हथियार आयातक से वैश्विक सप्लायर तक: रक्षा निर्यात में भारत बना नया पावरहाउस

Team The420
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नई दिल्ली | भारत के रक्षा क्षेत्र ने चुपचाप एक अहम रणनीतिक मुकाम हासिल कर लिया है। वर्षों तक सैन्य जरूरतों के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहने वाला देश अब वैश्विक हथियार बाजार में अपनी अलग पहचान बना रहा है। मिसाइलों, तोपों, वायु रक्षा प्रणालियों, रडार और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का निर्यात अब 100 से अधिक देशों तक फैल चुका है। वित्त वर्ष 2024–25 में भारत का रक्षा निर्यात ₹23,240 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा, जो साल-दर-साल 12% की बढ़त और एक दशक पहले की तुलना में 34 गुना वृद्धि को दर्शाता है।

हालांकि यह आंकड़ा पारंपरिक वैश्विक रक्षा दिग्गजों के मुकाबले अभी छोटा दिख सकता है, लेकिन इसकी दिशा कहीं ज्यादा अहम संकेत देती है। भारत अब केवल एक वैकल्पिक सप्लायर नहीं रहा, बल्कि उसे तेजी से किफायती, भरोसेमंद और समय पर डिलीवरी करने वाले हथियार आपूर्तिकर्ता के रूप में देखा जा रहा है—खासतौर पर उन देशों के लिए, जो महंगे यूरोपीय या अमेरिकी हथियार नहीं खरीद सकते।

इसके समानांतर घरेलू रक्षा निर्माण में भी तेज विस्तार हुआ है। स्वदेशी रक्षा उत्पादन बढ़कर लगभग ₹1.49 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, जो पिछले पांच वर्षों में लगभग दोगुना है। मिसाइलों और रॉकेट लॉन्चरों से लेकर नौसैनिक प्लेटफॉर्म, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और आधुनिक रडार तक—भारतीय फैक्ट्रियां अब रक्षा जरूरतों की पूरी श्रृंखला में उत्पादन कर रही हैं। छोटे हथियार, गोला-बारूद और पुर्जे अब भी निर्यात का बड़ा हिस्सा हैं, लेकिन धीरे-धीरे फोकस अधिक जटिल और उच्च-मूल्य वाले प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ रहा है।

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी कीमतों में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त है। 155 मिमी तोप के गोले भारतीय कंपनियां ₹25,000–33,000 प्रति यूनिट की दर पर सप्लाई कर रही हैं, जबकि वही गोले यूरोप में ₹2.5 लाख तक में बिकते हैं। भारत में बनी हॉवित्जर तोपें भी पश्चिमी देशों की तुलना में लगभग आधी कीमत पर निर्यात की गई हैं। यही कारण है कि बढ़ते वैश्विक तनाव के दौर में भारत एक “अफोर्डेबल आर्म्स सप्लायर” के रूप में उभर रहा है।

हालिया युद्धक्षेत्र में इस्तेमाल ने भी भारत की साख मजबूत की है। पिछले साल एक बड़े क्षेत्रीय सैन्य टकराव में इस्तेमाल हुए हथियारों और प्रणालियों ने सटीकता, मोबिलिटी और विश्वसनीयता का प्रदर्शन किया। इन वास्तविक युद्ध अनुभवों ने भारत की रक्षा तकनीक को वैश्विक मंच पर प्रभावी मार्केटिंग बढ़त दिलाई है, जिससे एशिया, अफ्रीका और यूरोप के कई देशों की दिलचस्पी बढ़ी है।

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भारत की मिसाइल प्रणालियां—जिसमें सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित मोबाइल एयर डिफेंस सिस्टम शामिल हैं—विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हैं। इनके सफल प्रदर्शन के बाद कई देशों ने औपचारिक बातचीत शुरू की है या रुचि जताई है। आज भारत का रक्षा निर्यात पोर्टफोलियो मिसाइलों, ड्रोन, निगरानी उपकरणों, नौसैनिक प्लेटफॉर्म और उन्नत कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम तक फैल चुका है।

पिछले एक दशक में किए गए नीतिगत सुधारों ने इस बदलाव को मजबूत आधार दिया है। निर्यात मंजूरी की प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया, निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ी और स्वदेशीकरण पर लगातार जोर दिया गया। इसके साथ ही भारत का रक्षा बजट बढ़कर ₹6.47 लाख करोड़ के पार पहुंच गया है, जिससे घरेलू उद्योग को स्थिरता और पैमाना मिला है।

साथ-साथ भारत पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता घटाते हुए नई तकनीकी साझेदारियां भी बना रहा है। अमेरिका, फ्रांस और इज़राइल की कंपनियों के साथ सहयोग, और घरेलू नवाचार, दोनों ने क्षमताओं को तेजी से आगे बढ़ाया है। ड्रोन सेक्टर खासतौर पर तेज रफ्तार से उभर रहा है, जिसका घरेलू बाजार 2030 तक ₹91,300 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है।

भू-राजनीतिक दृष्टि से भी भारत का रक्षा निर्यात उभार अहम है। चीन जहां दक्षिण एशिया सहित कई क्षेत्रों में हथियार सप्लाई बढ़ा रहा है, वहीं भारत खुद को एक संतुलनकारी विकल्प के रूप में पेश कर रहा है—जहां कीमतें प्रतिस्पर्धी हैं और राजनीतिक शर्तें अपेक्षाकृत कम।

सरकार का लक्ष्य 2029 तक रक्षा निर्यात को बढ़ाकर ₹49,800 करोड़ तक ले जाना है। मौजूदा रफ्तार को देखते हुए यह लक्ष्य अब महत्वाकांक्षी नहीं, बल्कि हासिल करने योग्य नजर आने लगा है।

जो कभी केवल एक सपना था, वह अब हकीकत बनता दिख रहा है—भारत अब सिर्फ अपनी सुरक्षा के लिए हथियार नहीं बना रहा, बल्कि अपनी ताकत दुनिया को भी निर्यात कर रहा है।

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