकनीक से ज़्यादा डर और भ्रम पर आधारित होती है — और डिजिटल भुगतान के बढ़ते इस्तेमाल के बीच जागरूकता ही सबसे मजबूत बचाव है।

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