चंडीगढ़ | देश में तेजी से बढ़ते साइबर अपराधों पर सख्त रुख अपनाते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने ₹1.18 करोड़ के साइबर ठगी मामले में एक आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि साइबर फ्रॉड आज के डिजिटल युग में एक “गंभीर और बढ़ती हुई समस्या” बन चुका है और इस पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए कठोर न्यायिक प्रतिक्रिया आवश्यक है।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति मनीषा बतरा ने उस याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें आरोपी ने नियमित जमानत की मांग की थी। आरोपी पर आरोप है कि उसने अपने नाम और परिचितों के नाम से खोले गए बैंक खातों के माध्यम से ठगी की रकम को विभिन्न खातों में ट्रांसफर कराने में सक्रिय भूमिका निभाई।
अदालत के समक्ष पेश रिकॉर्ड के अनुसार, शिकायतकर्ता को कथित तौर पर निवेश में अधिक मुनाफे का लालच देकर ₹1,18,47,353 की राशि ठग ली गई थी। इस संबंध में महेंद्रगढ़ जिले के नारनौल स्थित साइबर पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसके बाद विस्तृत जांच शुरू हुई।
साइबर अपराधी उन्नत तरीकों का कर रहे इस्तेमाल
राज्य सरकार की ओर से जमानत याचिका का विरोध करते हुए अदालत को बताया गया कि आरोपी ने न केवल अपने बैंक खातों का इस्तेमाल किया, बल्कि अन्य व्यक्तियों के खातों की व्यवस्था भी की, जिनका उपयोग साइबर ठगी की रकम को इधर-उधर घुमाने के लिए किया गया। जांच के दौरान मोबाइल फोन, एटीएम कार्ड, चेकबुक, पासबुक और सिम कार्ड भी बरामद किए गए।
न्यायमूर्ति मनीषा बतरा ने अपने आदेश में कहा कि साइबर अपराधी अब अत्यंत परिष्कृत, योजनाबद्ध और तकनीक-आधारित तरीकों से आम नागरिकों और संस्थानों को निशाना बना रहे हैं। ऐसे मामलों में उदार दृष्टिकोण अपनाना समाज में गलत संदेश देगा और अपराधियों के हौसले बढ़ा सकता है।
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सह-आरोपी को मिली जमानत का नहीं मिलेगा लाभ
आरोपी की ओर से यह तर्क दिया गया कि मामले में एक सह-आरोपी को पहले ही जमानत दी जा चुकी है, इसलिए समानता के सिद्धांत के आधार पर उसे भी राहत मिलनी चाहिए। हालांकि अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता की भूमिका सह-आरोपी की तुलना में अलग और अधिक सक्रिय रही है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केस डायरी और स्टेटस रिपोर्ट से प्रथम दृष्टया यह सामने आता है कि आरोपी की भागीदारी ठगी की साजिश में महत्वपूर्ण रही। ऐसे में उसके मामले को सह-आरोपी के समान नहीं माना जा सकता।
अपराध की गंभीरता और संभावित सजा अहम
हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि साइबर ठगी जैसे अपराधों की सामाजिक गंभीरता अत्यधिक है और इससे आम लोगों के डिजिटल लेन-देन पर भरोसे को गहरा आघात पहुंचता है। अदालत के अनुसार, आरोपों की प्रकृति, संभावित सजा की गंभीरता और मामले की समग्र परिस्थितियों को देखते हुए जमानत देने का कोई ठोस आधार नहीं बनता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह टिप्पणियां मामले के गुण-दोष पर अंतिम राय नहीं हैं, लेकिन मौजूदा चरण में आरोपी को राहत देना न्यायसंगत नहीं होगा।
बढ़ते साइबर अपराधों पर सख्त संदेश
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह आदेश साइबर ठगी के मामलों में एक स्पष्ट और सख्त न्यायिक संदेश देता है। डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन निवेश के बढ़ते चलन के साथ साइबर अपराधों में तेज़ी आई है और अदालतें अब ऐसे मामलों में नरमी बरतने के पक्ष में नहीं दिख रही हैं।
इस फैसले को उन लोगों के लिए चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है, जो बैंक खाते, सिम कार्ड या डिजिटल पहचान दूसरों को उपलब्ध कराकर साइबर अपराधों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो जाते हैं।
अदालत के अनुसार, साइबर ठगी अब केवल एक आर्थिक अपराध नहीं रह गई है, बल्कि यह सार्वजनिक विश्वास और डिजिटल सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा बन चुकी है। ऐसे में कठोर न्यायिक रुख ही इस बढ़ती समस्या पर प्रभावी रोक लगा सकता है।
