नई दिल्ली | देश में बढ़ते साइबर अपराधों पर रोक लगाने के लिए सरकार और कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा उठाए गए कदमों के बावजूद ठगी के शिकार लोगों को वास्तविक राहत अब भी बेहद सीमित बनी हुई है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, अप्रैल 2021 से नवंबर 2025 के बीच साइबर अपराधियों तक पहुँचने से ₹7,647 करोड़ की राशि रोकी गई, लेकिन इसी अवधि में ऑनलाइन फ्रॉड में लुटी कुल ₹52,969 करोड़ की रकम में से महज ₹167 करोड़—यानी लगभग 2.18 प्रतिशत—ही पीड़ितों को वापस मिल सकी।
ये आंकड़े ऐसे समय सामने आए हैं, जब केंद्र सरकार ने साइबर ठगी से निपटने के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों और बैंकों के लिए एक नया और सख्त स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) जारी किया है। इस एसओपी का उद्देश्य एक ओर अपराधियों के खिलाफ त्वरित और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करना है, तो दूसरी ओर गलत या अधूरी जानकारी के आधार पर निर्दोष नागरिकों और कारोबारियों के बैंक खाते फ्रीज होने से रोकना है।
सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि बीते साढ़े चार वर्षों में बड़ी मात्रा में ठगी की रकम को अपराधियों तक पहुँचने से पहले ब्लॉक कर लिया गया, लेकिन कानूनी प्रक्रियाओं, बहु-स्तरीय ट्रांजैक्शन चेन और समय की देरी के कारण उस धन की वास्तविक रिकवरी और वापसी बेहद सीमित रही। यही वजह है कि सरकार अब रिकवरी प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाने पर जोर दे रही है।
सत्यापित शिकायतों पर ही वित्तीय कार्रवाई
नई गाइडलाइंस में स्पष्ट किया गया है कि केवल वास्तविक और सत्यापित शिकायतों के आधार पर ही वित्तीय हस्तक्षेप किया जाए। सरकार का मानना है कि कई मामलों में संदिग्ध लेनदेन की पूरी कड़ी स्थापित किए बिना ही खातों को फ्रीज कर दिया जाता है, जिससे निर्दोष खाताधारकों को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
ऐसे मामलों में वेतन निकासी, कारोबार संचालन और आवश्यक भुगतान प्रभावित होते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए एसओपी में यह निर्देश दिया गया है कि “पुट-ऑन-होल्ड”, डिजिटल बैंकिंग सेवाओं का निलंबन और खातों की जब्ती जैसे कदम जांच-आधारित, अनुपातिक और जवाबदेही के साथ उठाए जाएं।
बैंक और पोर्टल का रियल-टाइम इंटीग्रेशन
साइबर फ्रॉड पर त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिए बैंकों को नेशनल साइबरक्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल से एपीआई के माध्यम से जोड़ने की योजना बनाई गई है। इससे संदिग्ध रकम पर तुरंत “पुट-ऑन-होल्ड” लगाया जा सकेगा और पुलिस, बैंक तथा अन्य वित्तीय संस्थानों के बीच समन्वय बेहतर होगा।
अधिकारियों के अनुसार, कई मामलों में कुछ ही मिनटों के भीतर ठगी की राशि कई खातों में स्थानांतरित कर दी जाती है, जिससे रिकवरी लगभग असंभव हो जाती है। नई व्यवस्था का उद्देश्य इस ट्रांजैक्शन चेन को शुरुआती स्तर पर ही तोड़ना है।
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गलत फ्रीजिंग पर समयबद्ध राहत का प्रावधान
नई एसओपी में उन खाताधारकों के लिए भी स्पष्ट शिकायत निवारण तंत्र तय किया गया है, जिनका दावा है कि उनका खाता बिना ठोस आधार के फ्रीज किया गया। ऐसे मामलों में बैंक के माध्यम से शिकायत दर्ज कराई जा सकेगी और जांच अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए भी सत्यापन कर सकेंगे, ताकि नागरिकों को बार-बार थानों के चक्कर न लगाने पड़ें।
यदि तय समयसीमा में समाधान नहीं होता, तो शिकायत को जिला और राज्य स्तर तक आगे बढ़ाने का प्रावधान रखा गया है, जिससे जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
ब्लॉकिंग में सफलता, रिकवरी अब भी चुनौती
हालांकि सरकार की प्रणाली अपराधियों तक पैसे पहुँचने से रोकने में काफी हद तक सफल रही है, लेकिन आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि रिकवरी अब भी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। नई नीति इस संकेत के रूप में देखी जा रही है कि कानूनी और ऑपरेशनल प्रक्रियाओं को सरल बनाकर पीड़ितों को उनकी राशि जल्द लौटाने पर ध्यान दिया जाएगा, विशेष रूप से उन मामलों में जहां धन का स्रोत और पीड़ित की पहचान स्पष्ट है।
यूपीआई, इंटरनेट बैंकिंग, ई-कॉमर्स और पहचान-आधारित ठगी के बढ़ते मामलों के बीच सरकार का मानना है कि सख्त जांच, बेहतर समन्वय और समयबद्ध शिकायत निवारण से न केवल साइबर अपराधियों पर प्रभावी कार्रवाई होगी, बल्कि निर्दोष नागरिकों को होने वाली अनावश्यक परेशानियों में भी कमी आएगी।
