DGCA जांच में खुली इंडिगो की खामियां, उड़ान संकट पर शीर्ष स्तर की जवाबदेही तय

Team The420
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नई दिल्ली | दिसंबर 2025 में देशभर में हुए बड़े पैमाने पर फ्लाइट रद्दीकरण और यात्रियों की भारी परेशानी के मामले में केंद्र सरकार और विमानन नियामक ने कड़ा रुख अपनाया है। सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया कि नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) की जांच के आधार पर देश की सबसे बड़ी एयरलाइन IndiGo को अपने एक सीनियर वाइस प्रेसिडेंट को सेवा से हटाने के निर्देश दिए गए हैं। यह कार्रवाई उड़ान संचालन में गंभीर चूकों और नियामकीय उल्लंघनों के चलते की गई है।

यह जानकारी उस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दी गई, जिसमें दिसंबर में हुई फ्लाइट कैंसलेशन अव्यवस्था, यात्रियों को मुआवजा और बेहतर ग्राउंड सपोर्ट की मांग की गई है। सरकार ने अदालत को अवगत कराया कि यह मामला केवल परिचालन विफलता का नहीं, बल्कि प्रबंधन स्तर पर जवाबदेही तय करने का है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब इंडिगो ने अपने तिमाही नतीजों में मुनाफे में 75 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की है। कंपनी ने बताया कि दिसंबर में बड़े पैमाने पर उड़ानें रद्द होने के कारण उसे करीब 6.3 करोड़ डॉलर का वित्तीय झटका लगा। यह संकट हाल के वर्षों में भारतीय विमानन क्षेत्र के सबसे गंभीर परिचालन व्यवधानों में से एक माना जा रहा है।

नागर विमानन महानिदेशालय Directorate General of Civil Aviation (DGCA) ने अदालत को बताया कि चार सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया कि संकट की जड़ में परिचालन का अत्यधिक ‘ओवर-ऑप्टिमाइजेशन’, नियामकीय तैयारी की कमी, सिस्टम सॉफ्टवेयर सपोर्ट में खामियां और प्रबंधन ढांचे की कमजोरियां रहीं। इन गंभीर चूकों को देखते हुए एयरलाइन पर ₹22.2 करोड़ का जुर्माना लगाया गया है।

इसके अलावा, DGCA ने इंडिगो को ₹50 करोड़ की बैंक गारंटी जमा करने के निर्देश दिए हैं। यह राशि तब वापस की जाएगी, जब एयरलाइन अपने संचालन में आवश्यक सुधार लागू कर देगी और नियामक की संतुष्टि हासिल करेगी। नियामक ने यह भी स्पष्ट किया कि सुधारात्मक कदमों की प्रगति की नियमित निगरानी की जाएगी।

DGCA की जांच में क्या सामने आया

DGCA की जांच में पाया गया कि एयरलाइन ने नियमों का कम से कम छह मामलों में उल्लंघन किया। रिपोर्ट के अनुसार, 3 से 5 दिसंबर 2025 के बीच 2,507 उड़ानें रद्द की गईं और 1,852 उड़ानों में देरी हुई। इस अव्यवस्था के कारण देशभर के विभिन्न हवाई अड्डों पर तीन लाख से अधिक यात्री फंस गए, जिन्हें घंटों तक जानकारी और सहायता का इंतजार करना पड़ा।

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जांच समिति ने यह भी पाया कि एयरलाइन प्रबंधन संशोधित फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (FDTL) नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करने में विफल रहा। रिपोर्ट में कहा गया कि क्रू, विमान और नेटवर्क संसाधनों के अधिकतम उपयोग पर अत्यधिक जोर दिया गया, जिससे रोस्टर में बफर मार्जिन लगभग समाप्त हो गया। नतीजतन, पायलटों और अन्य स्टाफ के लिए ड्यूटी घंटे बढ़ गए और रिकवरी टाइम न्यूनतम रह गया, जिससे परिचालन जोखिम बढ़ा।

समिति ने सिस्टम प्लानिंग और समय पर तकनीकी बदलाव लागू करने में भी गंभीर कमियों की ओर इशारा किया। इन निष्कर्षों के आधार पर DGCA ने न केवल सीनियर वाइस प्रेसिडेंट को हटाने के निर्देश दिए, बल्कि कई वरिष्ठ अधिकारियों को औपचारिक चेतावनी भी जारी की। एयरलाइन को यह भी कहा गया है कि वह आंतरिक जांच के जरिए अन्य जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान करे और उनके खिलाफ की गई कार्रवाई की रिपोर्ट नियामक को सौंपे।

हाईकोर्ट में अगली सुनवाई

यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित जनहित याचिका से जुड़ा है। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 25 फरवरी को तय की है। याचिका में न्यायिक जांच, यात्रियों के लिए मुआवजा तंत्र और भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए ठोस दिशानिर्देश तय करने की मांग की गई है।

सरकारी पक्ष ने अदालत में दोहराया कि विमानन सुरक्षा और यात्री हित सर्वोपरि हैं और किसी भी स्तर पर नियमों के उल्लंघन को स्वीकार नहीं किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला देश के तेजी से बढ़ते विमानन क्षेत्र में परिचालन अनुशासन, नियामकीय निगरानी और शीर्ष प्रबंधन की जवाबदेही को लेकर एक अहम नजीर बन सकता है।

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