एजेंट की पहचान का दुरुपयोग कर वर्षों तक चला धोखा; आरोपी गिरफ्तार, सट्टे की लत से जुड़ा सामने आया कारण

फर्जी डाकघर पासबुक घोटाला: आकर्षक ब्याज का झांसा देकर ₹9 करोड़ की ठगी, 30 निवेशक बने शिकार

Roopa
By Roopa
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नई दिल्ली: राजधानी के रूप नगर इलाके में डाकघर बचत योजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर निवेश घोटाले का खुलासा हुआ है, जहां फर्जी पासबुक तैयार कर करीब ₹9 करोड़ की ठगी की गई। पुलिस ने इस मामले में 48 वर्षीय आशीष सिंघल को गिरफ्तार किया है, जिसने कथित तौर पर स्थानीय निवेशकों को उच्च ब्याज का लालच देकर रकम जमा कराई और नकली दस्तावेज थमा दिए।

जांच के मुताबिक जनवरी महीने में इस धोखाधड़ी से जुड़े तीन अलग-अलग मामले दर्ज किए गए, जिनमें अब तक 30 पीड़ित सामने आए हैं। आशंका है कि पीड़ितों की संख्या और बढ़ सकती है क्योंकि कई निवेशक अभी भी सामने आने से हिचक रहे हैं। पुलिस वित्तीय लेनदेन और दस्तावेजों की विस्तृत जांच कर रही है।

आरोपी का डाकघर से जुड़ाव उसकी मां के माध्यम से था, जो पिछले लगभग 40 वर्षों से रूप नगर स्थित डाकघर में बचत योजनाओं की अधिकृत एजेंट रही हैं। इलाके में उनकी विश्वसनीयता के कारण बड़ी संख्या में स्थानीय कारोबारी, छोटे दुकानदार और घरेलू कामगार महिलाएं उनके जरिए निवेश करती रही थीं। वर्ष 2018 में मां की तबीयत खराब होने के बाद आशीष ने एजेंसी का काम संभाल लिया और इसी भरोसे का फायदा उठाकर ठगी का जाल बिछाया।

पुलिस के अनुसार आरोपी निवेशकों को परिपक्व हो चुकी योजनाओं में दोबारा निवेश कराने का झांसा देता था और नकली पासबुक तथा रसीदें जारी करता था। कई मामलों में उसने यह दावा किया कि डाकघर विशेष योजना के तहत बाजार से अधिक ब्याज दे रहा है। निवेशकों को नियमित एंट्री वाली पासबुक दिखाई जाती थी, जिससे उन्हें लंबे समय तक धोखाधड़ी का संदेह नहीं हुआ।

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जांच में सामने आया है कि आरोपी ने प्राप्त रकम का बड़ा हिस्सा सट्टेबाजी में गंवा दिया। आर्थिक संकट और व्यक्तिगत समस्याओं के कारण उसने लगातार नए निवेशकों से पैसे लेकर पुराने निवेशकों को भुगतान करने की कोशिश की, जिससे एक प्रकार की चिट फंड जैसी स्थिति बन गई। जब भुगतान रुक गया तो निवेशकों को ठगी का पता चला और उन्होंने शिकायत दर्ज कराई।

पुलिस बैंक खातों, नकदी प्रवाह और संभावित सह-आरोपियों की भूमिका की जांच कर रही है। यह भी देखा जा रहा है कि क्या किसी आधिकारिक दस्तावेज या पहचान का दुरुपयोग कर निवेशकों को भ्रमित किया गया। डाकघर विभाग से भी रिकॉर्ड मंगाकर वास्तविक निवेश और फर्जी प्रविष्टियों का मिलान किया जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामलों में संस्थागत भरोसे का दुरुपयोग सबसे बड़ा कारक होता है। अधिकृत एजेंट से जुड़े होने का दावा, सरकारी योजना का नाम और ऊंचे ब्याज का वादा निवेशकों को बिना सत्यापन के रकम देने के लिए प्रेरित करता है। वित्तीय साक्षरता की कमी और दस्तावेजों की स्वतंत्र पुष्टि न करना भी ऐसे घोटालों को बढ़ावा देता है।

जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि कुल कितनी राशि वसूली जा सकती है और पीड़ितों को आंशिक राहत दिलाने की क्या संभावनाएं हैं। फिलहाल आरोपी से पूछताछ जारी है और पुलिस अन्य संभावित शिकायतकर्ताओं से आगे आने की अपील कर रही है।

यह मामला सरकारी बचत योजनाओं के नाम पर हो रही धोखाधड़ी के बढ़ते खतरे को उजागर करता है और निवेश से पहले आधिकारिक रसीद, ऑनलाइन एंट्री और सीधे विभागीय पुष्टि की आवश्यकता पर जोर देता है।

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