छोटे जिले से ग्लोबल स्टेज तक: जुड़वा भाइयों ने दिखाया कि टेक का भविष्य कोड से नहीं, सोच से बनता है

Team The420
5 Min Read

बिहार के एक छोटे से जिले से निकलकर वैश्विक टेक इकोसिस्टम में पहचान बनाना आमतौर पर आसान नहीं होता। सीमित संसाधन, कमजोर नेटवर्क और तकनीकी सुविधाओं की कमी अक्सर बड़े सपनों के रास्ते में बाधा बन जाती है। लेकिन इन्हीं परिस्थितियों के बीच जुड़वा भाइयों—मुकुंद झा और माधव झा—ने एक ऐसा टेक प्लेटफॉर्म खड़ा किया, जिसने सॉफ्टवेयर और ऐप डेवलपमेंट की पारंपरिक समझ को चुनौती दे दी है।

उनका स्टार्टअप Emergent इस मूल विचार पर आधारित है कि किसी ऐप को बनाने के लिए कोड लिखना अनिवार्य नहीं होना चाहिए। यूजर केवल यह बताए कि उसे किस तरह का ऐप चाहिए, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उस विचार को एक कार्यशील ऐप में बदल दे। यह दृष्टिकोण तेजी से दुनिया भर के डेवलपर्स, स्टार्टअप्स और छोटे कारोबारियों के बीच स्वीकार किया जा रहा है, क्योंकि यह तकनीक को अधिक सुलभ और लोकतांत्रिक बनाता है।

दोनों भाइयों का बचपन साधारण परिस्थितियों में बीता। कभी बिजली की कटौती तो कभी बेहद धीमा इंटरनेट—लेकिन तकनीक के प्रति उनकी जिज्ञासा बनी रही। कम उम्र में ही उन्होंने कंप्यूटर और प्रोग्रामिंग की बुनियादी समझ विकसित कर ली। समय के साथ उन्होंने एक व्यापक समस्या को पहचाना—ऐसे हजारों लोग हैं जिनके पास मजबूत बिजनेस आइडिया हैं, लेकिन तकनीकी ज्ञान या डेवलपर रखने की क्षमता न होने के कारण वे अपने विचारों को वास्तविक रूप नहीं दे पाते।

इसी से एक बुनियादी सवाल उभरा—क्या ऐसा सिस्टम बनाया जा सकता है, जहां इंसान केवल अपनी जरूरत बताए और मशीन खुद ऐप बना दे? शुरुआत में इस सोच को अव्यावहारिक और कल्पनात्मक माना गया, लेकिन यही चुनौती दोनों भाइयों के लिए प्रेरणा बन गई।

साल 2024 में एक छोटे से कमरे से Emergent AI की शुरुआत हुई। इसे दुनिया का पहला “Agentic Vibe Coding” प्लेटफॉर्म बताया जा रहा है। यहां न किसी कोडिंग लैंग्वेज की आवश्यकता है और न ही जटिल इंटरफेस की। यूजर चैट की तरह लिखता है—“मुझे ऐसा ऐप चाहिए”—और कुछ ही मिनटों में एक पूरा, काम करने योग्य ऐप तैयार हो जाता है। डिजाइन, डेटाबेस और फीचर्स, सभी कुछ ऑटोमेटेड प्रक्रिया से विकसित होते हैं।

Certified Cyber Crime Investigator Course Launched by Centre for Police Technology

इस तकनीक ने सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में लागत और समय दोनों को नाटकीय रूप से कम कर दिया है। जहां पहले एक ऐप बनाने में महीनों का समय और लाखों रुपये खर्च होते थे, वहीं अब वही काम बेहद कम लागत में मिनटों में संभव हो गया है। यही वजह है कि छोटे दुकानदारों से लेकर स्टार्टअप्स, शिक्षा प्लेटफॉर्म्स और अंतरराष्ट्रीय व्यवसायों तक Emergent को तेजी से अपनाया जा रहा है।

इसके परिणाम भी उल्लेखनीय रहे हैं। महज सात महीनों में Emergent ने 50 लाख से अधिक यूजर्स जोड़े और कंपनी की सालाना कमाई ₹400 करोड़ तक पहुंच गई। टेक स्टार्टअप इकोसिस्टम में इतनी तेज़ ग्रोथ को असाधारण माना जाता है। इस प्रदर्शन ने वैश्विक निवेशकों का ध्यान आकर्षित किया और कंपनी को बड़े फंडिंग राउंड्स हासिल हुए।

हालांकि यह कहानी केवल वित्तीय सफलता तक सीमित नहीं है। Emergent ने उस सोच को चुनौती दी है जिसमें तकनीक को बड़े शहरों और विशेषज्ञों तक सीमित माना जाता था। इस प्लेटफॉर्म ने दिखाया है कि मजबूत विचार और स्पष्ट दृष्टि के सामने भौगोलिक सीमाएं अप्रासंगिक हो जाती हैं।

मुकुंद और माधव झा का लक्ष्य इससे भी व्यापक है। वे चाहते हैं कि भारत का कोई भी युवा—चाहे वह गांव से हो या छोटे शहर से—अगर उसके पास एक विचार है, तो तकनीकी बाधाएं उसे आगे बढ़ने से न रोकें। उनके अनुसार, सॉफ्टवेयर बनाना अब केवल इंजीनियरों का विशेषाधिकार नहीं रहना चाहिए।

बिहार की जमीन से निकली यह कहानी आज वैश्विक टेक इकोसिस्टम को एक स्पष्ट संदेश देती है—टेक का भविष्य केवल कोड से नहीं, बल्कि सोच से बनता है। Emergent ने यह दिखा दिया है कि सही दृष्टि और साहस के साथ नामुमकिन को मुमकिन में बदला जा सकता है।

हमसे जुड़ें

Share This Article