मुंबई में ‘डिजिटल अरेस्ट’ का भयावह जाल, बुज़ुर्ग से ₹4.38 करोड़ की ठगी और मनी लॉन्ड्रिंग का खुलासा

Team The420
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मुंबई | मुंबई में सामने आया एक सनसनीखेज साइबर अपराध यह दिखाता है कि आधुनिक ठगी अब केवल तकनीक पर नहीं, बल्कि डर और मानसिक दबाव पर टिकी है। इस मामले में 80 वर्षीय एक सेवानिवृत्त शिक्षाविद से करीब ₹4.38 करोड़ की ठगी की गई। लेकिन जांच के दौरान उनके बैंक खाते में अचानक ₹1.02 करोड़ जमा होने से मामला और गंभीर हो गया—यह रकम इस बात का संकेत थी कि पीड़ित का खाता खुद एक अवैध मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क का हिस्सा बना दिया गया था।

पीड़ित, जिन्होंने अपना पूरा जीवन शिक्षा के क्षेत्र में बिताया, 18 नवंबर 2025 को एक फोन कॉल के साथ इस जाल में फंस गए। कॉल करने वाले ने खुद को एक कथित साइबर सुरक्षा संस्था से जुड़ा बताया और कहा कि उनके आधार कार्ड का दुरुपयोग कर एक मोबाइल नंबर जारी किया गया है, जिस पर पुलिस शिकायत दर्ज है।

इसके बाद डर का सिलसिला शुरू हुआ। अलग-अलग नंबरों से लगातार कॉल आने लगे—कभी खुद को पुलिस अधिकारी बताया गया, कभी अपराध शाखा से जुड़ा बताया गया और कभी केंद्रीय एजेंसी का नाम लिया गया। हर कॉल में यही कहा गया कि पीड़ित के दस्तावेज मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकी फंडिंग से जुड़े मामलों में इस्तेमाल हुए हैं और उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी होने वाला है।

डर को और पुख्ता करने के लिए ठगों ने व्हाट्सएप पर फर्जी एफआईआर, नकली आरबीआई पत्र, प्रवर्तन एजेंसियों के नोटिस और सुप्रीम कोर्ट के जाली आदेश भेजे। इन दस्तावेजों में सरकारी भाषा, मुहरों और कानूनी शब्दों का इस्तेमाल कर ऐसा माहौल बनाया गया कि पीड़ित पूरी तरह मानसिक दबाव में आ गया।

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इसके बाद पीड़ित को वीडियो कॉल पर जोड़ा गया और बताया गया कि वह “डिजिटल अरेस्ट” में है। उसे सख्त निर्देश दिए गए कि राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए वह किसी को भी इस बारे में न बताए। उसे भरोसा दिलाया गया कि यदि वह जांच में सहयोग करेगा, तो उसे निर्दोष साबित कर दिया जाएगा।

26 नवंबर 2025 से 9 जनवरी 2026 के बीच, इसी भय और दबाव में पीड़ित ने कई बार अलग-अलग बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर किए। इस दौरान कुल ₹4.38 करोड़ उसके खातों से निकलवा लिए गए। पीड़ित को लगता रहा कि वह किसी आधिकारिक सत्यापन प्रक्रिया का हिस्सा है।

मामले में निर्णायक मोड़ तब आया, जब कुछ समय बाद पीड़ित के खाते में ₹1.02 करोड़ जमा हो गए। शुरुआती राहत जल्द ही चिंता में बदल गई। जांच में सामने आया कि यह पैसा पीड़ित का नहीं था, बल्कि अन्य साइबर ठगी मामलों से जुड़ा था। बुज़ुर्ग का बैंक खाता अवैध रकम को इधर-उधर घुमाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था।

इस खुलासे से स्पष्ट हुआ कि यह सिर्फ एक ठगी नहीं, बल्कि एक संगठित साइबर मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क का मामला है। पीड़ित को अनजाने में इस नेटवर्क का हिस्सा बना दिया गया, जहां उसके खाते का इस्तेमाल अवैध धन छिपाने और ट्रांसफर करने के लिए किया गया।

साइबर विशेषज्ञों के अनुसार, “डिजिटल अरेस्ट” जैसा कोई कानूनी प्रावधान अस्तित्व में नहीं है, लेकिन ठग जानबूझकर ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं क्योंकि ये बुज़ुर्गों और आम नागरिकों में तत्काल भय पैदा करते हैं। नकली दस्तावेज और वीडियो कॉल इस डर को वास्तविक रूप दे देते हैं।

यह मामला एक गंभीर चेतावनी है कि साइबर अपराध अब केवल तकनीकी धोखाधड़ी नहीं रह गया है, बल्कि यह एक मनोवैज्ञानिक जाल बन चुका है—जहां पीड़ित न केवल अपनी पूंजी खोता है, बल्कि उसका बैंक खाता भी अपराध का औज़ार बना दिया जाता है, वह भी उसकी जानकारी के बिना। जांच एजेंसियां अब इस नेटवर्क से जुड़े खातों, लेन-देन और डिजिटल साक्ष्यों की गहन जांच कर रही हैं।

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